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Updated: 06 नवम्बर, 2018 06:01 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujkumarmaurya87
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जब सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखे जलाने के लेकर फैसला सुनाया और एक निश्चिय समय निर्धारित कर दिया तो अधिकतर लोग इस फैसले के विरोध में ही दिखे. लोगों को पर्यावरण और प्रदूषण नहीं दिखा, उन्हें सिर्फ दिखा एक त्योहार, जिसे मनाने का तरीका सुप्रीम कोर्ट ने सुझाया. सवाल तो ये भी उठे कि सुप्रीम कोर्ट कौन होता है हिंदुओं के त्योहार में टांग अड़ाने वाला. लोगों को दिवाली का त्योहार रोशनी का त्योहार नहीं लगता, बल्कि वह इसे सिर्फ आतिशबाजी से जोड़कर देखते हैं. लेकिन इन सबके इतर तमिलनाडु में कुछ ऐसे गांव हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कई साल पहले से ही पर्यावरण को बचाने के लिए पटाखे नहीं फोड़ते हैं. हालांकि, उनका तर्क भी उनकी आस्था से जुड़ा है, लेकिन अगर इससे पर्यावरण की रक्षा होती है, तो ऐसी आस्था सब में होनी चाहिए.

दिवाली, सुप्रीम कोर्ट, प्रदूषण, तमिलनाडुतमिलनाडु के कुछ गांव दिवाली पर पटाखे ही नहीं फोड़ते. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कभी नहीं फोड़ते पटाखे

तमिलनाडु के त्रिचि जिले में थोप्पुपट्टी और सामपट्टी नाम के दो गांव हैं, जो दिवाली पर पटाखे नहीं जलाते. इन गांवों में करीब 500 परिवार रहते हैं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो पटाखों को लेकर अब आया है, लेकन इन गांवों के लोग कई सालों से पटाखे नहीं फोड़ते हैं. इसकी वजह है उनकी आस्था, जो चमगादड़ों में होती है.

चमगादड़ों को पूजते हैं गांव वाले

इन गांवों के बीच एक बरगद का बड़ा सा पेड़ है, जिस पर चमगादड़ों की एक खास प्रजाति भी रहती है. फल खाने वाले ये चमगादड़ इस गांव में करीब 25 साल पहले आए थे. गांव वाले दिवाली में पटाखे इसलिए नहीं जलाते क्योंकि पटाखों के शोर से चमगादड़ों को परेशानी होती है. गांव वाले तो इन चमगादड़ों की पूजा तक करते हैं. बहुत से गांव वाले तो ये भी मानते हैं कि ये चमगादड़ गांव के लिए भाग्यशाली हैं और गांव की रक्षा भी करते हैं. बरगद के पेड़ से सटा हुआ एक मंदिर भी है, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है.

सामपट्टी गांव में रहने वाले एक व्यक्ति धनराज ने कहा- 'ये चमगादड़ शाम के समय में खाने की तलाश में निकलते हैं. वो करीब 100 किलोमीटर तक का सफर तय करते हैं और सुबह होते-होते वापस पेड़ पर लौट आते हैं. गांव के ऊपर उड़ते हुए चमगादड़ों को रात में साफ देखा जा सकता है. हम चमगादड़ों को अपने गांव का रक्षक मानते हैं. हम दिवाली का उत्सव परंपरा के अनुसार ही मनाते हैं, लेकिन पटाखे नहीं फोड़ते, क्योंकि उससे चमगादड़ों को दिक्कत होती है.'

और भी गांव हैं पर्यावरण के रक्षक

जहां एक ओर त्रिची जिले के गांवों में चमगादड़ों को दिक्कत ना हो, इसलिए पटाखे नहीं फोड़े जाते, वहीं दूसरी ओर, तिरुनेलवेली जिले के कूठांकुलम गांव के लोग पक्षियों के लिए एक खास सहानुभूति दिखाते हैं. इस गांव में एक बर्ड सेंचुरी है, जिसे गांव वाले किसी खजाने से कम नहीं समझते. इस सेंचुरी में बहुत सी प्रजातियों के पक्षी रहते हैं, जो दूर-दूर से आए हैं. इस बर्ड सेंचुरी के आसपास करीब 8 गांव हैं, जो दिवाली में पटाखे नहीं फोड़ते, ताकि पक्षियों के दिक्कत ना हो.

जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद लोग उसे मानने को तैयार नहीं हैं, उन्हें तमिलनाडु के इन गांवों से सीख लेनी चाहिए. जो लोग धर्म में आस्था के नाम पर दिवाली के त्योहार में सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं कर रहे, उन्हें इन गांव वालों से सीखना चाहिए कि धर्म में आस्था से अच्छा है प्रकृति और जीव-जंतुओं में आस्था रखी जाए. जो लोग इस दिवाली भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाने की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें ये भी समझना चाहिए कि वह पर्यावरण को दूषित करने में अपना योगदान दे रहे हैं. प्रकृति को हम जो भी देते हैं, प्रकृति हमें वो सब वापस कर देती है. ठीक उसी तरह, जितना प्रदूषण हम इस पर्यावरण में करेंगे, वो सारा हमें वापस मिलेगा ही और हमारी सांसों को जहरीला करेगा. दिल्ली में फैला प्रदूषण भी प्रकृति का वही तोहफा है, जो हम प्रकृति को देते हैं.

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