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Updated: 03 नवम्बर, 2018 06:11 PM
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दिल्ली में एक और सुबह हुई और एक और दिन ज्यादा लोगों ने प्रदूषण के साथ बिताया. सूरज की गर्मी और मौसम ऐसा दिखता है जैसे ठंड का कोई बेहद कोहरे वाला दिन हो. दिल्ली सरकार ने प्रदूषण रोकने के लिए इमर्जेंसी प्लान तो लागू कर दिया, लेकिन जिस तरह से मौसम बदल रहा है ऐसा लगता है कि दिवाली के बाद समस्या और भी ज्यादा बढ़ जाने वाली है और लोगों को सांस लेने के लिए भी मास्क, एयरप्यूरिफायर आदि की मदद लेती होगी. यानी दिल्ली में सांस लेने योग्य हवा के लिए भी पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं.

दिल्ली की हालत इतनी बुरी है कि यहां प्रदूषण का लेवल 600 AQI पार कर चुका है और इस हवा में सांस लेना इतना खतरनाक है जितना कि 50 सिगरेट रोज़ पीना. दिल्ली के साथ-साथ गाज़ियाबाद, गुड़गांव, नोएडा भी बेहद प्रदूषित हैं और हालात दिन प्रति दिन बद्तर होते जा रहे हैं. पर क्या आप जानते हैं कि चीन में इससे भी बुरे हालात रह चुके हैं.

2013 जनवरी के दौरान चीन में प्रदूषण का लेवल इतना बुरा था कि AQI लेवल 993 पहुंच चुका था. ये अगर 50 तक रहे तो ही हवा को साफ और सही माना जाता है. ये वही दिन था जब न्यूयॉर्क में AQI 19 था. जरा सोचिए क्या दौर रहा होगा वो? लेकिन 2018 आते-आते बीजिंग में AQI नॉर्मल रेंज तक पहुंच गया और प्रदूषण से बचने के लिए किए गए सभी उपाय कारगर साबित हुए. चीन के साथ उस दिन जो हुआ उसे रिकॉर्ड कहा जा रहा था, लेकिन दिल्ली ने नवंबर 2017 में वो रिकॉर्ड भी पार कर दिया. दिल्ली का AQI 999 था. उस समय कई अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट्स कैंसिल हो गईं और विजिबिलिटी इतनी खराब हो गई थी कि गाड़ियां आपस में टकराने लगी थीं.

दिल्ली में तो पिछले कई सालों से यही चला आ रहा है. हर साल इसी तरह प्रदूषण फैलता है और सरकार इमर्जेंसी प्लान लागू करती है पर अहल में कुछ होता नहीं है. पर अगर चीन की बात करें तो 2013 में चीन के हालात इतने बुरे थे कि तुरंत कुछ करना था. लेकिन सिर्फ पांच सालों में आलम ये हो गया कि कई दशकों का प्रदूषण एक साथ काबू में आ गया.

ये तस्वीर thebeijinger.com द्वारा पब्लिश की गई थी. 31 अक्टूबर को बीजिंग का AQI 55 था और दिल्ली का 373ये तस्वीर thebeijinger.com द्वारा पब्लिश की गई थी. 31 अक्टूबर को बीजिंग का AQI 55 था और दिल्ली का 373प्रदूषण रोकने के लिए क्या किया चीन ने?

सबसे पहले तो चीन ने एक वॉर्निंग सिस्टम बनाया. यहां लाल रंग का मतलब था रेड अलर्ट, ऑरेंज लाल से थोड़ कम खतरनाक, पीला उससे कम खतरनाक और नीला सबसे कम खतरनाक. चीन की 31 प्रांतों में से 25 खास तौर पर प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे थे और चीन को 800 मिलियन की जनसंख्या को बचाना था.

अगर चीन में रेड अलर्ट है तो सबसे पहले ऑड-ईवन फॉर्मुला लागू किया जाता है. इसके अलावा, पब्लिक ट्रांसपोर्ट की संख्या बढ़ा दी जाती है. अलर्ट के समय सिर्फ स्कूल ही नहीं बल्कि फैक्ट्रियां भी बंद कर दी जाती हैं. जो काम चलते हैं उन्हें भी एक निर्धारित पैरामीटर में काम करना पड़ता है. उदाहरण के तौर पर सर्दियों में ऐसी फैक्ट्रियों को जिनसे ज्यादा प्रदूषण फैलता है बंद कर दिया जाता है.

बीजिंग की तरफ से स्मॉग पुलिस भी तैनात की गई है जो शहर की पैरवी करती रहती है और जैसे ही कुछ ऐसा दिखता है जिससे प्रदूषण फैल रहा हो उसे रोका जाता है और निर्धारित धारा लगाकर संबंधित लोगों को सज़ा दी जाती है. इसी के साथ, कई पब्लिक प्रोजेक्ट का कंस्ट्रक्शन बंद कर दिया जाता है.

चीन ने युद्ध स्तरीय तौर पर काम शुरू कर दिया. 2013 सितंबर में ही स्टेट काउंसिल ने एक एक्शन प्लान लागू कर दिया जो प्रदूषण से बचाने में समर्थ हो. पांच साल में चीन को पूरे देश का प्रदूषण नॉर्मल करना था ताकि लोगों को आसानी हो सके.

इस प्लान ने कोयले के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था. चीन का कोयले का इस्तेमाल करीब 50 प्रतिशत तक 5 सालों में कम हो गया. इसके अलावा, जो लोग कोयले का इस्तेमाल भी कर रहे थे वो भी कई फिल्टरों के साथ कर रहे थे. इसके अलावा, कई मामलों में बैन लगाए गए. जैसे 2011 में ही चीन में कार खरीदने को लेकर बैन लगा दिया गया था और उसे बहुत अच्छे से निभाया गया. एक महीने में सिर्फ 20 हज़ार नंबर प्लेट ही चीन में बिक सकती थीं और उसके लिए भी 2 लाख से ज्यादा एप्लिकेशन आने लगी और लॉटरी सिस्टम लगा. लेकिन इस नियम को अच्छे से लागू किया गया. ये सिस्टम 2017 में 1.5 लाख प्रति साल तक बढ़ गया था जिसे 2018 में 1 लाख कर दिया गया. कार खरीदने के लिए चीन में अभी भी लॉटरी का सहारा लेना पड़ता है और इससे कारों की संख्या कम होती है. इसके अलावा, 1 लाख कारें जो बिकती हैं उनमें से भी 60% कोटा एनर्जी कारों का है. सिर्फ 40% ही पेट्रोल, डीजल और गैस वाली कारें रहती हैं.

इसी तरह प्रदूषण को लेकर भी कई नियम लागू हुए. यहां तक की चीन ने शहरों के बीच में ही जंगल बना दिए. बीजिंग शहर के बीचों बीच 21 छोटे-छोटे ग्रीन पार्क, 10 बड़े पार्क और 100 किलोमीटर के एरिया में ग्रीनवे बनाया गया. ये सिर्फ 2018 के आंकड़े हैं.

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2013 में बीजिंग में सिर्फ 176 दिन नीला आसमान दिखता था और पिछले साल यही आंकड़ा 226 दिन था. अगर इसी तरह चीन काम करता रहा तो ये आंकड़ा और बढ़ेगा.

दिल्ली और बीजिंग अंतरराष्ट्रीय नजरों में आए और वजह सिर्फ प्रदूषण है. न कि इनका विकास और आर्थिक बढ़त. जहां चीन की तरफ से हर मुमकिन कोशिश की गई अपना घर बचाने की वहीं दिल्ली आम तौर पर अपने ढर्रे पर ही चल रहा है. जब्कि अब दिल्ली में हालात चीन से दुगने खराब हैं.

दिल्ली की सड़कों पर 75 लाख से ज्यादा कारें हैं और हर दिन लगभग 1400 नई गाड़ियां दिल्ली की सड़कों पर आती हैं. यहां सिर्फ बातें ही होती हैं कि प्रदूषण रोका जाएगा पर होता कुछ नहीं है. पिछले कई सालों से दिल्ली की हवा बुरी से बुरी होती जा रही है, लेकिन इसके लिए कुछ किया नहीं गया. सिर्फ हर साल इमर्जेंसी लागू होती है, लेकिन परिणाम क्या हैं ये कोई नहीं जानता.

पूरी दुनिया के आंकड़े अगर देखें तो प्रदूषण से मरने वालों की संख्या भारत में सबसे ज्यादा है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में 1 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत प्रदूषण के कारण हो गई. अगर देखा जाए तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली की सरकारें हर साल कुछ करने को कहती हैं, लेकिन कुछ होता नहीं. सरकार के पास ऐसा कोई भी ठोस तरीका नहीं दिखता जिससे वो प्रदूषण को रोक सके.

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