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Updated: 13 अक्टूबर, 2019 08:32 PM
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समाज में कुछ लोगों को 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' जैसी बातों से भी परहेज है. यह होना नहीं चाहिए. मगर हिंदुत्व की नव कट्टरता हमें आगे कहीं नहीं ले जा रही हो, तो डराती है. यह हम इसलिए नहीं कह रहे हैं कि यह कट्टरता हमें अंधविश्वासों की तरफ धकेल रही है और मुसलमानों से नफरत करना सिखाती है. मगर हम इसलिए कह रहे हैं कि जब भी हमें हिंदुत्व के नाम पर आगे कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया है, हिंदुत्व की आग में हमने अपना ही घर जला डाला है. अगर हिंदुओं ने जरा सी समझदारी दिखाई होती तो आज न तो पाकिस्तान की समस्या होती और न ही आज कश्मीर को लेकर कोई विवाद होता. भारतवर्ष में देशभक्त होने को लेकर अभी दो ही प्रमाण पत्र चल रहे हैं. इन दो मुद्दों पर आप किस तरह से सोचते हैं यह बतलाता है आप कितने प्रबल हिंदू हैं यानी आपका सारा हिंदुत्व पाकिस्तान और कश्मीर पर आ खड़ा हुआ है. मगर इस सच को भी जान लीजिए कि पाकिस्तान और कश्मीर के मुद्दे को किसी और ने नहीं, हमारे अंदर के हिंदुत्व के नाम पर चल रहे ढकोसले ने खड़ा किया है.

मोहम्मद अली जिन्ना के पिता गुजरात के काठियावाड़ के बनिया परिवार के रहने वाले पूंजलाल ठक्कर थे. काठियावाड़ में कुंडल स्टेट के पनेली मोती गांव मे लोहाना हिंदू रहते थे, जो हिंदुत्व को लेकर आचरण और व्यवहार से बेहद कट्टर थे. मोहम्मद अली जिन्ना के दादा प्रेम जी भाई ठक्कर ने बड़ा परिवार होने की वजह से परिवार पालने के लिए मछली बेचने का व्यवसाय शुरू किया तो पूरे गांव में हंगामा मच गया. लोहाना समुदाय ने मछली बेचने की वजह से प्रेम जी भाई ठक्कर को अपनी जाति से बाहर कर दिया. प्रेम जी भाई ठक्कर ने तो जैसे तैसे अपनी जिंदगी जी ली मगर उनके बेटे पूंजलाल ठक्कर परेशान होकर अपने लोहाना बनिया समुदाय के पास आए और उन्हें कहा कि वह मछली का अपना व्यवसाय छोड़ने के लिए तैयार हैं, समाज उन्हें फिर से अपना ले . मगर गांव में कोई भी उनसे रिश्ता रखने के लिए तैयार नहीं हुआ. थक हार कर गुस्से में वह खोजा इस्माइल फिरका पंथ में शामिल हो गए और अपना नाम पूंजा जिन्ना रख लिया. जिन्ना कोई मुस्लिम उपनाम नहीं है, बल्कि गुजराती में दुबला पतला होने को जिन्नो कहते हैं. पूंजा जिन्ना अपना गांव छोड़कर अपनी पत्नी मीठीबाई के साथ कराची आ गए और वहां पर मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म हुआ, जिसने हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए. काफी बाद में जाकर जिन्ना के पिता पूंजा जिन्ना इस्लाम धर्म अपनाकर शिया मुस्लिम बने. कहते हैं कि जिन्ना की मां मीठीबाई तो अपना धर्म छोड़ ही नहीं पाईं. यहां तक कि जिन्ना जब विदेश पढ़ने जाने लगे तो इस डर से कि कहीं जाकर वह किसी गोरी लड़की से शादी न कर लें अपने गांव पनेली में मोती की लड़की एनीबाई से जिन्ना की शादी कर दी.

कश्मीर, पाकिस्तान, हिंदूहिंदू अपनी कट्टरता को किनारे रखकर बौद्ध सरदार रिनचन को अपना लेते तो क्या कभी कश्मीर मुस्लिम बहुल बन पाता?

जरा सोचिए महज मछली बेचने से हिंदुओं को इतना खतरा महसूस हुआ कि हिंदुत्व के नाम पर यह कट्टरता भारत के लिए जीवन भर का दर्द दे गया. बहुमत के नाम पर जब भी समाज धर्म की आड़ में अपने पाखंड को समाज के ऊपर थोपने लगता है तो समाज के अंदर हाशिए पर पड़े लोग सबसे ज्यादा इसे प्रभावित होते हैं. इन लोगों में पाखंड के ऊपर नफरत के बजाय धर्म पर से विश्वास उठना शुरू हो जाता है.

कुछ लोग यह कह सकते हैं कि इसे हिंदुत्व से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, क्योंकि उत्तर बिहार के इलाके में झा जी नाम से पाए जाने वाले उच्च कोटि के ब्राह्मण जो कि पाश्चात्य संस्कृति के संवाहक और आडंबरों के झंडाबरदार भी हैं, अपने हर शुभ और अशुभ काम में मछली खाते हैं. यहां तक कि दही भात के साथ भी मछली खा लेते हैं. यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि इतिहास गवाह रहा है कि खतरा हमेशा समाज के फ्रिंज एलिमेंट से ही रहा है जो धर्म के नाम पर पाखंड खड़ा कर लेते हैं और फिर उसे आधार बनाकर ठेकेदारी शुरू कर देते हैं.

हमारे देश के लिए राष्ट्रीयता का दूसरा सबसे बड़ा आधार कश्मीर समस्या पर हमारी राय है. तो यह भी जान लीजिए कि कश्मीर की समस्या के लिए कोई और नहीं बल्कि हिंदुओं की कट्टरता ही जिम्मेदार है. 1320 में जब कश्मीर में पूरी तरह से हिंदुओं का राज था तो तुर्कमेनिस्तान से दुलाचा का नाम के लूटेरे ने तुर्क और मंगोल फौजियों को लेकर कश्मीर पर हमला कर दिया. कश्मीर का डरपोक राजा सुहा देव श्रीनगर छोड़कर किश्तवाड़ भाग गया. 8 महीने तक कश्मीर को लूटने और धर्म परिवर्तन कराने के बाद दुलाचा ठंड पड़ने से पहले कश्मीर छोड़कर चला गया. इस दौरान लद्दाख का सरदार रिनचन लारघाटी में अपनी टुकड़ी लेकर काफी दिनों से डेरा डाले हुए था. दुलाचा के जाने के बाद सुहा देव का मंत्री रामचंद्र कश्मीर पर राज कर रहा था, मगर उसके पास सेना नहीं थी. हालात को देखकर रिनचन ने कश्मीर को अपने कब्जे में कर लिया. कश्मीर पर कब्जा करने के बाद वह बौद्ध धर्म छोड़कर हिंदू बनना चाहता था, ताकि लंबे समय तक कश्मीर पर राज कर सके. उसने हिंदू बनने की बहुत कोशिश की, मगर कश्मीर के ब्राह्मणों ने उसे हिंदू नहीं बनने दिया. इसके लिए उसने रामचंद्र की बेटी कोटा रानी से शादी भी की. कश्मीर के हिंदू न तो बौद्ध राजा को अपना रहे थे, न उसे हिंदू बनने दे रहे थे. इससे नाराज होकर वह इस्लाम के प्रचारक बुलबुल शाह के संपर्क में आया और इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया. इस तरह से जम्मू कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक सुल्तान सदर उद्दीन के रूप में मिला.

इससे पहले तक कश्मीर में इस्लाम का नामोनिशान नहीं था. रिनचन ने अपना नाम सुल्तान सदरूद्दीन रखने के बाद बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन कराए. इस काम में उसका सहयोग बारामूला में जड़ जमाए बाहर से आए शाह मीर ने किया. 1323 में जब रिनचन की मौत हुई तो उसने शाह मीर को बुलाकर कहा कि वह उसकी पत्नी कोटा रानी और उसके बेटे हैदर का ख्याल रखे. सुल्तान सदर-उद-दीन की मौत के बाद हिंदुओं ने वापस सत्ता अपने हाथ में ले ली और सुहादेव के भाई उदयन देव को राजा बना दिया. इसके साथ ही उसके बेटे हैदर को भी मौत के घाट उतार दिया गया. उदयन देव ने अपने भाई की पत्नी कोटा रानी से शादी कर ली. मगर एक बार फिर अचला नाम के हमलावर ने कश्मीर पर हमला किया तो इस बार उदयन देव श्रीनगर छोड़कर जम्मू भाग गया. 1338 में जब वह कश्मीर वापस लौटा तब तक उसका मंत्री मीर शाह मजबूत हो चुका था और उसने उदयन देव को मारकर कश्मीर की गद्दी हासिल कर ली. और इस तरह से वह कश्मीर का पहला सुल्तान शमसुद्दीन बन गया. उसने कोटा रानी से भी जबरन शादी करने की कोशिश की मगर कोटा रानी ने छुरा घोंप कर आत्महत्या कर ली. इस तरह से कश्मीर को पहला मुस्लिम सुल्तान वंश शाह वंश के रूप में मिला, जिसने करीब 300 से ज्यादा साल तक कश्मीर पर राज किया. आगे चलकर इसी शाह वंश में सिकंदर बुतशिकन सुल्तान हुआ, जिसने बड़े पैमाने पर हिंदुओं का कत्लेआम किया और उन्हें मुसलमान बनाया कश्मीर के सारे हिंदू मंदिर और मूर्तियां तक तोड़ डालीं. इसीलिए इसका नाम बुतशिकन पड़ा था.

जरा सोचिए कि अगर कश्मीरी ब्राह्मणों ने अपने कमजोर और डरपोक राजाओं को छोड़कर लद्दाख के सरदार रिनचन को अपना लिया होता और उसे हिंदू बना दिया होता तो कश्मीर का इतिहास कुछ और ही होता. मगर अपनी जिद की वजह से हिंदुओं ने कश्मीर बर्बाद कर दिया, मगर एक बौद्ध राजा को हिंदू नहीं बनने दिया.

यह सब मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब एक बार फिर से हिंदुत्व का ज्वार अपने उबाल पर है. तब हमें लगता है कि इसकी आग से अपने खुद के घर में आग लगाने के बजाय या फिर इसे ठहरे हुए पानी की तरह सड़ने देने के बजाय कोई न कोई रास्ता मिलना चाहिए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक संगठन के रूप में हिंदुओं की आवाज के रूप में स्थापित हुआ है. ऐसे में आर एस एस से उम्मीद की जाती है कि हिंदू धर्म के अंदर कहीं ना कहीं कोई न कोई ऐसा रास्ता निकाले, जिससे यह दुनिया का सबसे खूबसूरत धर्म और बेहतर ढंग से फले फूले. हमारी यह समस्या रही है कि हम अपने आप में इतने कट्टर हैं कि बाहरी दुनिया के लिए अपने दरवाजे बंद कर के रखते हैं. हमारी जीवनशैली में इतना पाखंड है कि धर्म के रूप में हम गर्व तो महसूस करना चाहते हैं, मगर जब बारी आती है तो जाति के रूप में पहले बंट जाते हैं. हिंदू धर्म में मरने के बाद हम पुनर्जन्म पर यकीन करते हैं मगर इसी जन्म में किसी को हम अपने धर्म में अपना सकें इस बात पर हमारा मिजाज बेहद कट्टर है.

हाल के कुछ वर्षों में समाज में या फिर सोशल मीडिया में मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं में जो नफरत देखने को मिली है उसे देखकर लगता है हिंदुओं ने ना जाने कब से अपने सीने में आग को छुपा रखा था. आप पढ़े-लिखे समझदार लोगों से बात कर लें या फिर अपने बेहतरीन स्वभाव के किसी दोस्त से बात करें, हर जगह आपको मुसलमानों के खिलाफ नफरत नहीं मिलती है तो कम से कम उन्हें लेकर एक खास किस्म का आग्रह जरूर दिखता है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी जब यह कहते हैं कि हिंदुस्तान में रहने वाला हर नागरिक हिंदू है तो हिंदू होने के नाते गर्व महसूस होता है, मगर कभी-कभी सोचता हूं कि अगर सारे मुसलमानों को हिंदू बना लिया जाए तो यह किस जाति के हिंदू बनेंगे. देश में आज भी रोटी और बेटी का रिश्ता जाति के अंदर खोजा जाता है. ऐसे में कौन मुसलमान ब्राह्मण या हिंदू ब्राह्मण रोटी और बेटी का रिश्ता करेगा.

अगर मुसलमानों को दलित हिंदू बनाया जाता है तो फिर वह क्यों हिंदू बनेंगे. हिंदू आस्था के नाम पर रखवाले विमान के पहिए के नीचे नींबू और मिर्ची रखने का अंधविश्वास आज की नहीं है, मगर हिंदुत्व के सामने समस्या यह है कि जब भी लगता है कि वह इन दकियानूसी चीजों से बाहर निकल रहे हैं एक ऐसा दौर आता है यह सब चीजें और प्रगाढ़ बन जाती हैं. हिंदू इन दिनों आपको ज्यादा मुखर दिख रहे हैं इसलिए ऐसा लग रहा होगा कि यह समस्या नई-नई है, मगर आप अगर इतिहास के पन्नों को कुरेदेंगे तो देखेंगे कि दुनिया का सबसे कट्टर धर्म हिंदू ही रहा है, जिसकी कट्टरता की वजह से इसे नुकसान उठाना पड़ा है. यहां तक कि पाकिस्तान और कश्मीर जैसी समस्या से अगर भारत जूझ रहा है तो इसकी वजह हिंदुओं की कट्टरता कहीं न कहीं रही है. अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या फिर उनके वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत हों, यह लोग हिंदुत्व पर गर्व करने के साथ-साथ अपने विचार और व्यवहार में लचीले हैं. उम्मीद करनी चाहिए कि हिंदुत्व का यह नव उभार राम मंदिर, कश्मीर और पाकिस्तान से आगे जाकर हिंदुत्व की खोई प्रतिष्ठा को कैसे हासिल करें और इस धर्म को दुनिया का सबसे बड़ा धर्म कैसे बनाएं इसे लेकर मंथन होगा. जरूरत पड़े तो विषपान के लिए आर.एस.एस. जैसे संगठन को आगे आना चाहिए.

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