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Updated: 12 अगस्त, 2019 09:20 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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जम्मू और कश्मीर पर इन दिनों पूरी दुनिया की नजरें हैं. हो भी क्यों ना, मोदी सरकार ने बेहद सख्त फैसला लेते हुए 5 अगस्त को जम्मू और कश्मीर से धारा 370 को जो हटा दिया है. इस सख्त फैसले के बाद घाटी में किसी तरह की हिंसा ना हो, इसलिए एहतियातन वहां के कुछ संवेदनशील जिलों में कर्फ्यू लगा हुआ है. यही वजह है कि घाटी को लेकर तरह की बातें हो रही हैं. पाकिस्तान की ओर से जानबूझ कर कश्मीर के लोगों को भड़काने वाले बयान दिए जा रहे हैं तो वहीं विरोधी पार्टियां अपनी राजनीति चमकाने के लिए कश्मीर की स्थिति पर सवाल उठा रही हैं. इसी बीच राहुल गांधी ने कश्मीर में खून-खराबा होने का बयान देकर भी एक नई बहस को जन्म दे दिया. हालांकि, सेना ने राहुल गांधी के दावों को खारिज करते हुए साफ कर दिया कि घाटी में स्थिति सामान्य है, सिर्फ कुछ छुटपुट घटनाएं हुई हैं, लेकिन किसी को मौत नहीं हुई है.

ऐसे में एक सवाल हर दिन किसी न किसी के मुंह से सुनने को मिल रहा है कि अगर घाटी में सब सामान्य है तो कर्फ्यू क्यों लगाया गया है? इतने दिन हो गए अब तक कर्फ्यू क्यों नहीं खोला गया है? सवाल तो यहां तक उठ रहे हैं कि कश्मीर अभी तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. ये कहा जा रहा है कि जैसा आज तक नहीं हुआ वैसा हो रहा है. लोग घरों में कैद हैं, हर ओर सेना है, कर्फ्यू लगा है, केबल काट दिया है, इंटरनेट नहीं है, मोबाइल फोन नहीं चल रहे हैं. बहुत से लोग ये बात कह रहे हैं कि जितने बुरे हालात इस समय कश्मीर के हैं वैसे कभी नहीं हुए. कश्मीर के कर्फ्यू को लेकर जो लोग चिंतित हैं, उन्हें एक बार इतिहास की किताब के पन्ने पलटने की जरूरत है. थोड़ा पीछे जाएंगे तो पता चलेगा कि कश्मीर में जैसी स्थिति है, वैसा वहां कई बार हुआ है, बल्कि इससे भी बुरा दौर कश्मीर देख चुका है.

कश्मीर, धारा 370, जम्मू और कश्मीरये कहा जा रहा है कि जैसा आज तक नहीं हुआ, कश्मीर में वैसा हो रहा है, कश्मीर इससे बुरे दौर से भी गुजर चुका है.

कब-कब कितने दिनों के लिए बंद हुआ इंटरनेट

कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं बंद होने पर भले ही इस समय हायतौबा मची हुई है, लेकिन ये वहां काफी आम बात है. आए दिन कोई न कोई विरोध होता ही रहता है, जिसकी वजह से ऐसे कदम उठाए जाते हैं. अगर देखा जाए तो 2019 में इस बार 53वीं बार जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं बंद की गई हैं. इतना ही नहीं, 2016 में जब 8 जुलाई को बुरहान वानी का एनकाउंटर हुआ था, उसके बाद तो 133 दिनों के लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया था. पूरे साल में करीब 10 बार इंटरनेट सेवाएं बंद हुईं. इसी तरह 2012 में करीब 150 बार जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं बंद रही थीं.

1990: 175 दिन तक कर्फ्यू

कश्मीरी पंडितों के साथ 1990 में क्या हुआ था, कोई कैसे भूल सकता है. सरेआम नरसंहार हुआ था. महिलाओं से बलात्कार हुआ था. नतीजा ये हुआ कि लाखों की संख्या में कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से पलायन करना पड़ा. उस दौरान कश्मीर में जनवरी से मई तक करीब 175 दिनों तक कर्फ्यू लगा था, अब तक का सबसे अधिक दिनों का कर्फ्यू.

2016: 56 दिनों का कर्फ्यू

बुरहान वानी की मौत के बाद का मंजर भी हर किसी को याद होगा. पूरी घाटी जैसे उबल पड़ी थी. हर ओर हिंसा, पत्थरबाजी और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. उस दौरान झड़प में 120 से भी अधिक लोगों की मौत हुई थी. घाटी में करीब 56 दिनों तक कर्फ्यू लगाया गया था.

कश्मीर, धारा 370, जम्मू और कश्मीरबुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में हिंसा भड़क उठी थी.

1984: अलगाववादी नेता की फांसी के बाद हिंसा

कश्मीर में एक अलगाववादी नेता था मकबूल भट, जिसे 11 फरवरी 1984 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई. भट जम्मू-कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट के संस्थापकों में से एक था, जिसने कश्मीर की आजादी के लिए भारत के खिलाफ आवाज उठाई थी. विरोध प्रदर्शनों को हवा देता रहा. उसका सिर्फ एक मकसद था कि कश्मीर को आजाद कराया जाए. उसकी मौत ने भी घाटी को उबालने का काम किया. उसकी वजह से पूरे साल अलग-अलग समय पर कई बार कर्फ्यू लगाना पड़ा.

2008: अमरनाथ यात्रा को लेकर बवाल

आपको 2008 का वक्त तो याद ही होगा, जब अमरनाथ यात्रा के लिए भूमि का आवंटन रहा था, जिसका कश्मीर में काफी विरोध हुआ. उस आंदोलन के दौरान विरोध प्रदर्शनों के चलते हुए हिंसा में सुरक्षा बलों के साथ काफी झड़प हुई, जिसमें करीब 40 लोगों की फायरिंग में मौत हुई थी.

2010: 112 लोग मारे गए

देखा जाए तो 2010 का पूरा साल ही विरोध प्रदर्शनों की भेंट चढ़ गया. स्वर्ग कहा जाने वाले कश्मीर की हालत नर्क जैसी हो गई. हर ओर आगजनी, विरोध, गोलीबारी, हिंसा... बस यही होता रहा. अलगाववादी उस दौरान काफी सक्रिय थे. इसी बीच अब्दुल्ला ने बयान दे दिया कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं, बल्कि एक समझौते तहत भारत से मिला था, जिसने सियासी तूफान तो खड़ा किया ही, सड़कों पर जो आग फैली वो अलग. पूरे साल में कई बार कर्फ्यू लगा. प्रदर्शनकारियों और सेना के बीच हुई झड़प में करीब 112 लोग मारे गए.

इस बात में कोई हैरानी वाली बात नहीं है कि बहुत सारी कश्मीरी भारत में रहना ही नहीं चाहते और वह आजादी के लिए जान तक देने को तैयार हैं. लेकिन अभी जो कुछ कश्मीर में हो रहा है वह उन घटनाओं के आगे कुछ भी नहीं है, जो इससे पहले कश्मीर पर बीत चुकी है. मीडिया और कम्युनिकेशन के साधनों पर पाबंदी कश्मीर में आम बात है.

कश्मीर में लगे कर्फ्यू के बाद हर कोई ये जरूर कहता दिख रहा है कि कर्फ्यू हटने के बाद स्थितियां बिगड़ेंगी. लेकिन हमें ऐसे लोगों को अनदेखा करना ही सही है जो कहते हैं कि उन्हें सब पता है, क्योंकि उन्हें कुछ नहीं पता. इतिहास में ये सब हो चुका है. 2008 में हुए विरोध प्रदर्शन में बहुत से लोग मारे गए, कर्फ्यू लगा, लेकिन उसके बाद जो चुनाव हुआ, वह बेहद सफल रहा. चुनाव के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार बनी, जिसने अपना ही जनादेश बर्बाद कर दिया और हिंसात्मक विरोध प्रदर्शन को बढ़ावा दिया.

वैसे भी, कश्मीर समस्या की जड़ धारा 370 तो कभी थी ही नहीं, ना ही इसे खत्म करने से समस्या का निपटारा होगा. अलगाववादी तो हमेशा से आजादी की मांग कर रहे हैं, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि धारा 370 क्यों लगाई या क्यों हटाई. वो तो भारत को अपना देश मानते ही नहीं. इतने सालों से कश्मीर में विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं, हिंसा होती रही है, जबकि अब तक वहां धारा 370 थी. इसकी वजह से उन्हें कई सारे विशेषाधिकार मिले हुए थे. कश्मीर में हिंसा की वजह धारा 370 नहीं, बल्कि अलगाववादियों की बेतुकी मांगें हैं. भटके हुए युवा हैं, जिन्हें भरमाया जा रहा है.

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