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Updated: 07 जून, 2019 01:39 PM
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कांग्रेस का नेतृत्व संकट दिन पर दिन गहराता ही जा रहा है. वैसे भी जब कैप्टन ही हथियार डाल दे तो बाकी का क्या? जब राहुल गांधी खुद इस्तीफे की पेशकश कर दें और गांधी परिवार से किसी को भी न बनने देने पर अड़ जायें फिर हो भी क्या सकता है?

हार जीत तो छोड़िये ये राहुल गांधी के ढीले ढाले नेतृत्व का ही नतीजा है कि कांग्रेस की छोटी से छोटी यूनिट भी गुटबाजी से जूझ रही है. पंजाब में कैप्टन बनाम सिद्धू तो हरियाणा में हुड्डा बनाम तंवर और राजस्थान में गहलोत बनाम पायलट - फेहरिस्त इतनी लंबी है कि झगड़ा सुलझाने या झगड़े से उबरने में भी पांच-दस साल लग सकते हैं.

बस 'ठोको ताली!'

लोक सभा चुनाव 2019 में कांग्रेस को पंजाब में 13 में से 8 सीटें मिली हैं जबकि 4 बीजेपी और एक आम आदमी पार्टी के खाते में गयी है. चूंकि सिद्धू अपने बयानों को लेकर पहले से ही सभी के निशाने पर थे - हार का ठीकरा भी हर कोई उन्हीं पर थोप रहा है. कैप्टन कैबिनेट के कई मंत्री तो कहने लगे हैं कि अगर सिद्धू को कैप्टन के नेतृत्व में काम नहीं कर सकते तो इस्तीफा दे दें.

नवजोत सिंह सिद्धू का कहना है कि उन्हें दो सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी और दोनों सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है. मीडिया में आकर सिद्धू ने कहा, 'बठिंडा सीट पर मिली हार के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि ये आरोप गलत है. कई कैबिनेट मंत्री मेरा इस्तीफा चाहते हैं, कैप्टन साहब भी हार के लिए मुझे जिम्मेदार मान रहे हैं, जबकि ये सबकी जिम्मेदारी है.'

कैप्टन अमरिंदर आपे से बाहर होते जा रहे हैं. सिद्धू के कैबिनेट की बैठक में नहीं पहुंचने के बाद अलग से हंगामा खड़ा हो गया है. चुनाव नतीजों की समीक्षा के लिए कैप्टन अमरिंदर ने 30 मई को भी एक मीटिंग बुलायी थी - सिद्धू उसमें भी नदारद रहे.

'ठोको ताली' - नवजोत सिंह सिद्धू का ये वाला अंदाज लगता है अब उलटा पड़ने लगा है. पाकिस्तान पर बयानबाजी के बाद 'द कपिल शर्मा शो' में तो अर्चना पूरन सिंह ने बेदखल तो पहले ही कर रखा है - अब पंजाब सरकार में कैप्टन की कैबिनेट में सिद्धू के गिनती के दिन बचे लगते हैं. फिलहाल तो शहरी विकास मंत्रालय से सिद्धू की विदायी तय लगती है और खबर है कि उन्हें पर्यटन मंत्रालय में शिफ्ट किया जा सकता है.

गोली मार भेजे में...

आम चुनाव के दौरान यूपी से हटाकर हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी बनाये गये गुलाम नबी आजाद की भी मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं. पूरा एक्शन प्लान तैयार कर चंडीगढ़ पहुंचे गुलाम नबी आजाद को बैठक बीच में ही छोड़ कागजों के पुलिंदे के साथ उलटे पांव लौटना पड़ा. ऐसी ही स्थिति एक बार कमलनाथ के साथ भी हुई थी जब वो हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी बनाये गये थे और उन्हें इस्तीफा ही देना पड़ा. हालांकि, गुलाम नबी के सामने अभी ऐसी कोई चुनौती नहीं है. हरियाणा कांग्रेस में जो कुछ हो रहा है वो पिछले पांच साल से जारी है.

rahul gandhi silent over haryana clash for last five yearsहुड्डा और तंवर पांच साल से झगड़ रहे हैं और राहुल गांधी हैं कि...

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हार की समीक्षा और आगे की रणनीति को लेकर बुलायी गयी बैठक में आलम ये रहा कि हर थोड़ी देर बाद कोई न कोई नेता उठ कर चला जा रहा था. मजबूरन कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद को भी ऐसा ही करना पड़ा.

मीटिंग के दौरान ज्यादातर नेता एक दूसरे से गर्मागर्म बहस में उलझे रहे. झज्जर की विधायक गीता भुक्कल और कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता किरण चौधरी के बीच भी खूब लड़ाई हुई. एक कांग्रेस नेता के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि हुड्डा कैंप पहले से ही तंवर पर हमले की तैयारी के साथ आया हुआ था. स्वाभाविक है नजारा बिलकुल वैसा ही रहा होगा जैसा दिल्ली और हरियाणा में होने वाली कांग्रेस की रैलियों में होता है - जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर के समर्थक बात बात पर भिड़े रहते हैं.

करनाल से कांग्रेस के लोक सभा प्रत्याशी कुलदीप शर्मा ने भी अशोक तंवर को घेरा कि उन्हें करनाल की आत्ममंथन बैठक में नहीं बुलाया गया. अशोक तंवर की शिकायत रही कि वो तो उनके फोन ही नहीं उठाते.

नोंक-झोंक इतनी तीखी हो चली कि अशोक तंवर का गुस्सा फूट पड़ा - "मेरे को अगर खतम करना है तो मुझे गोली मार दो." कहते कहते अशोक तंवर भी मीटिंग से उठ कर चले गये.

दरअसल, हरियाणा कांग्रेस में भी लड़ाई 'कैप्टन' की ही है. पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा चाहते थे कि उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा को हरियाणा की कमान सौंपी जाये. राहुल गांधी ने अशोक तंवर को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया और पिछले पांच साल से दोनों गुटों के बीच शायद ही कोई मौका आता हो जब तनातनी न होती हो.

राहुल गांधी ने जींद उपचुनाव में तो पार्टी के चमकीले चेहरे रणदीप सुरजेवाला को ही उतार दिया था - लेकिन कलह जो न कराये. ऊपर से तो सारे नेता चुनाव प्रचार में एकजुटता दिखाते रहे, लेकिन भीतर वही सब चल रहा था जो अशोक तंवर के अध्यक्ष बनने के साथ से ही चल रहा है. पंजाब की तरह हरियाणा में भी हाल यही है कि हर कोई राहुल गांधी को ही 'कैप्टन' मानता है - और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर जूझते रहते हैं.

पायलट संभालें ड्राइविंग सीट

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक इंटरव्यू में कह डाला था कि सचिन पायलट को कम से कम जोधपुर सीट पर पार्टी की हार की जिम्मेदारी तो लेनी ही चाहिए क्योंकि वो वहां शानदार जीत का दावा कर रहे थे. असल में जोधपुर सीट से अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत कांग्रेस प्रत्याशी थे और वो भी चुनाव हार गये. राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश के दौरान यही मामला उठाया था कि अशोक गहलोत और कमलनाथ ने बेटों को टिकट देने के लिए दबाव बनाया था. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ उनकी छिंदवाड़ा सीट से जीतने में कामयाब रहे.

अशोक गहलोत के इस आरोप का जवाब भी कांग्रेस के भीतर से ही आ गया है. कांग्रेस विधायक पृथ्वीराज मीणा का कहना है कि जब पार्टी सत्ता में होती है तो हार की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है और जब विपक्ष में होती है तो पार्टी अध्यक्ष की. सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. पृथ्वीराज मीणा ने तो सचिन पायलट को ही ड्राइविंग सीट पर लाने की मांग शुरू कर दी है.

पंजाब और हरियाणा की तरह ही राजस्थान कांग्रेस में भी भारी झगड़ा है. झगड़ा तो पहले से ही था, विधानसभा चुनाव जीतने के बाद राहुल गांधी से समझा बुझाकर शांत करा दिया था - लेकिन लोक सभा राजस्थान की सभी 25 सीटें हार जाने के बाद अब राजस्थान में भी 'कैप्टन' यानी कमान सौंपे जाने को लेकर बवाल शुरू हो गया है

हर एक पार्टी में 'मार्गदर्शक मंडल' जरूरी होता है!

सुनने में आया है कि कांग्रेस में आत्ममंथन का दौर भी जोरों पर चल रहा है और पार्टी में एक मार्गदर्शक मंडल बनाने की भी जानकारी मिली है. कांग्रेस भी अब बीजेपी को टक्कर देने के लिए एक मार्गदर्शक मंडल बनाने पर विचार कर रही है. वैसे कांग्रेस का मार्गदर्शक मंडल बीजेपी वाले से बिलकुल अलग होगा. कांग्रेस ये बीजेपी के राष्ट्रवाद को काउंटर करने के लिए तैयार कर रही है. मार्गदर्शक मंडल के सदस्य राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बीजेपी को घेरने की रणनीति तैयार करेंगे.

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में तो कांग्रेस नेता आपस में ही लड़ रहे हैं, तेलंगाना में तो अलग ही भगदड़ मची हुई है. तेलंगाना में कांग्रेस के 18 विधायक हैं और उनमें से 12 एमएलए सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल होने जा रहे हैं. चूंकि बागी विधायकों ने अपनी संख्या दो तिहाई कर ली है इसलिए दलबदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता जाने का भी खतरा नहीं है. तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव सरकार का भी तकरीबन वही हाल है जो केंद्र में मोदी सरकार 2.0 का है.

कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल घूमते फिरते एक ही जगह फोकस हो जाती है - कैप्टन कौन? नवजोत सिंह सिद्धू कहते हैं - 'मेरे कैप्टन राहुल गांधी हैं.' मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह भला कैसे हजम कर लें, असली 'कैप्टन' तो वही हैं. वैसे भी वो मुख्यमंत्री तो हैं ही पंजाब कांग्रेस की कमान भी तो उन्हीं के हाथ में है. और तो और 'कैप्टन' तो उनके नाम में ही जुड़ा हुआ है और वो भी राजनीति या कांग्रेस के चलते नहीं बल्कि फौजी होने की वजह से. चंडीगढ़ में बवाल मचा रहता है और राहुल गांधी चुप्पी साध लेते हैं - करें भी तो क्या? 'कैप्टन' वाली मुश्किल से तो वो खुद भी जूझ रहे हैं - कांग्रेस अध्यक्ष के पद से उनके इस्तीफे पर फंसा पेंच अभी खत्म नहीं हुआ है.

बताया तो यही गया है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने रहने को मान गये हैं और उनके इस्तीफे की पेशकश को नामंजूर करने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव भी पारित किया है - लेकिन उस पर फाइनल मुहर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में ही लग सकती है. उसकी भी तैयारी चल रही है.

दिल्ली तो दिल्ली, कांग्रेस पंजाब से लेकर तेलंगाना तक कोहराम मचा हुआ है - और हालात संभालने की बजाये राहुल गांधी अभी हार की तह तक पहुंचने में लगे हैं.

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