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Updated: 13 अगस्त, 2019 08:26 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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जब से कश्मीर से धारा 370 हटाई गई है, तब से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. कभी भारत के साथ व्यापार बंद कर रहा तो कभी ट्रेन बंद कर रहा है. यूं लग रहा है मानो मोदी सरकार ने कश्मीर को लेकर फैसला ना किया हो, बल्कि इस्लामाबाद में जा घुसा हो. दूसरों की घर की समस्याओं में पाकिस्तान हमेशा से अपनी नाक घुसाता ही रहा है. भले ही बात इमरान खान की हो या फिर उनके रेल मंत्री शेख रशीद अहमद की हो. ये लोग इस तरह के बयान देते हैं, जैसे भारत ने कश्मीर के लोगों पर अत्याचारों की इंतेहां कर दी हो. जबकि हकीकत ये है कि पाकिस्तान के आस-पास पहले ही तीन ऐसे राज्य हैं, जिनकी हालत बद से बदतर हो चुकी है, लेकिन उनके भले के लिए पाकिस्तान कुछ नहीं कर रहा.

पाकिस्तान के पश्तो में पश्तून लोग लगातार अपनी सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ये वही समूह है, जो आज तक नहीं भूल सका है कि पाकिस्तान बनने के कुछ ही समय बाद उनके ऊपर क्या जुल्म हुआ था. आपको बता दें कि 12 अगस्त 1948 को पश्तून लोगों पर फायरिंग की गई थी, जिसमें करीब 600 लोग मारे गए थे. आज भी पश्तून लोग 12 अगस्त तो काले दिन के रूप में मनाते हैं. सोमवार को भी उन्होंने काला दिवस मनाया है. वहीं कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के खिलाफ पाकिस्तान 15 अगस्त को काला दिवस मनाएगा.

पाकिस्तान, कश्मीरआज भी पश्तून लोग 12 अगस्त तो काले दिन के रूप में मनाते हैं.

क्या हुआ था पश्तून लोगों के साथ?

ये बात है 12 अगस्त 1948 की. अपनी कुछ मांगे सरकार के सामने रखने के लिए पश्तून लोगों ने खुदाई खिदमतगार आंदोलन शुरू किया. यह आंदोलन अहिंसक था. अपनी मांगों को लिए जब हजारों पश्तून लोगों का ये समूह बारबरा मैदान में पहुंचा तो उत्तर-पश्चिमी प्रांत (आज का खैबर पख्तूनख्वा) के मुख्यमंत्री अब्दुल कय्यूम खान कश्मीरी ने पुलिस को आंदोलन कर रहे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया. निहत्थे लोगों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं. बिना सोचे समझे कि सामने कौन है, बस गोलियां चलती रहीं. तब तक चलती रहीं, जब तक खत्म नहीं हो गईं. इस गोलीबारी में करीब 611 लोग मारे गए थे और 1200 से भी अधिक घायल हुए थे.

ये नरसंहार कितना भयानक था इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अब्दुल कय्यूम खान कश्मीरी ने कहा था कि पुलिस की गोलियां खत्म हो जाने की वजह से गोलीबारी रुक गई, वरना वहां से एक भी इंसान जिंदा बचकर नहीं जाता. बताते चलें कि पुलिस ने इस नरसंहार के बाद मरे हुए बहुत से लोगों और गंभीर रूप से घायल लोगों को काबुल नदी में फेंक दिया था. बहुत सारे लोग तो डूबने की वजह से भी मारे गए. यानी ये कहना गलत नहीं होगा कि कय्यूम खान ने तो पूरी जाति को ही खत्म करने की सोच ली थी. 12 अगस्त को हुए इस नरसंहार की वजह से ही आज भी पश्तून लोग इस दिन को ब्लैक डे यानी काला दिवस की तरह मनाते हैं.

किस मुंह से पाकिस्तान 15 अगस्त को मनाएगा काला दिवस?

पाकिस्तान को भारत के मुस्लिमों से बहुत प्यार है, जैसा कि वह गाहे-बगाहे दावा करता ही रहता है, लेकिन अपने ही पश्तो में अगर वह जाकर देखे तो उसे पता चलेगा कि कश्मीर और भारत के मुसलमानों से पहले उसे अपने पश्तून लोगों का ध्यान रखने की जरूरत है. आखिर किस मुंह से अब पाकिस्तान 15 अगस्त को काला दिवस मनाने की बात कर रहा है, जबकि उसके के पश्तो में पश्तून लोग 12 अगस्त को काला दिवस मनाते हैं. पश्तून लोग आज तक उस जुल्म को नहीं भूल सके हैं, जो पाकिस्तानी सरकार ने उन पर किया.

आज भी पश्तून लोग अपने हक के लिए लड़ रहे हैं. 2014 में पश्तून तहाफुज़ मूवमेंट (PTM) की भी शुरुआत की गई, जिसका मकसद पख्तूनों के मानवाधिकारों की रक्षा करना है. बताया जा रहा है कि करीब 8 हज़ार पश्तून लोग अब तक लापता हो चुके हैं. इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि पाकिस्तान सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए भारत के मुस्लिमों और कश्मीर के लोगों की बात करता नजर आता है. करीब से देखें तो पता चलता है कि भारत में तो सब बेहद खुश हैं, लेकिन पाकिस्तान ने ही अपने लोगों की जिंदगी नरक से बदतर बना रखी है.

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