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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   28-03-2018
बिजय कुमार
बिजय कुमार
  @bijaykumar80
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हाल ही में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए हुए चुनावों ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. ये वाक़्या कुछ वैसे ही था जैसा हमने गुजरात में अहमद पटेल को चुने जाने के दौरान देखा था. उस जीत ने प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के गिरे मनोबल को मजबूत करने में अहम् भूमिका निभाई थी कुछ ऐसा ही बहुजन समाज पार्टी के लिए फिलहाल उत्तर प्रदेश में कहा जा सकता है. लेकिन अंतर ये है कि यहां हार के बावजूद ऐसा प्रतीत हो रहा है. कहा जा सकता है कि यहां हारकर भी मायावती ने बाजी जीत ली हो.

लेकिन इसके पीछे बहुजन समाज पार्टी की मुखिया की सूझबूझ की दाद देनी होगी जो न सिर्फ बीजेपी को जीती हुई बाजी के लिए निशाने पर लेने में कामयाब दिख रही हैं बल्कि ताजा सहयोगी बने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी नसीहत देने में सफल रही हैं. आइए बात करते हैं मायावती के उन फैसलों की जिन्होंने उन्हें आज चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

mayawatiउत्तरप्रदेश में हारकर भी मायावती ने बाजी जीत ली

जैसा कि हम जानते हैं कि साल 2012 के बाद बसपा प्रमुख मायावती के लिए कुछ अच्छा नहीं हो रहा हो रहा था, विधानसभा में मिली हार के बाद वो 2014 में मोदी लहर में खाता भी नहीं खोल पायी थीं जो शायद उनकी पार्टी के हालिया इतिहास में ना हुआ हो लेकिन साल 2017 के विधानसभा चुनाव ने तो मानो उनकी पार्टी को प्रदेश में काफी बौना बना दिया हो. इन लगातार मिल रही हारों से उन्हें ये समझ में आ गया था कि उनकी पार्टी से आखिर क्या गलतियां हो रही हैं या फिर कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला किया जाये. कहा जा सकता है कि अपनी पहचान बचाने के लिए कई बार आपको ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिसे किसी ने सोचा भी नहीं हो. गेस्ट हाउस कांड के बाद आखिर किसने सोचा था की मायावती एक बार फिर सपा से गठबंधन करेंगी.

लेकिन गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा का समर्थन कर उन्होंने सभी को न केवल चौंकाया बल्कि ये भी बता दिया कि उनकी पार्टी की मौजूदगी अभी प्रदेश में बाकी है. उनके इस समर्थन को लेकर विशेषज्ञों ने अपनी-अपनी राय दी थी कि इससे कुछ नहीं होगा तो वहीं कुछ ने कहा कि ये गठबंधन नहीं है मात्र समर्थन है, कुछ ने ये कहा कि इतने कम समय में वोट ट्रांसफर नहीं होंगे. लेकिन जब रिजल्ट आया तो ये साफ हो गया कि इसकी कवायद मायावती ने बहुत पहले ही कर दी थी तभी तो उसके कार्यकर्ता स्थानीय लेवल पर इस फैसले से जागरूक दिखे. वैसे रिजल्ट आने तक उन्होंने चुप्पी साध रखी थी और जीत के बाद अखिलेश उनसे मिलने गए, यहां कहा जा सकता है कि वो भी नतीजों का ही इंतजार कर रही थीं क्योंकि उन्हें भी शायद इसकी उम्मीद ना रही हो कि गोरखपुर भी जीता जा सकता है. इसके बाद तो मानो पूरे देश का मिडिया इसी पर चर्चा करने लगा की आखिर ये हुआ कैसे और फिर कइयों ने ये कहा कि ये साथ लम्बा नहीं चलेगा और ये केवल राज्यसभा और विधानपरिषद् के लिए समझौता मात्र है.

mayawatiगोरखपुर और फूलपुर  उपचुनाव में मायावती ने अपनी पार्टी की मौजूदगी का अहसास कराया 

इसके बाद आयी राज्यसभा चुनाव की बारी तो इसमें भी उपचुनाव की तरह ही अखिलेश यादव नेतृत्व करते दिखे लेकिन उनके और विपक्ष के और सहयोगियों की कोशिश के बाद भी वो बसपा के उम्मीदवार को जिताने में कामयाब नहीं रहे. इस हार के बाद मायावती ने मोर्चा संभाला और उन सभी सवालों का जवाब दे गयीं जिससे कि प्रदेश में बीजेपी की मुश्किलें काफी बढ़ गयी है. इस चुनाव में मायावती ने जिस उम्मीदवार को उतरा उनका नाम भी भीम राव आंबेडकर है ऐसा कर उन्होंने इसे बीजेपी के खिलाफ सिंबॉलिक की तरह इस्तेमाल करते हुए हमला किया कि कैसे एक दलित उम्मीदवार को हराने में धनबल का इस्तेमाल किया गया और ये भी दिखाया कि कैसे उन्हें हराकर बीजपी जश्न मना रही हैं. इससे वो एक बार फिर दलितों कि लिए लड़ने की अपनी छवि को पाती दिख रही हैं.

याद करें तो पिछले चुनावों में मोदी और अमित शाह सहित तमाम नेता उनपर दलितों से दूरी के लिए हमला करते रहे है. लेकिन इस बार मानो उन्होंने बीजेपी को इस बिंदु पर घेर लिया है और लगातार उनकी पार्टी की ओर से बीजेपी पर दलित विरोधी होने का आरोप मढ़ा जा रहा है. वैसे बीजेपी उनकी इस चाल को अपने उम्मीदवार को पीछे कर मात दे सकती थी और ये सन्देश भी देने में कामयाब रही होती कि वो दलितों के साथ हैं, लेकिन ये चुनाव था और इसमें वो भी अखिलेश की तरह ही चूक गईं, जो अपने उम्मीदवार जया बच्चन से पहले बसपा के उम्मीदवार को जिता सकते थे.  

mayawati, akhilesh yadav2019 में भी रहेगा ये साथ

मायावती ने कहा है कि उनका और सपा का गठबंधन 2019 में रहेगा और बीजेपी जितनी भी कोशिश कर ले वो इसे तोड़ने में कामयाब नहीं होगी. उन्होंने गेस्ट हाउस कांड का जिक्र कर अपनी नाराजगी सपा के तत्कालीन नेतृत्व से तो जाहिर कर दी लेकिन साथ ही कहा कि उन्हें अखिलेश से कोई शिकायत नहीं है, हां बीजेपी से जरूर है जिसने इस घटनाक्रम के दौरान उपस्थित पुलिस अधिकारी को राज्य का पुलिस प्रमुख बनाया है. साथ ही यह भी कह दिया कि बीजेपी कहीं उनकी हत्या तो नहीं करवाना चाहती. इसके अलावा उन्होंने राजा भैया पर भी हमला किया और अखिलेश को आगे ऐसे लोगों से सचेत रहने कि सलाह भी दी. हां इतना जरूर है कि इस दौरान उन्होंने दयाशंकर सिंह और अपने राज्यसभा के इस्तीफे कि बात से बचती दिखीं हो सकता है कि इसका इस्तेमाल भी वो आगे चलकर करें.

जैसा कि हम जानते हैं उनकी पार्टी उपचुनावों में शिरकत नहीं करती है और इसलिए उन्होंने गोरखपुर और फूलपुर में सपा को समर्थन दिया था लेकिन निकट भविष्य में कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के लिए होने वाले उपचुनावों में उन्होंने सपा को समर्थन नहीं करने की बात कही है. उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गयी है और इसके लिए उनके पास बहुत कम समय है. उनके समर्थन ना करने के फैसले ने एक बार फिर सबको सोच में डाल दिया है. आश्चर्य नहीं होगा अगर इसके पीछे भी उनकी कोई रणनीति हो. ये भी हो सकता है कि वो देखना चाहती हों कि यहां सपा अपने दम पर कितना अच्छा कर पाती है या फिर सपा दूसरी पार्टियों से यहां गठबंधन करती है या नहीं.

कहा जा सकता है कि राज्यसभा चुनाव के बाद जिस तरह मायावती बसपा को मजबूत करने में जुट गयी हैं और विरोधी बीजेपी पर हमले कर रही हैं उससे इतना तो साफ है कि वो पहले की तरह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल हो पा रही हैं.

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लेखक

बिजय कुमार बिजय कुमार @bijaykumar80

लेखक आजतक में एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं

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