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Updated: 13 अक्टूबर, 2022 02:08 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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शशि थरूर भी करीब करीब वैसे ही चुनाव लड़ हैं जैसे कांग्रेस हाल फिलहाल कोई भी चुनाव लड़ती है. चाहे वो विधानसभा चुनाव हो या आम चुनाव - कांग्रेस नेतृत्व को चुनाव नतीजों के बारे में पहले से पता होता है फिर भी मैदान में डटे रहना होता है. यूपी चुनाव 2022 के दौरान तो प्रियंका गांधी को कांग्रेस की बैठकों में ऐसा कहते भी सुना गया था.

शशि थरूर अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं. ये देख कर भी वो विचलित नहीं होते कि बागी कहे जाने वाले G-23 के उनके सारे साथी मल्लिकार्जुन खड़गे का सपोर्ट कर रहे हैं. वो खुद तो नामांकन करने अपने कुछ करीबी समर्थकों के साथ पहुंचते हैं, लेकिन दूसरी तरफ मल्लिकार्जुन खड़गे के पीछे कांग्रेस के तमाम दिग्गज भीड़ बन कर खड़े रहते हैं. ऐसा लगता है जैसे वो अकेले दम पर G-23 की आवाज खामोश नहीं होने देने के लिए संघर्ष कर रहे हों.

शशि थरूर ने चुनाव लड़ने के लिए सोनिया गांधी से बाकायदा परमिशन भी लिया था. आप चाहें शिष्टाचार के नाते जानकारी देने की कोशिश भी समझ सकते हैं. शशि थरूर के ताजा तेवर तो ऐसा ही जाहिर कर रहे हैं.

बकौल शशि थरूर ही, सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में दिलचस्पी दिखाने के लिए वेलकम भी बोला था - और राहुल गांधी ने भी सलाह दी थी कि कुछ भी हो जाये, लेकिन उनको कदम पीछे नहीं खींचने चाहिये.

लेकिन वो कौन हो सकता है जो ऐसी अफवाह फैला रहा था कि शशि थरूर ने अपना नामांकन वापस ले लिया है? या फिर शशि थरूर अपना नामांकन वापस लेने वाले हैं? और ऐसी अफवाह नामांकन वापसी की तारीख के दिन ही फैलायी जा रही थी?

पहले तो यही लग रहा था कि जब सोनिया गांधी से मिलने शशि थरूर पहुंचे होंगे तो वो काफी खुश हुई होंगी. निश्चित तौर पर शशि थरूर में सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में अपने लिए एक मददगार ही नजर आया होगा - ऐसा मददगार जिसके चुनाव मैदान में उतरने से सोनिया गांधी के पसंदीदा उम्मीदवार की सेहत पर कोई असर तो नहीं पड़ेगा, ऊपर से कांग्रेस में निष्पक्ष और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराये जाने का संदेश अलग से जाएगा.

ये बात शशि थरूर भी कई बार कह चुके हैं कि सोनिया गांधी ने उनको आश्वस्त किया था कि कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव निष्पक्ष तरीके से ही होगा. लेकिन शशि थरूर ने ही ये बात भी बतायी थी कि सोनिया गांधी ने ये भरोसा भी दिलाया था कि कोई आधिकारिक उम्मीदवार न तब था, न आगे होगा.

मगर, जब मल्लिकार्जुन खड़गे के नामांकन के दौरान शशि थरूर ने कांग्रेस के दिग्गजों का जमावड़ा देखा तो आंखें फटी की फटी रह गयीं. कम से कम अपने साथ बागी करार दिये जा चुके कांग्रेस नेताओं के पहुंचने की शशि थरूर को अपेक्षा तो नहीं ही थी. अशोक गहलोत जैसे नेताओं की मौजूदगी तो यही बता रही थी कि वे सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ही नुमाइंदगी कर रहे हैं.

और यही वजह रही कि शशि थरूर ने मल्लिकार्जुन खड़गे के पूरे लाव लश्कर के साथ नामांकन करने पर आपत्ति भी जतायी और सोनिया गांधी को मुलाकात के दौरान उनके किये हुए वादे की याद भी दिलाने की कोशिश की. कहने को तो शशि थरूर कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव को फ्रेंडली मैच और मल्लिकार्जुन खड़गे को दोस्त भी बता रहे हैं, लेकिन अपने सोफियाने अंदाज में उनकी औकात बताने से भी परहेज नहीं करते.

नामांकन वापस लेने की तारीख बीतते बीतते ऐसा लगता है जैसे शशि थरूर गांधी परिवार के कामकाज के तौर तरीकों और कांग्रेस की खामियां ही नहीं गिना रहे हैं - बल्कि, कांग्रेस को एक्सपोज करने ही जुट गये हैं.

कांग्रेस की बैंड बजाने में लगे हैं शशि थरूर

शशि थरूर ने कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिए बाकायदा एक मैनिफेस्टो भी जारी किया है - और शिद्दत से चुनाव कैंपेन भी चला रहे हैं. जिनसे भी जरूरी समझ रहे हैं मिल जुल रहे हैं और अपनी बात कह रहे हैं, इस अपील के साथ कि उनको वोट देकर कांग्रेस का अगला अध्यक्ष बनाया जाये.

जैसे बाकी चुनावों में होता है, स्कूल कॉलेज से लेकर आम चुनाव तक. उम्मीदवार अपने वोटर को आश्वस्त करता है कि वो बेहतर कैंडिडेट क्यों है. या फिर वो चुनाव जीत गया तो क्या क्या अलग करने वाला है जो बाकी लोग नहीं कर सकते या कर पाएंगे - शशि थरूर ये सारी चीजें कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में कर रहे हैं.

shashi tharoor, rahul gandhi, sonia gandhiशशि थरूर के तेवर देख कर तो चुनाव बाद उनका इरादा ज्यादा ही खतरनाक लग रहा है

चुनाव मुहिम के दौरान पब्लिसिटी के लिए भी कई तौर तरीके अपनाये जाते हैं. मीडिया के जरिये वोटर तक अपनी बात पहुंचाना भी एक तरीका होता है - और शशि थरूर भी इंटरव्यू देकर वैसा ही सब करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन इंटरव्यू के दौरान जिस तरह की बातें वो कर रहे हैं वो कांग्रेस नेतृत्व यानी गांधी परिवार को परेशान कर सकती हैं - क्योंकि जिस तरह से वो कांग्रेस की दुर्व्यवस्था की तरफ ध्यान दिला रहे हैं वैसा कभी नहीं होता.

यहां तक कि G-23 वाले पत्र में भी एक ही बार कुछ ही गड़बड़ियों की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की गयी, फिर सारी चीजें ठंडे बस्ते में डाल दी गयीं. कांग्रेस कार्यकारिणी में तो उन मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हुई थी. बल्कि, गांधी परिवार के करीबी तो यही समझाते रहे कि इनकी चिट्ठी लिखने की हिम्मत कैसे हुई.

अब अगर शशि थरूर ये कहते हैं कि कांग्रेस में सब कुछ दिल्ली में बैठ कर ही तय हो रहा है, तो साफ है कि उनके निशाने पर कोई और नहीं बल्कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और उनके आस पास जमे हुए कुछ कांग्रेस नेता ही हैं.

आज तक के साथ एक इंटरव्यू में शशि थरूर कहते हैं, 'आज कल ये सवाल उठ रहा है सब कुछ दिल्ली में ही तय हो रहा है - और लोगों को पता भी नहीं है कि किससे बात करनी चाहिये.'

शशि थरूर का ये कहना कि 'लोगों को पता भी नहीं है कि किससे बात करनी चाहिये', कपिल सिब्बल के उस बयान जैसा ही है जिसमें पूछा गया था कि कांग्रेस में फैसले कौन ले रहा है. या फिर माना जाता है कि कांग्रेस में बहुत सारे पॉवर सेंटर बन गये हैं.

वो कांग्रेस कार्यसमिति में चुनाव नहीं कराये जाने पर भी सवाल उठा रहे हैं, और पार्टी में कोई पार्लियामेंट्री बोर्ड नहीं होने पर भी.

कहते हैं, 'एक लाइन के प्रस्ताव (one line resolution) की आदत बदलनी चाहिये - और भागीदारी के साथ साथ जिम्मेदारी होनी चाहिये.

...और तो और शशि थरूर तो कांग्रेस में हाईकमान कल्चर ही खत्म करने की बात करने लगे हैं.

आखिर G-23 वाले पत्र में भी तो ऐसे ही सवाल उठाये गये थे - और वे सारी बातें लोगों के सामने लाकर शशि थरूर अपनी तरफ से बताने की यही कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस में कुछ नहीं बदलने वाला - अगर कुछ बदलने वाला है तो बस नये कांग्रेस अध्यक्ष के नाम में राहुल गांधी की जिद की वजह से 'गांधी' शब्द नहीं जुड़ने वाला है.

शशि थरूर के खिलाफ अफवाह कौन फैला रहा था?

शशि थरूर कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में मल्लिकार्जुन खड़गे से मुकाबला कर रहे हैं, लेकिन वो उनको अपना दोस्त बताते हैं - और फिर कहते हैं कि उनको खिलाफ वो कुछ भी नहीं बोलेंगे.

हालांकि, कहते भर ही हैं. अपनी तारीफ में मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम लिये बगैर भी ऐसी बात बोल देते हैं जैसे वो अपने प्रतिद्वंद्वी की सरेआम औकात बता रहे हों, 'मेरा काम करने का तरीका अलग होगा... पैराशूट से राज्य सभा नहीं पहुंचा... तीन बार लोक सभा चुनाव जीता हूं - और उसमें भी दो बार बीजेपी के दौर में.

बात में दम तो है. मल्लिकार्जुन खड़गे अभी राज्य सभा सदस्य हैं और चुनाव के लिए नामांकन भरने से पहले तक राज्य सभा में विपक्ष के नेता भी हुआ करते थे. लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिये कि 2019 की हार से पहले वो लगातार दो लोक सभा चुनाव और आठ बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं.

हां, ये भी सच है कि शशि थरूर 2019 का लोक सभा चुनाव भी जीते हैं. लेकिन अकेले शशि थरूर ही ऐसे कांग्रेस सांसद नहीं हैं, उसी केरल से राहुल गांधी भी लोक सभा सांसद बने हैं. और कांग्रेस के लिए 2019 में सबसे आसान चुनावी मैदान केरल का ही रहा है, जहां से सबसे ज्यादा उम्मीदवार जीत कर संसद पहुंचे हैं. अब अगर मल्लिकार्जुन खड़गे के बहाने शशि थरूर अमेठी के नतीजों की तरफ भी इशारा कर रहे हों तो बात और है.

रही बात शशि थरूर के खिलाफ अफवाह फैलाने की तो आखिर वो कौन हो सकता है? शशि थरूर का कहना है कि उनके सूत्रों ने बताया है कि उनके अपनी उम्मीदवारी वापस लेने को लेकर अफवाह फैलायी जा रही है.

जाहिर है, बीजेपी या आम आदमी पार्टी को तो इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं होगी. अगर बीजेपी या आप को कुछ करना ही होता तो वे शशि थरूर का ही सपोर्ट करते ताकि कांग्रेस के अघोषित आधिकारिक कैंडिडेट का पक्ष कमजोर हो - कहीं ये शशि थरूर का ही चुनावी हथकंडा तो नहीं है? राजनीति में, और वो भी चुनावी राजनीति में तो ये सब चलता ही है. है कि नहीं?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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