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3 कारण क्यों मुनव्वर राणा का विरोध केवल मुस्लिम नहीं बल्कि हर साहित्य प्रेमी को करना चाहिए!
तमाम लोगों की तरह शायर मुनव्वर राणा ने भी तालिबान का समर्थन करते हुए अपने दिल की भड़ास निकाली है. अब क्योंकि मुनव्वर राणा पब्लिक डोमेन से आते हैं और शायर हैं इसलिए 3 कारणों के जरिये समझिये कि उनके कहे का विरोध केवल मुसलमानों को नहीं, बल्कि हर साहित्य प्रेमी को क्यों करना चाहिए.
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तालिबान के 'मुनव्वर वेरिएंट' को निंदा की वैक्सीन नही, एक्शन का बूस्टर डोज ही रोक सकता है
भारत में ये ताज्जुब की बात नहीं मानी जाती है कि धर्मांधता में हर कोई एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की रेस में शामिल हो जाता है. वैसे इस तरह की हरकत कोई अनपढ़ शख्स करे, तो समझा जा सकता है. लेकिन, भारत में अनपढ़ ही नहीं, बड़े विद्वान भी तालिबान के पाले में खड़े हुए दिखाई पड़ रहे हैं. तालिबान समर्थकों की इस लिस्ट में हिंदी-उर्दू कविता मंचों के बड़े नामों में शामिल रहे मुनव्वर राणा का नाम भी शामिल हो गया है.
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Freedom Of Speech का सबसे वीभत्स चेहरा तो शायर मुनव्वर राणा निकले!
एक जाना पहचाना चेहरा होने के बावजूद जिस तरह का बयान शायर मुनव्वर राणा (Munawwar Rana) ने फ्रांस (France) मामले पर दिया है वो ये साफ़ बताता है कि उन पर कट्टरपंथ बुरी तरह हावी है और उनका असली चेहरा सांप्रदायिक है जो हत्या और सांप्रदायिक हिंसा (सांप्रदायिक हिंसा) का पक्षधर है.
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