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Updated: 02 अक्टूबर, 2019 08:41 PM
हिमांशु सिंह
हिमांशु सिंह
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मैं एक कट्टर हिन्दू परिवार से हूं. गांधी को गरियाने वालों के बीच रहकर बड़ा हुआ हूं. वे सभी गांधी को मुस्लिम-परस्त और हिन्दू विरोधी कहते थे. लंबे समय तक मैंने भी गांधी को गालियां दीं हैं और गांधी के पक्ष में बहस करने वालों को बेवकूफ समझता रहा हूं. पर अब नहीं समझता. जिस दिन पहली बार गांधी को पढ़ा था, उसी दिन बन्द कर दिया था. अब मेरा मानना है कि हर वो व्यक्ति जिसने गांधी को नहीं पढ़ा, नहीं समझा, गांधी का अनिवार्य विरोधी होता ही है. और हो भी क्यों न! एक थप्पड़ खाने के बाद दूसरा थप्पड़ खाने के लिए सहज भाव से गाल आगे करने वाली फिलॉसफी समझना इतना आसान भी नहीं है. वैसे भी भारत में गांधी को पढ़ने वाले कम और उनकी बातें करने वाले ज्यादा हैं. गांधीवाद की विकृत व्याख्या करने वाले तो और भी ज्यादा हैं. और अफवाहें तो अनंत काल से देश में संचार का माध्यम रही ही हैं. खैर, गांधी को पढ़ने के बाद जो पहली बात मैं समझ पाया हूं, वो ये है कि हिन्दू का कट्टर होना दरअसल हिन्दू का पथभ्रष्ट होना है. कोई भी व्यक्ति सच्चा हिन्दू हो सकता है. कम हिन्दू या ज्यादा हिन्दू हो सकता है. यहां तक कि नास्तिक भी हिन्दू हो सकता है. लेकिन कट्टर होना किसी सचेत हिन्दू की विशेषता नहीं हो सकती.

महात्मा गांधी, हिंदू, हिंदुत्व, गांधी जयंती, Mahatma Gandhiऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या है जिन्होंने गांधी का विरोध तो कर दिया मगर शायद ही उन्हें या उनके बारे में कहीं कुछ पढ़ा हो

गांधी खुद कहते हैं कि 'हिन्दू धर्म सभी लोगों को अपने-अपने धर्म के अनुसार ईश्वर की उपासना करने को कहता है, और इसीलिए इसका किसी धर्म से कोई झगड़ा नहीं है. हिन्दू धर्म अनेक युगों का विकास फल है. हिन्दू लोगों की सभ्यता बहुत प्राचीन है और इसमें अहिंसा समाई हुई है. हिन्दू धर्म एक जीवित धर्म है. हिन्दू धर्म जड़ बनने से इनकार करता है.' मेरी अपनी समझ है कि हिन्दू धर्म का जितना अंगीकार गांधी ने किया था, शायद ही किसी और ने किया हो. उन्हें नियमों की लोचशीलता के लाभों का भली-भांति ज्ञान था, जिसके चलते वो धर्म के नियमों की जटिलता एयर कठोरता के विरुद्ध थे.

मूर्ख हैं वो लोग जो गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों में हिन्दू धर्म की आत्मा को नहीं महसूस कर पा रहे हैं. आप ही बताइये, अट्ठारह पुराणों का मर्म बताने वाली पंक्तियां-

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वय

परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम

गांधी की प्रिय भजन- 'वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे रे' से कहां अलग है? क्या सत्य को ईश्वर मानने वाले गांधी 'सत' यानी शाश्वत और सर्वव्यापी यानी ईश्वर को सत्य मानकर हिन्दू धर्म की आत्मा से नहीं जुड़ गए थे? मैंने तमाम अनपढ़ और कमपढ़ लोगों को गांधी को कायर कहते भी सुना है. जबकि वो नहीं जानते कि गांधी ने स्पष्ट कहा था कि, 'सत्य और अहिंसा में से एक को चुनने की बाध्यता होने पर मैं सत्य को चुनूंगा'.समझने की बात भी है कि अहिंसा सत्य का ही एक मूल्य और अन्यरूप है. अगर सत्य ग्रह है तो अहिंसा उसके तमाम उपग्रहों में से एक उपग्रह.

हिन्दू धर्म की संकल्पना को लेकर गांधी की समझ कितनी स्पष्ट और समाहक थी, उसकी एक बानगी देखिये - 'यह हिन्दू-धर्म का सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य है कि वह कोई सत्तारोपित मत नहीं है. अतः अपने आपको किसी गलतफहमी से बचाने के लिए मैंने कहा कि सत्य और अहिंसा मेरा धर्म है. यदि मुझसे हिन्दू धर्म की व्याख्या करने के लिए कहा जाय तो मैं इतना ही कहूंगा- अहिंसात्मक साधनों द्वारा सत्य की खोज. कोई मनुष्य ईश्वर में विश्वास न करते हुए भी अपने आप को हिंदू कह सकता है. सत्य की अथक खोज का दूसरा नाम हिंदू-धर्म है.यदि आज वह मृतप्राय, निष्क्रिय अथवा विकासशील नहीं रह गया है तो इसलिये की हम थक कर बैठ गए हैं और ज्यों ही यह थकावट दूर हो जायेगी त्यों ही हिन्दू धर्म संसार पर ऐसे प्रखर तेज़ के साथ छा जायेगा जैसा कदाचित पहले कभी नहीं हुआ. अतः निश्चित रूप से हिन्दू-धर्म सबसे अधिक सहिष्णु धर्म है.'

'यंग इंडिया' में उन्होंने लिखा भी कि,'सिवाय अपने जीवन के और किसी अन्य ढंग से हिन्दू धर्म की व्याख्या करने के योग्य मैं खुद को नहीं मानता.' मुझे नहीं लगता कि गांधी के अलावा किसी और में यह स्वीकार करने और कहने का साहस था कि,'अभी जब तक हम गुलाम हैं, तब तक हम सभी मुख्यतः शूद्र ही हैं.'

उन्होंने चरखा चलाना साम्प्रदायिक धर्मों से श्रेष्ठ माना था. कहते थे कि, 'चरखे का सम्प्रदाय से श्रेष्ठ होने का मतलब यह नहीं है कि सम्प्रदाय को छोड़ दिया जाए. जो ब्राह्मण सेवा भाव से चरखा चलाता है वह अधिक अच्छा ब्राह्मण, वह मुसलमान अधिक अच्छा मुसलमान और वह वैष्णव अधिक अच्छा वैष्णव बनता है.मैं ऐसे समय की प्रतीक्षा में हूं जब मुझे रामनाम का जाप करना भी उपाधि रूप मालूम होने लगे. चरखा, माला और राम का नाम; ये मेरे लिए अलग-अलग चीजें नहीं हैं.'

ऐसे में ज़ाहिर है कि खुले दिमाग और व्यापक दृष्टिकोण वाले गांधी को बिना जाने-समझे मूढ़ बुद्धि और अज्ञानी लोग आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे. वे स्वीकार करें भी तो कैसे? हमें समझना ही होगा कि हमें डुबाने में सक्षम तमाम चीजें पहली मर्तबा हमें स्वीकार नहीं करतीं. लहरें पूरी कोशिश करती हैं हमें गहराइयों से दूर रखने की. बार-बार बाहर फेंकती हैं. नशे की चीजें भी पहली दफा हमें कहां स्वीकार करती हैं! हम खांसते हैं, हिचकियां आती हैं.

गहरे निहितार्थों वाला कोई दर्शन हो, गहरा प्रेम हो, चाहे कोई गंभीर किताब ही क्यों न हो. प्रथम दृष्ट्या बकवास ही साउंड करती हैं. ये उनका अपना तरीका है हमें खुद से दूर रखने का. हमारा समर्पण जांचने का. डूबने की हमारी इच्छा जिस समय इन प्रतिरोधों पर भारी पड़ने लगती है, डुबाने वाली ये तमाम चीजें हमें और भी अधिक तन्मयता से स्वीकार कर लेती हैं.

महात्मा गांधी का जीवन-दर्शन और हिंदुत्त्व का उनका स्वरूप भी इसी तरह का है. उनका हिंदुत्त्व जब हमें खुद परख लेगा, तो वो भी हमें स्वीकार कर लेगा. तब अपनी तमाम मूढ़ताओं को नकार कर हम उसे आत्मसात कर सकेंगे. और शायद तभी हम खुले मन और मुक्तकंठ से स्वीकार कर पाएंगे कि गांधी अब तक के सभी हिंदुओं से थोड़ा ज्यादा हिन्दू थे.

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हिमांशु सिंह हिमांशु सिंह @100000682426551

लेखक समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं

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