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Updated: 04 जुलाई, 2021 10:00 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की कुर्सी पर खतरा मंडराते महसूस किया गया है. ये चर्चा उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के बाद शुरू हुई है. बीजेपी का ये कदम ममता बनर्जी के लिए संवैधानिक संकट पैदा होने की हालत में एक और अग्नि परीक्षा का सबब बन सकता है.

ममता बनर्जी के लिए ऐसी मुश्किल घड़ी आने से पहले ही कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) मदद के लिए आगे बढ़ती नजर आ रही हैं. समझा जा रहा है कि ममता बनर्जी की राह में कोई अड़चन न आने पाये इस वजह से सोनिया गांधी लोक सभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को बदलने का भी फैसला ले सकती हैं.

हैरानी भरी खबर तो ये है कि अधीर रंजन की जगह सोनिया गांधी अपने या राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के करीबियों की बजाये कांग्रेस के बागी गुट G23 के सदस्यों में से किसी एक को भी ये जिम्मेदारी देने को लेकर विचार विमर्श कर रही हैं - और ये शशि थरूर या मनीष तिवारी हो सकते हैं. ये सब ऐसे वक्त हो रहा है जब पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का झगड़ा 2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तबाही की तरफ ले जा रहा है - और राजस्थान में भी सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच आग बुझने का नाम नहीं ले रही है. साथ ही, कांग्रेस नेतृत्व को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एकजुट होने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों की एक्टिविटी से भी दूर रखा जा रहा है.

पंजाब और राजस्थान को कांग्रेस नेतृत्व के लिए सिरदर्द बनते देख प्रियंका गांधी वाड्रा खुद पहल करते हुए चीजों को दुरूस्त करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सोनिया गांधी को क्या ये नहीं लगता कि ममता बनर्जी की तरफ बढ़े कांग्रेस के हर कदम का सीधा असर राहुल गांधी पर हो सकता है - और उसके फायदेमंद होने की भी गारंटी नहीं है.

ममता के लिए सोनिया गांधी का एक्टिव होना

लोक सभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी के साथ पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले कांग्रेस नेतृत्व ने करीब करीब वैसा ही व्यवहार किया था, जैसे 2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी, रणदीप सिंह सुरजेवाला के साथ पेश आये थे. अधीर रंजन चौधरी भी खुशी खुशी बंगाल चुनाव के लिए दिल्ली से कोलकाता चले गये, जैसे रणदीप सिंह सुरजेवाला बगैर एक भी शब्द बोले कैथल उपचुनाव में जाकर नामांकन किये और रिजल्ट आने पर हार कर लौट आये. जाहिर है अधीर रंजन को भी नतीजे पहले से ही वैसे ही मालूम होंगे जैसे सुरजेवाला को. सुरजेवाला को तो कालांतर में प्रमोशन भी मिला, लेकिन अधीर रंजन के साथ वही हुआ जैसी खबरें आ रही हैं तो भला कर भी क्या सकते हैं.

सवाल ये है कि बंगाल चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन को क्या अधीर रंजन चौधरी की नाकामी समझी जानी चाहिये - आखिर अधीर रंजन चौधरी ने किया तो वही है जो कांग्रेस नेतृत्व चाह रहा था.

mamata banerjee, sonia gandhi, rahul gandhiममता बनर्जी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए राहुल गांधी को लेकर सोनिया गांधी जोखिम उठाने का मन बना चुकी हैं क्या?

पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाये जाते वक्त भले ही किसी को अंदाजा न हो कि जितिन प्रसाद क्या कर सकते हैं, लेकिन बंगाल जाकर अधीर रंजन चौधरी क्या करेंगे - ये तो कांग्रेस नेतृत्व को पहले से पता रहा ही होगा.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अधीर रंजन चौधरी की जगह जिन लोगों के नाम सामने आये हैं वे भी जितिन प्रसाद की ही तरह G23 ग्रुप के सदस्य रहे हैं - केरल से आने वाले शशि थरूर और पंजाब से कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी. अगर दोनों के बारे में सोनिया गांधी कुछ भी सोच रही हैं तो क्या उसे जितिन प्रसाद के उठाये कदम से जोड़ कर देखा जा सकता है - अगर वास्तव में ऐसा होता है तो क्या ये G23 के बाकी नेताओं के लिए कोई मैसेज होगा?

ये अधीर रंजन चौधरी ही हैं जो G23 नेताओं के खिलाफ आक्रामक रवैया अख्तियार किये हुए थे - और बात बात पर गांधी परिवार को सही ठहराते हुए G23 नेताओं की मंशा पर सवाल उठा रहे थे.

अब तक तो यही देखने को मिला कि G23 में शशि थरूर और कपिल सिब्बल ही ज्यादा उपेक्षा के शिकार रहे हैं. केरल विधानसभा चुनाव में शशि थरूर क्या कर रहे थे पता भी न चला - जबकि राहुल गांधी ने पूरा जोर लगा रखा था. नदी में मछुआरों के साथ छलांग लगाने से लेकर सिक्स पैक ऐब्स की नुमाइश तक.

G23 की अगुवाई करने वाले गुलाम नबी आजाद को जरूर लगातार अहमियत मिली है, लेकिन उसके पीछे उनका कश्मीर कनेक्शन ही लगता है - जिसमें उनका मोदी की तारीफ और जम्मू कश्मीर में कांग्रेस के बागियों का होस्ट बनना भी बड़ा कारण लगता है.

अगर कांग्रेस नेतृत्व ने मनीष तिवारी को लेकर कोई मन बना रखा है तो क्या इसलिए ताकि कैप्टन अमरिंदर सिंह की डिमांड ऑटो-रिजेक्ट हो जाये. असल में नवजोत सिंह सिद्धू से झगड़े के बीच कैप्टन अमरिंदर चाहते हैं कि सुनील जाखड़ की जगह मनीष तिवारी को ही पंजाब कांग्रेस का नया अध्यक्ष बना दिया जाये. सुनने में आ रहा था कांग्रेस नेतृत्व नवजोत सिद्धू को पंजाब में कांग्रेस की कमान सौंपने का मन बना चुका है - वैसे सोनिया गांधी को अभी इस मामले में 10 जुलाई तक फैसला लेना है, ऐसा पंजाब कांग्रेस प्रभारी हरीश रावत ने बताया था.

2019 के आम चुनाव के बाद अधीर रंजन को दिल्ली इसलिए बुलाना पड़ा था क्योंकि गांधी परिवार के फेवरेट मल्लिकार्जुन खड़गे लोकसभा चुनाव हार गये थे - लेकिन अब राज्य सभा पहुंच कर वो फिर से दिल्ली में जम गये हैं - और फिलहाल मल्लिकार्जुन खड़गे को पंजाब क्राइसिस कमेटी की जिम्मेदारी मिली हुई है.

अगर अधीर रंजन ने कुछ भी गलत नहीं किया जिसके लिए उनको सजा दी जाये तो और क्या वजह हो सकती है? क्या कांग्रेस नेतृत्व चाहता है कि फिर से वो दिल्ली की जगह कोलकाता में रहें - और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए काम करें?

पश्चिम बंगाल चुनाव में राहुल गांधी की जो भूमिका नजर आयी, उसके बाद भी कांग्रेस ने कई मुद्दों पर मोदी सरकार के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस के साथ नजर आयी - और एक मुद्दा गवर्नर जगदीप धनखड़ के खिलाफ ममता बनर्जी की मुहिम है. ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर राज्यपाल को वापस बुलाने की मांग कर रखी हैं.

एक बात तो तय है कि अगर कांग्रेस संसद में किसी मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के साथ होने का फैसला करती तो एक निश्चित सीमा तक ही अधीर रंजन तैयार हो पाते, हर मुद्दे पर ममता बनर्जी के साथ खड़े होने की सूरत में अधीर रंजन सहज तो नहीं ही हो पाते.

ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि ममता बनर्जी मॉनसून सत्र में बंगाल के गवर्नर को हटाने के लिए संसद में आवाज उठाने की तैयारी कर रही हैं - लेकिन देखा जाये तो कांग्रेस के लिए फिर से बाहर आया राफेल का जिन्न ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है.

अगर संसद में सरकार के विरोध का मतलब शोर मचाना ही होता है, लगता तो नहीं कि शशि थरूर या मनीष तिवारी कम से कम इस मामले अधीर के मुकाबले कहीं टिक पाएंगे?

...तो राहुल गांधी का क्या होगा

अगर कांग्रेस नेतृत्व लोक सभा में अपना नेता बदल कर ही ममता बनर्जी को खुश करना चाहता है तो बात और है - क्योंकि ममता बनर्जी की खुशी अधीर रंजन को हटाने से नहीं मिलने वाली है, बल्कि राहुल गांधी के लिए प्रधानमंत्री पद पर कांग्रेस का दावा छोड़ देने से ज्यादा मिलेगी.

हाल फिलहाल ये भी देखने को मिला है कि विपक्षी नेताओं को एकजुट करने को लेकर शरद पवार, प्रशांत किशोर और यशवंत सिन्हा की सक्रियता से कांग्रेस परेशान हुई है - और विपक्ष की मुलाकातों और दिल्ली में हुई मीटिंग के बीच कांग्रेस नेता कमलनाथ का एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार से मिलना भी उसी चिंता को जाहिर करता है.

क्या कांग्रेस नेतृत्व को दिल्ली में ममता बनर्जी की दस्तक सुनायी देने लगी है?

और क्या ममता के राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ते प्रभाव की धमक भी महसूस करने लगा है?

लंबे अरसे तक बीजेपी में राजनीति के बाद तृणमूल कांग्रेस में उपाध्यक्ष बने यशवंत सिन्हा की पहल पर शरद पवार के इरादे और ममता बनर्जी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सक्रियता सोनिया गांधी के लिए परेशान करने वाली तो है ही. अगर सोनिया गांधी ने बदले राजनीतिक हालात और नये बन रह समीकरण में कांग्रेस को प्रासंगिक नहीं बनाये रखा तो राहुल गांधी कहां जाएंगे? ये सवाल निश्चित तौर पर सोनिया गांधी को भी परेशान कर रहा होगा.

ये भी सही है कि ममता बनर्जी अगर संसद में बंगाल के गवर्नर को हटाने मुद्दा उछालना चाहती हैं और कांग्रेस नये सिरे से राफेल पर हंगामा करने की कोशिश करती है - और कांग्रेस को विपक्ष का साथ नहीं मिलता तो आवाज दब ही जाएगी.

अगर ममता बनर्जी की तरफ से कांग्रेस के लिए कोई एक्सचेंज ऑफर नहीं है तो कांग्रेस के लिए आगे और भी मुश्किल होने वाली है - फिर तो यही लगेगा कि बीजेपी की ही तरह विपक्षी खेमे ने भी कांग्रेस मुक्त भारत अभियान चला रखा है!

सोनिया गांधी के लिए बड़ी मुश्किल ये है कि अगर वो ममता बनर्जी के बढ़ते दखल के दबाव में आ जाती हैं तो उसका सीधा असर राहुल गांधी की राजनीतिक सेहत पर पड़ना तय है - ऐसे में तो सोनिया गांधी को देखना ही होगा कि वो ममता बनर्जी के लिए कुछ करने की सोच रही हैं तो पहले से ही ये विचार जरूर कर लें कि राहुल गांधी के हिस्से क्या पड़ने वाला है - नफा या नुकसान?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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