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Updated: 01 जुलाई, 2021 07:33 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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प्रियंका गांधी वाड्रा (Priyanka Gandhi) को कांग्रेस में कई मौकों पर काफी एक्टिव देखा गया है. तब भी जब वो कांग्रेस में महासचिव जैसे किसी पद पर नहीं थीं. आम चुनाव से पहले मध्य प्रदेश के मुकाबले राजस्थान के मामले सुलझाने में प्रियंका गांधी वाड्रा को ज्यादा सक्रिय देखा गया था.

लेटेस्ट केस पंजाब से है - नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) बनाम मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के वर्चस्व की लड़ाई. प्रियंका गांधी कांग्रेस से भी कहीं ज्यादा सिद्धू के लिए बड़ी संकटमोचक नजर आ रही हैं.

मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में बनी पंजाब क्राइसिस कमेटी के तीन सदस्यों से तो सिद्धू और कैप्टन की मुलाकातों के कई दौर हो चुके थे, लेकिन फिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी (Rahul and Sonia Gandhi) ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए मुलाकात के दरवाजे बंद कर दिये थे - और बाद में तो राहुल गांधी ने सिद्धू से मुलाकात की खबरों को भी अफवाह बता डाला था.

बेशक पंजाब का बवाल कांग्रेस के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है, लेकिन सिद्धू के हिसाब से देखें तो प्रियंका गांधी सबसे बड़ी मददगार नजर आने लगी हैं - तो क्या समझा जाये कैप्टन अमरिंदर सिंह को लेकर कांग्रेस नेतृत्व फैसला कर चुका है और प्रियंका गांधी उसके लिए एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जहां से कोशिश हो कि कोई गलत मैसेज न जाये.

कायदे से तो सिद्धू की ही तरह प्रियंका गांधी को आगे बढ़ने से पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह से भी एक मीटिंग करनी चाहिये थी. सिद्धू जैसी लंबी न सही, एक छोटी सी मुलाकात कैप्टन के साथ तो बनती ही है. असल में सिद्धू ने प्रियंका गांधी के साथ एक फोटो ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा है, "प्रियंका गांधी जी से लंबी मुलाकात की है."

ये ताबड़तोड़ मुलाकातें एकतरफा क्यों?

हाल ही में बीजेपी के एक सांसद ने ट्विटर पर दावा किया था कि सचिन पायलट ने दिल्ली में रहने के दौरान 50-60 कॉल किये, लेकिन राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा किसी ने भी रिसीव नहीं किया. वैसे कांग्रेस की तरफ से करीब करीब दबी जबान में राजस्थान के झगड़े में आलाकमान के प्रतिनिधि अजय माकन ने कहा था - बात तो हो ही रही है.

ऐसे बीते मामलों से अलग पंजाब क्राइसिस केस में प्रियंका गांधी को दिन भर भागदौड़ करते देखा गया - ध्यान देने वाली बात बस यही रही कि प्रियंका गांधी ने सिद्धू से तो दो-दो बार मुलाकातें हुईं, लेकिन पूरे सीन से कैप्टन अमरिंदर सिंह को बाहर ही रखा गया.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, प्रियंका गांधी वाड्रा ने सबसे पहले नवजोत सिंह सिद्धू से मुलाकात की. सिद्धू से मुलाकात के बाद वो राहुल गांधी से मिलने उनके आवास पर पहुंचीं. कुछ देर बातचीत के बाद वो सोनिया गांधी से मिलने 10, जनपथ रवाना हुईं. सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद फिर से वो राहुल गांधी के पास गयीं.

navjot Sidhu, Priyanka Gandhi Vadraप्रियंका गांधी पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू को उनका हक दिलाना चाहती हैं या कांग्रेस को संकट से उबारना चाहती हैं या फिर राहुल गांधी और सोनिया गांधी को सिरदर्द से राहत दिलाना चाहती हैं - सबसे जरूरी ये है कि कांग्रेस महासचिव विवाद को लेकर कोई टिकाऊ और कारगर उपाय खोज पाती भी हैं या नहीं?

अभी राहुल गांधी से प्रियंका गांधी की पहली मुलाकात ही हुई थी कि नवजोत सिंह सिद्धू ने अपनी लंबी मुलाकात की तस्वीर ट्विटर पर शेयर कर दी थी. प्रियंका गांधी और राहुल गांधी दोबारा मिलने के बाद एक साथ सोनिया गांधी से मिलने गये और बातचीत हुई.

प्रियंका गांधी का नवजोत सिंह सिद्धू से मिलना इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि राहुल गांधी मिलने को तैयार नहीं हुए. खबर ये जरूर आयी कि राहुल गांधी से मुलाकात कर सिद्धू अपनी बात और कैप्टन अमरिंदर सिंह की शिकायत का पुराना टेप सुना सकते हैं, लेकिन राहुल गांधी की तरफ से बताया गया कि ऐसी कोई मुलाकात तो शिड्यूल ही नहीं हुई है.

ऐसा लगता है जैसे पहले सिद्धू से मुलाकात का मन बना हो, लेकिन तभी ध्यान आया होगा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को बोलने का मौका मिल जाएगा. कैप्टन अमरिंदर सिंह दिल्ली से बैरंग लौटा दिये जाने के बाद अगर राहुल गांधी मिलने के लिए सिद्धू को पास बुला लेते तो गलत मैसेज जाता - और सवालों के जबाव भी देने पड़ते.

मुसीबत इसलिए भी बढ़ती जा रही थी क्योंकि राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों में से किसी से मिलने तो तैयार न थे - न सिद्धू से न कैप्टन से. माना जाता रहा है कि सिद्धू की नजदीकियां राहुल और प्रियंका गांधी से हैं, जबकि कैप्टन अमरिंदर को सोनिया गांधी के ज्यादा करीब समझा जाता है. ताजा अपडेट ये मिल रहा है कि जैसे सिद्धू से राहुल गांधी नाराज हो गये हैं, ठीक वैसे ही सोनिया गांधी भी कैप्टन अमरिंदर से खफा बतायी जाती हैं.

वैसे तो दोनों का झगड़ा सुलझाने के लिए कांग्रेस आलाकमान की तरफ से मल्लिकार्जुन खड़गे कमेटी बना कर एक कोशिश हुई थी, लेकिन कमेटी के सदस्यों से कई दौर की मुलाकातों के बाद भी बात आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी. वैसे भी ऐसी कमेटियां मैसेंजर भर ही तो होती हैं. कुछ फिक्स्ड सॉल्यूशन होते हैं, लेकिन हालात के हिसाब से फैसले लेने के अधिकार नहीं होते. होते भी हैं तो अगर खुद कमजोर हों तो किस हद तक जा सकते हैं.

एक जमाने में ऐसे काम ज्यादातर अहमद पटेल के जिम्मे हुआ करते थे. अगर अहमद पटेल होते तो ये काम बड़ी आसानी से हो जाता - कैप्टन से भी मिल लेते और सिद्धू से भी. लाख कोशिशों के बावजूद कमलनाथ एक्सेस तो हासिल कर ले रहे हैं, लेकिन अहमद पटेल नहीं बन पा रहे हैं.

जैसे भी संभव होता, लेकिन सिद्धू से तो गांधी परिवार को मिलना ही था, लिहाजा प्रियंका गांधी को आगे किया गया. अब सवाल ये उठता है कि गांधी परिवार की तरफ से प्रियंका गांधी वाड्रा ने सिद्धू से तो मिल लिया - लेकिन कैप्टन अमरिंदर से क्यों नहीं?

क्या पंजाब क्राइसिस पर सोनिया गांधी के आखिरी फैसला लेने से पहले सिद्धू जैसा ही मौका कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी दिया जाएगा?

...लेकिन संकट के बादल मंडराते ही रहते हैं

ऐसे में जबकि पंजाब संकट राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए सबसे बड़ा सरदर्द साबित हो रहा था, प्रियंका गांधी वाड्रा एक बार फिर सबसे बड़ी संकटमोचक बन कर सामने आयी हैं - सवाल ये है कि प्रियंका गांधी वाड्रा जैसी गांधी परिवार की शख्सियत के संकटमोचक बनने के बाद भी कांग्रेस पर मंडराते संकट के बादल छंटते क्यों नहीं?

अब तक तो यही देखने को मिला है कि कुछ मामलों में प्रियंका गांधी तात्कालिक तौर पर रास्ता निकाल लेती हैं, लेकिन वो आगे चल कर किसी काम का नहीं होता. ऐसा लगता है जैसे बीच बचाव करके समझौता तो करा दिया जाता है, लेकिन झगड़ा खत्म करने की जगह उसे कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाता है - और आगे चलकर वो इस कदर उलझ जाता है कि मामला हद से ज्यादा गंभीर हो जाता है.

अब सचिन पायलट का ही केस लें. समझा गया कि सचिन पायलट के बगावती दौर में बातचीत तो उनसे अहमद पटेल भी कर रहे थे और पी. चिदंबरम भी, लेकिन बातचीत की मेज पर सचिन पायलट और राहुल गांधी को एक साथ लाने में प्रियंका गांधी ही कामयाब हो पायीं, लेकिन उसके आगे उनके सामने भी लिमिट तय दिखी है.

सचिन पायलट के केस में भी अहमद पटेल की आखिर तक भूमिका रही. यहां तक की जिन बातों पर आम राय बनी थी उनको लागू कराने से पहले बीच का रास्ता खोजने के लिए कमेटी भी अहमद पटेल के नेतृत्व में ही बनायी गयी थी.

प्रियंका गांधी की कोशिश की बदौलत सचिन पायलट और राहुल गांधी की बात तो हो गयी, लेकिन बातों पर अब तक अमल नहीं हो पाया - नतीजा मामले को कुछ देर के लिए टालने से आगे नहीं बढ़ पाया और अब तो वो नासूर बनता जा रहा है. वैसे भी 2018 में चुनावों बाद प्रियंका गांधी ने ही राजस्थान का झगड़ा सुलझाया था और काफी हद तक मध्य प्रदेश का भी. मध्य प्रदेश तो हाथ से निकल ही गया - सत्ता भी और सिंधिया भी.

सिर्फ सिंधिया ही क्यों, जितिन प्रसाद का भी कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन कर लेने जिम्मेदारी तय होगी तो नाम तो प्रियंका गांधी का ही आएगा. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो आम चुनाव के दौरान यूपी में प्रियंका गांधी के साथ काम किया था, जितिन प्रसाद तो मिशन 2022 के लिए उनकी यूपी टीम के प्रमुख सदस्य थे. कांग्रेस का ब्राह्मण चेहरा भी. कांग्रेस नेतृत्व ने जितिन प्रसाद को लखनऊ से कोलकाता भेज दिया था. वो लौटे तो दिल्ली होकर ही, लेकिन लौटते वक्त भगवा धारण कर चुके थे.

कांग्रेस में नाजुक मौकों पर प्रियंका गांधी संकटमोचक तो बन जाती हैं, लेकिन संकट के बादल कभी लंबे समय के लिए छंट जाते हों, ऐसा क्यों नहीं होता?

प्रियंका गांधी मध्यस्थ तो फौरन बन जाती हैं, लेकिन छोटे से फैसले का भी अधिकार उनके पास कभी होता हो, ऐसा तो नहीं लगता. ताजा मिसाल तो सिद्धू से मुलाकात ही है - एक केस को सॉल्व करने के लिए कांग्रेस में प्रियंका गांधी जैसी नेता को छह-छह मुलाकातें करनी पड़ती है.

मुलाकातें भी ऐसी कि अकेले प्रियंका गांधी को दो-दो बार सिद्धू से भी मिलना पड़ता है, राहुल गांधी से भी मिलना पड़ता है और सोनिया गांधी से भी. अगर कांग्रेस का कोई और नेता ऐसी भागदौड़ करता तो बात समझ में भी आती, लेकिन प्रियंका गांधी के साथ भी वैसा ही हो, काफी अजीब लगता है.

प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस महासचिव बनाये जाने के बाद CWC की मीटिंग हुई तो उनकी सीट पर खास तौर पर ध्यान गया. प्रियंका गांधी को सोनिया गांधी या राहुल गांधी के आस पास नहीं बल्कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और दूसरे कांग्रेस महासचिवों के साथ बिठाया गया था. राहुल गांधी महज सांसद होकर भी कभी उतने दूर नहीं बिठाये गये.

कांग्रेस पदाधिकारी के तौर पर देखा जाये तो प्रियंका गांधी तो पार्टी महासचिव हैं, जबकि राहुल गांधी कार्यकारिणी सदस्य होने के अलावा महज एक सांसद हैं. कांग्रेस के अध्यक्ष जरूर रह चुके हैं.

ये सब प्रियंका गांधी को लो प्रोफाइल प्रोजेक्ट करने की कवायद होती है या वास्तव में प्रियंका गांधी को उससे ज्यादा शेयर नहीं मिल पाता? कांग्रेस महासचिव बनाकर प्रियंका गांधी को यूपी का जिम्मा जरूर दिया गया है. मतलब, वो अपनी अलग शख्सियत होने के बावजूद एक राज्य स्तर के नेता के तौर पर स्थापित करने के लिए भी संघर्ष कर रही हैं.

ऐसा क्यों लगता है जैसे प्रियंका गांधी को कांग्रेस में सिर्फ एक ही विशेषाधिकार हासिल है - बगैर समय लिए वो राहुल गांधी और सोनिया गांधी से कभी भी मिल सकती हैं. राहुल गांधी ने ऐसी ही सुविधा, जैसा कि बाद में बताया था, तो सिंधिया को भी दे रखी थी. संयोग देखिये कि यूपी में दोनों को बराबर हैसियत मिली थी.

प्रियंका गांधी ही अगर संकटमोचक बनने की कोशिश कर रही हैं या राहुल सोनिया ऐसे रोल में उनकी मदद ले रहे हैं - तो उनको और भी अधिकार देने होंगे.

अगर प्रियंका गांधी किसी मामले में समझौता कराती हैं, तो उस पर वाकई अमल भी हो पाये ये देखना ही होगा - वरना, प्रियंका गांधी को लेकर कांग्रेस नेताओं का भरोसा तो जाता ही रहेगा, उम्मीद भी टूट जाएगी - आखिर प्रियंका गांधी का हर एक्ट कांग्रेस में उनकी हैसियत क्यों बताने लगता है?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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