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Updated: 22 सितम्बर, 2016 11:30 AM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
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किसी भी शब्‍द में हर शब्‍द के जन्‍म के साथ जुड़ा होता है उसका मंथन. तो यदि ‘stalker’ (स्टॉकर) के लिए हिंदी में शब्‍द नहीं है तो क्या यह मान लिया जाए कि इस बारे में हमारे समाज ने कभी सोचा ही नहीं.

यहां ये कहने की जरूरत इसलिए पड़ रही है क्योंकि इसी शब्द ने इस ओर सोचने पर मजबूर कर दिया. 'स्टॉकर' अंग्रेजी शब्द है, जो हिंदी में बिलकुल प्रचलित नहीं है. लेकिन स्‍टॉकिंग एक ऐसी समस्‍या है, जो दुनिया के किसी भी हिस्‍से की तरह भारत में बेहद आम है. तो क्या यह मान लिया जाए कि हमारे समाज ने इस समस्‍या या मनोस्थिति से अपना मुंह मोड़ रखा ?

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 आखिर हिंदी में क्या कहेंगे स्टॉकर को ?

स्‍टॉकर का अर्थ अगर इंटरनेट पर ढ़ूंढेंगे तो वो है- शिकारी, शाही ढंग से चलने वाला, दबे पांव पीछा करने वाला या पीछा करके शिकार करने वाला व्यक्ति. लेकिन ये सभी शब्‍द भाव हैं, अर्थ नहीं. इससे आप 'स्टॉकर' का मतलब तो समझ जाएंगे, लेकिन इस क्रूर विकृति को नाम नहीं दे पाएंगे. अब सवाल यह है कि इसे नाम देने की जरूरत क्या है ?

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जरूरत है. क्योंकि कुछ लोगों ने इस शब्‍द का विभत्‍स रूप सरेआम सड़कों पर दिखाना शुरू कर दिया है. अभी भी इस तरह के लोगों के लिए अक्सर हम सनकी, मनचला, दीवाना, लफंगा, सिरफिरा या वहशी आदि शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. जबकि देखा जाए तो इन शब्दों के अपने अलग मायने हैं. फिर ऐसे लोगों को क्या कहा जाए जो महिलाओं का छिपकर पीछा करते हैं, जो मानसिक विकृत भी होते हैं, हिंसक भी और हत्यारे भी. 

कितने आश्चर्य की बात है कि हमारा समाज इन जैसे लोगों को सिर्फ इन कुछ शब्दों से ही संबोधित करता आया है. हमारे समाज ने 'स्टॉकिंग' या 'स्टॉकर' जैसे शब्दों की जरूरत को समझा ही नहीं.

लड़कियों से ये तो कहा गया कि लोगों से ज्यादा हंस-हंसकर बात न किया करो, सड़क पर सिर नीचे झुकाकर चला करो, चुप चाप रहा करो वगैरह वगैरह. हमारा समाज ये तो जानता है कि लोग किस तरह के होते हैं, वो लड़कियों को लेकर क्या सोचते हैं, किस तरह की हरकतें कर सकते हैं, लेकिन समाज इस तरह के लोगों के लिए एक नाम नहीं दे पाया. बल्कि ऐसे लोगों को स्‍वीकार करता आया. 

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स्‍टॉकर शब्‍द को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह कोई टीवी या रेडियो जैसा नहीं है, जिसका अंग्रेजी रूप प्रचलित है, तो वो भी चल जाएगा. जैसे अंग्रेजी में 'साड़ी' के लिए कोई शब्‍द नहीं है, क्‍योंकि यह पश्चिमी समाज के लिए सिरदर्द नहीं है. साड़ी वहां का पहनावा नहीं है, इसलिए ये शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं है. लेकिन, 'स्टॉकर' तो वहां के समाज में भी है और हमारे समाज में भी. फिर इसे हिंदी में क्यों नहीं समझा गया ?

हमारे समाज ने जो स्‍वीकार किया, वह फिल्‍मों ने दिखा दिया 

समाज का आईना कही जाने वाली फिल्मों पर गौर करें तो महिलाओं से प्रेम निवेदन करना, और फिर उनकी ना को भी हां समझना, या न करने पर भी पीछा करते रहना ही तो देखते आए हैं हम.

फ्लैश बैक में जाइए.. बॉलीवुड का विलेन रंजीत रेप के लिए ही मशहूर रहा. सैकड़ों रेप सीन किए. और हर बार टॉकीज में खूब सीटियां बजीं. अब विलेन की छोडि़ए, हीरो पर आइए. राजकपूर का वो गाना याद है 'मेरे मन की गंगा और तेरे मन की यमुना का.. बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं' और हीरोइन कहती रही ‘नहीं...नहीं... कभी नहीं’. आखिर में जब वह कहती है, अच्‍छा बाबा होगा... होगा... तो वह न जाने कितने मनबढू आशिकों के हौंसले बढ़ा जाती है. और उस गाने को क्या कहेंगे 'प्यार के इस खेल में दो दिलों के मेल में, तेरा पीछा न मैं छोड़ुंगा सोणिए, भेज दे चाहे जेल में'. कुछ न कुछ तो सिखा ही रहा है ना.

फिर अमिताभ बच्चन को देखिए, जो खुल्लम खुल्ला गा रहे हैं कि 'जुम्मा चुम्मा दे दे.. और हीरोइन कहती है जुम्मा चुम्मा न दे'. हीरोइन अगर गुस्सा हो जाए तो उसके लिए भी ये गाना मौजूद है 'कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और भी हसीन हो जाती है'. यानि महिला के गुस्सा की कोई कीमत थी ही नहीं. 

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'कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और भी हसीन हो जाती है'

लेकिन इससे एक लेवल ऊपर के इंसान को फिल्म 'डर' में ही देखा था. शाहरुख खान जो 'आई लव यू.. क..क..क..किरण' कहता था, कहता था 'तू हां कर या न कर तू है मेरी किरण'. किरण से प्यार तो करता था लेकिन इस जुनून में वो एक विलेन बन गया.

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 तू हां कर...या ना कर... तू है मेरी किरण

समाज ने शाहरुख खान को सिर्फ एक विलेन कहा.. दीवाना कहा... पागल भी कहा. इससे ज्यादा किसी ने कुछ समझा ही नहीं... बल्कि शाहरुख का ये किरदार तो लोगों को इतना पसंद आया कि अगले साल शाहरुख खान ने फिल्म अंजाम में भी ऐसे ही एक सनकी इंसान का रोल निभाया. फिर फिल्म 'तेरे नाम' में सलमान खान भी लंबे बालों के साथ आए और ऐसे ही एक दीवाने की झलक दिखा गए.

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लेकिन देखा जाए तो ये किरदार और एक्टर्स हमारे रोल मॉडल नहीं, बल्कि समाज की मान्‍यताएं इन फिल्‍मों के लिए रोल मॉडल हैं. इसीलिए, वे फिल्‍मों का नाम होता है- दीवाना मुझसा नहीं, आशिक आवारा. लेकिन हिंदी नाम नहीं मिलता कि स्टॉकर को क्या कहा जाए. बुराड़ी में करुणा के शरीर में करीब 22 बार कैंची घोंपी गई, फिर पैर से उसके शरीर को लात मारी. लड़की वहीं मर गई. और मारने वाला कौन है- दीवाना, सनकी, पागल ? सोचिए...

Stalker, Woman, Society

लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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