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Updated: 31 अगस्त, 2016 12:13 PM
स्नेहांशु शेखर
स्नेहांशु शेखर
  @snehanshu.shekhar
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नेशनल मीडिया पर देश की राजधानी की खबर तब दिखती है, जब बड़ा अपराध घट जाए या फिर ट्रैफिक जाम लग जाए. तुलना थोड़ी अजीब लगे, पर हकीकत यही है. यह थोड़ा शर्मनाक भी है, क्योंकि यहां कई बार मच्छरों का आतंक भी खबर बन जाती है. कम से कम देश की राजधानी की यह छवि ठीक है. हालांकि यह समस्या सिर्फ देश की राजधानी की ही नहीं है, थोड़े दिनों पहले लोगों ने गुडगांव, बेंगलुरू, मुंबई जैसे शहरों की भी कमोबेश यही स्थिति देखी थी.

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सड़कों पर पानी भरने की वजह से गुड़गांव में जाम के हालात

बारिश हुई नहीं कि जलजमाव और ट्रैफिक के हालात की पोल खुल जाती है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि खबरें तभी क्यों बनती है या चर्चा तभी क्यों होती है जब स्वयं गडकरी जाम में फंस जाएं या फिर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी. अब सोमवार को जब बारिश के बाद फिर दिल्ली और गुडगांव में जाम लगा, तो व्यवस्था, तंत्र, मीडिया सब फिर नींद से जगे.

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दिक्कत यह है कि इस बारिश को तो हर साल आना है, सड़कों की किस्मत भी सुधरने का नाम नहीं लेती, नाले-सीवर भी वैसे ही हैं, उनकी तस्वीर भी नहीं बदलती तो क्या तंत्र को जगाने के लिए किसी वीआईपी के फंसने का ही इंतजार किया जाए. उन लाखों दैनिक यात्रियों का कुछ नहीं, जो हर मौसम, बेमौसम या मौसमी बारिश में घंटों जाम में फंस कर घर सुरक्षित पहुंचने के लिए जूझते रहते हैं. और उस पर राजनीति शुरु हो जाए तो फिर क्या कहने.

मुझे याद है कि पिछली बार जुलाई में गुडगांव में बारिश के बाद जो वबंडर खड़ा हुआ, तब सबसे पहले दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने चुटकी लेनी शुरू की, पर एक दिन बाद जब चैनलों पर दिल्ली की बारिश की तस्वीर दिखाई जाने लगी, तब फिर सारी बहस दिल्ली सरकार बनाम एमसीडी की तरफ मुड़ गई. बहस ये होने लगी कि मेरा नाला तो ज्यादा साफ था, तुम्हारा गंदा है. मेरी सड़क तो ठीक है, जलजमाव तुम्हारे इलाके में ज्यादा है. मतलब मेरे इलाके का जाम तो रूटीन, पर तुम्हारा जाम सिस्टम की नाकामी.

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 राजधानी दिल्ली में 235 प्वाइंट ऐसे हैं जहां जलजमाव का खतरा मौजूद है

असल जानना है तो थोड़ा दिल्ली की व्यवस्था को समझना होगा. ट्रैफिक पुलिस की माने तो राजधानी में 235 प्वाइंट ऐसे हैं, जहां जलजमाव का खतरा मौजूद है. इनमें से 51 प्वाइंट नगर निगम के दायरे में आते हैं, जबकि करीब 150 प्वाइंट ऐसे हैं जो दिल्ली सरकार के अधीन आते हैं. बाकी एनडीएमसी और दिल्ली कैंट के इलाके में पड़ते हैं. और ऐसा नहीं कि यह स्थिति सिर्फ इस केजरीवाल सरकार के शासनकाल में झेलनी पड़ रही है. पहले शीला बनाम नगर निगम चलता था और अब केजरीवाल बनाम नगर निगम चल रहा है.

हकीकत ये है कि दिल्ली के ड्रेनेज सिस्टम को सुधारने के लिए 2001 में कवायद शुरू की गई थी, 2005 में एक कमेटी का गठन भी हुआ, लेकिन वह कमेटी 2012 तक कुछ न कर पाई, फिर मामला आईआईटी दिल्ली के पास भेजा गया, लेकिन अब तक आईआईटी दिल्ली को जरूरी डाटा मुहैया नहीं कराया गया है. इसे आप क्या कहेंगे. इसी तरह दिल्ली जल बोर्ड को सीवरेज सिस्टम को सुधारने के लिए मास्टर प्लान तैयार करना था, लेकिन आज की तारीख तक कुछ काम नहीं हो पाया.

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मोदी पर टिप्पणी करनी हो, या राष्ट्रीय या अंर्तराष्ट्रीय विषय पर केंद्र को कोसना हो, तो दिल्ली जल बोर्ड के चेयरमैन और मंत्री कपिल मिश्रा सर्वदा सोशल मीडिया पर उपलब्ध पाए जाएंगे, पर बुनियादी मसलों पर काम क्यों नहीं हो रहा, जिसमें किसी के हस्तक्षेप या सहयोग की दरकार नहीं, वहां भी काम क्यों नहीं हो पा रहा, यह अनुत्तरित सवाल है.

मुंबई, बेंगलुरू या अन्य महानगरों में कमोवेश परिस्थितियां एकसमान ही है. आबादी के विकास के लिहाज से जो मूलभूत ढांचे में तब्दीलियां लाई जानी चाहिए थीं, वह नहीं हो पाया. लिहाजा हर साल जब भी जोरदार बारिश हुई नहीं तो शहर में तालाब जैसे हालात पैदा हो जाते हैं. दिल्ली की स्थिति कुछ अलग है. यहां कई एजेंसियां है, दिल्ली सरकार है, नगर निगम है, एनडीएमसी है, दिल्ली कैंट बोर्ड. दिल्ली की कुल सड़कों को आठ अलग-अलग एजेंसियां देखती हैं, जिनमें एनएचएआई, पीडब्लयूडी, नगर निगम, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग शामिल हैं. न तो इनकी कोई सामूहिक मानसून प्लानिंग होती है और न तो कोई एक नोडल एजेंसी बनती है तो इन तमाम एजेंसियों के बीच तालमेल स्थापित कर पाए. दिल्ली की सड़कों की डिजाइन को लेकर भी कई बार सवाल खड़े हो चुके हैं. आप मानसून के दौरान किसी भी इलाके में चले जाइए, अमूमन आपको खुदाई के काम दिख जाएंगे. अब ये कौन समझदार एजेंसी हैं, जो बरसात में खुदाई का काम शुरू करती है, कोई नहीं बताता.

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 सरकारी नाकामी की पोल खोल रहे हैं जाम

पिछले महीने जब गुडगांव के हीरो होंडा चौराहे के पास भयंकर जाम लगा तो मूल में ऐसी ही खुदाई का मसला पाया गया, जिसकी वजह से वहां गड्डा हुआ. बारिश हुई तो गड्डे में पानी भरा, फिर गाडि़यां फंसी और जाम लग गया. अब उस वक्त पुलिस वाले भी वहां पहुंच कर क्या जादू दिखा पाते. यही दिल्ली में भी होता है. अब दक्षिण दिल्ली या पश्चिमी दिल्ली चले जाइए, खुदी सड़के दिख जाएंगी. इस व्यवस्था का कोई माई-बाप नहीं दिखता.

एक और कारण है, वह है अतिक्रमण. 2015 में एक सर्वे हुआ, जिसमें पता चला है कि सिर्फ अतिक्रमण के जरिए हुए निर्माण की वजह से करीब 200 नाले गायब हो चुके है. इनके ऊपर दुकानें बन गईं, या कुछ और. जो बरसाती पानी इन नालों के जरिए यमुना में जाता, वह नालों के बंद होने से सड़कों पर जमा होता है.

अब ऐसे में राजनीति करनी हो, तो विपक्ष कहेगा कि मुख्यमंत्री और उनकी टीम को पंजाब, गोवा, गुजरात से फुर्सत नहीं मिलती और जब थोड़ा वक्त मिलता है वह एलजी और मोदी से जंग में गुजर जाता है. पर सच यह है कि इसमें पहल भी दिल्ली सरकार को ही करनी है. एजेंसियों के बीच समन्वय और तालमेल की जिम्मेदारी भी उसी की है. टकराव के राजनीतिक कारण हो सकते हैं, पर यह जनता की कीमत पर हो, तो नुकसान किसका होता है, इतिहास में पन्नों में काफी कुछ दर्ज है, उनसे भी सबक लिया जा सकता है.

लेखक

स्नेहांशु शेखर स्नेहांशु शेखर @snehanshu.shekhar

लेखक आजतक चैनल के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं.

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