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Updated: 17 सितम्बर, 2019 11:47 AM
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पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदुओं की बस्ती पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने हमला कर दिया, जिसके बाद दंगे भड़क गए. घटना गोटकी नाम की जगह की है, जहां पर हिंदुओं के घरों, दुकानों, स्कूलों और मंदिरों में जमकर तोड़फोड़ की गई. लेकिन पता है इन सब की शुरुआत कहां से हुए, एक महज 13 साल के बच्चे से. जी हां, उस बच्चे ने अपने हिंदू प्रिंसिपल नोतन दास पर ईशनिंदा का आरोप लगाया और मां-बाप से शिकायत की. बच्चे के पिता अब्दुल अजीज राजपूत ने इसे लेकर सिंध पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई. इसके बाद वह कट्टरपंथी मुस्लिम लीडर अब्दुल हक के पास गए, जो सिंध में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण कराने में शामिल रहा है. उसने मस्जिदों से लाउड स्पीकरों के जरिए मुस्लिम समुदाय के लोगों को भड़काया और तोड़फोड़ शुरू हो गई. प्रिंसिपल के खिलाफ धारा 295 के तहत ईशनिंदा कर के आरोप में मामला दर्ज कर लिया गया है.

पाकिस्तान में जो कुछ हुआ, पूरा हिंदुस्तान उसकी निंदा कर रहा है. खुद पाकिस्तान के भी बहुत से लोग इसे दुर्भाग्यपूर्ण कह रहे हैं. वहीं प्रिंसिपल को ईशनिंदा के आरोप में गिरफ्तार करने पर भी बहुत से लोग हैरान हैं कि आखिर ऐसा भी कानून है पाकिस्तान में. दरअसल, इस कानून की जड़ें हिंदुस्तान के कानून से भी जुड़ी हैं. आइए जानते हैं पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून की 10 खास बातें-

1- भारतीय दंड संहिता 1860 से जुड़ी हैं इसकी जड़ें

1860 में ब्रिटिश सरकार ने धर्म से जुड़ी बातों या चीजों का अपमान करने वाले को सजा देने के लिए ये कानून बनाया था. जब आजादी के बाद 1947 में पाकिस्तान भारत से अलग हुआ तो उसने ईशनिंदा के इस कानून को अपने कानून में शामिल कर लिया. ईशनिंदा के इस कानून को पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 295-बी और 295-सी के तहत जनरल जिया उल हक ने लागू किया था.

पाकिस्तान, ईशनिंदा, मुस्लिमपाकिस्तान के ईशनिंदा कानून की जड़ें भारतीय दंड संहिता से जुड़ी हैं.

2- ईशनिंदा कानून धार्मिंक हिंसा को रोकने के लिए बनाया गया था

ब्रिटिश सरकार ने इस कानून को इसलिए बनाया था ताकि धार्मिंक हिंसा को रोका जा सके. इसके तहत किसी भी धर्म का अपमान करना या किसी के पूजा-पाठ के स्थान या चीज को नुकसान पहुंचाना गलत था. 1927 में ब्रिटिश सरकार ने इसे कानून बना दिया कि जान बूझ कर किसी की भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना अपराध होगा. आपको बता दें कि यह कानून धर्मों में फर्क नहीं करता था.

3- 1986 में ये कानून लाया गया कि जो भी पवित्र पैगंबर के खिलाफ कुछ बोलेगा, उसे मौत की सजा होगी

पाकिस्तान की सेना के शासक जिया उल हक ने ईशनिंदा कानून में कुछ बदलाव किए. वह 1977 से 11 सालों तक सत्ता में रहे. उन्होंने ईशनिंदा कानून में ये बात भी जोड़ दी कि जो भी पैगंबर की बुराई करेगा या फिर कुरान की बुराई करेगा, उसे मौत की सजा दी जाएगी. सेक्शन 295-सी के तहत पैगंबर के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना अपराध बना दिया गया.

4- 1991 में फेडरल शरियत कोर्ट के फैसले के बाद उम्र कैद की सजा को खत्म कर दिया गया

1991 में मोहम्मद इस्माइल कुरैशी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए फेडरल शरियत कोर्ट ने पाया कि 295-सी के तहत दी जाने वाली उम्र कैद की सजा इस्लाम के प्रसार के प्रतिकूल है. इसके बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पैगंबर का अपमान करने वाले को सजा-ए-मौत दी जाएगी. सरकार को 30 अप्रैल 1991 को सेक्शन 295-सी में बदलाव करने के लिए कहा गया. हालांकि, बाद में फेडरल शरियत कोर्ट के खिलाफ एक याचिका भी दायर की गई, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया गया.

5- 1986 से पहले तक ईशनिंदा के महज 10 केस ही दर्ज हुए

1927 से लेकर 1985 तक 58 सालों तक ईशनिंदा के मामलों की कोर्ट में सुनवाई हुई, लेकिन दिलचस्प है कि इतने दिनों में सिर्फ 10 ही मामले दर्ज हुए. हालांकि, 1985 के बाद करीब 4000 मामलों में सुनवाई हो चुकी है, जो हैरान करने वाला आंकड़ा है.

6- अभी तक इस कानून के तहत किसी को भी फांसी नहीं दी गई है

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में ईशनिंदा के लिए किसी को मौत की सजा नहीं सुनाई गई, लेकिन फांसी पर चढ़ाने से पहले या तो सजा बदल दी गई या फिर दोबारा सुनवाई की याचिका दायर होने के बाद उस पर कार्रवाई हो रही है. 2015 की इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की स्टडी में पाया गया कि पाकिस्तान में जिन लोगों को ट्रायल कोर्ट ने ईशनिंदा के आरोप में सजा सुनाई थी, उनमें से करीब 80 फीसदी मामलों में याचिका दायर कर के सजा को पलट दिया गया. अधिकतर मामलों में सबूत की कमी के साथ-साथ ये पाया गया कि शिकायतें निजी और राजनीतिक वजहों से की गई थीं.

7- अधिकतर मामले गैर-मुस्लिमों के खिलाफ

गैर-मुस्लिमों के खिलाफ करीब 702 मामले दर्ज हुए हैं. यानी कुल मामलों के करीब 52 फीसदी के देश की महज 4 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी के खिलाफ दर्ज हैं. आलोचक कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता से दिखाना ये साफ करता है कि इस कानून को गलत तरीके से लागू किया गया है. अक्सर इस कानून का इस्तेमाल अपनी निजी दुश्मनी निकालने के लिए इस्तेमाल किया गया, जबकि उसका धर्म से कोई लेना देना नहीं था.

8- इन कानून के खिलाफ बोलने पर दो हाई प्रोफाइल लोगों की हत्या कर दी गई

ईशनिंदा पर तो मौत की सजा है ही, लेकिन इस कानून के खिलाफ आवाज उठाना भी जानलेवा साबित हुआ. 2010 से ही मौत की सजा के खिलाफ लड़ रही आसिया बीबी की ओर से पक्ष रखते हुए सलमान तासीर ने इस कानून में संशोधन के लिए आवाज उठाई थी तो 2011 में उन्हीं के बॉडीगार्ड ने उन्हें गोली मार दी. सलमान तासीर की मौत के करीब महीने भर बाद शाहबाज भट्टी, जो कि धार्मिक अल्पसंख्यक मंत्री भी थे, उन्होंने इस कानून के खिलाफ बोला था. नतीजा ये हुआ कि उन्हें भी इस्लामाबाद में गोली मार दी गई.

9- सिर्फ 2014 में ही पंजाब प्रांत में ईशनिंदा के 336 मामले दर्ज हुए

जिन सात जिलों के लोगों पर ईशनिंदा के मामले सबसे अधिक दर्ज हुए, उनमें लाहौर, फैसलाबाद, सियालकोट, कसूर, शेखपुरा, गुजरावाला और टोबा टक सिंह हैं.

10- आसिया बीबी का पहला ऐसा मामला है, जिसकी सुनवाई सेक्शन 295-सी के तहत सुप्रीम कोर्ट में हुई

आसिया बीबी पर ईशनिंदा का आरोप जून 2009 में लगा था, जब वह एक खेत में काम कर रही थीं. वहां उनसे मुस्लिम महिलाओं ने पानी लाने के लिए कहा था. वह पानी लाई भीं, लेकिन चिलचिलाती धूप में एक-दो घूंट खुद पी लिए. ईसाई धर्म की आसिया बीबी की ये बात मुस्लिम महिलाओं को पसंद नहीं आई और उन पर पैगंबर का अपमान करने का आरोप लगा दिया गया. उन्हें घर से निकाल कर पीटा गया और फिर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. आसिया बीबी के मामले में विशेषज्ञों का कहना था कि अगर उनकी फांसी की सजा को बदला जाता है तो इससे हिंसा हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में सबूतों के अभाव में आसिया बीबी को बरी कर दिया था, जिसके बाद पाकिस्तान में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए.

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