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Updated: 24 मार्च, 2018 02:13 PM
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फूलपुर उप चुनाव के जब नतीजा आया तो बात चली कि मायावती आखिर क्या सोच रही होंगी? क्या उन्हें पछतावा नहीं हो रहा होगा? अगर खुद मैदान में होतीं तो सियासी वापसी के लिए कितना बढ़िया टर्निंग प्वाइंट था. मायावती के नाम पर पूरा विपक्ष सपोर्ट के लिए तैयार था.

राज्य सभा चुनाव में भीमराव अंबेडकर को टिकट देने से पहले कई दूसरे नामों की चर्चा रही. जब अंबेडकर का टिकट फाइनल हो गया तो माना गया कि मायावती ने भाई को टिकट इसलिए नहीं दिया ताकि परिवारवाद के इल्जाम से बच सकें - और खुद मैदान में नहीं उतरीं कि इस्तीफे के फैसले पर सवाल उठे.

सियासत में विरोधाभास भी ऐसे ही कदम कदम पर देखने को मिलते हैं. मायावती के फैसले का जिस हिसाब से भी विश्लेषण किया जाये, नुकसान तो मायावती को ही हुआ है. फूलपुर और गोरखपुर में समाजवादी पार्टी का कैंडिडेट तो जीत गया लेकिन राज्य सभा चुनाव में बीएसपी उम्मीदवार को हार का मुहं देखना पड़ा.

मायावती ने बहुत देर कर दी है

2019 आते आते सात साल हो जाएंगे. 2012 में मायावती यूपी की सत्ता से बेदखल हुई थीं - और पांच साल बाद सीएम की कुर्सी पर फिर से कब्जे की कोशिशें नाकाम रहीं. 2014 के लोक सभा चुनाव में वो जीरो पर आउट हो गयीं और एक बार फिर उनके हाथ सिफर ही लगा है.

mayawatiइसे विक्ट्री साइन समझने की गलती मत करना...

ये कोई नहीं कह सकता कि मायावती की राजनीति खत्म हो चुकी है. ऐसे कयास लगाना जल्दबाजी होगी, लेकिन ये भी सच है कि खुद मायावती की तरफ से बहुत देर हो चुकी है. मायावती दलितों के मुद्दे पर राजनीति करती हैं. राज्य सभा से इस्तीफा देते वक्त भी उनका आरोप धा कि दलितों के मसले पर उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा है.

चुनावी राजनीति मुख्य तौर पर तीन बातों पर निर्भर करती है - आइडियोलॉजी, संगठन और कार्यकर्ता. दलित राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले और बीएसपी छोड़ चुके नेता कहते हैं कि कांशीराम की दलित आइडियोलॉजी बहुत पहले ही मायावती के मन की बात में तब्दील हो चुकी थी. बाद में मायावती ये अहसास भी कराने लगीं कि जहां वो खड़ी होती हैं संगठन वहीं से शुरू होता है और वहीं खत्म भी हो जाता है. बीएसपी में मायावती के अलावा दूसरे नेताओं की कोई हैसियत नहीं होती. जब थक हार कर कोई नेता बीएसपी छोड़ता है तो बताया जाता है कि उसे तो बर्खास्त कर दिया गया. या फिर, पार्टी में उस नेता विशेष की कोई जरूरत नहीं रही. मायावती ने स्वामी प्रसाद मौर्य और नसीमुद्दीन सिद्दीकी के हटने के बाद ऐसा ही संदेश देने की कोशिश की.

मायावती को सबक

लगता है अब तक अनिल सिंह जैसे नेताओं से मायावती का पाला कम ही पड़ा था. 2017 के विधानसभा चुनाव से 2018 का राज्य सभा चुनाव आते आते अनिल सिंह ने मायावती को अच्छा सबक सिखाया है.

anil singhबाकी दिन बहनजी के साथ, वोटिंग में महाराज जी के साथ

ऐसा भी नहीं कि मायावती को अनिल सिंह की बीजेपी से करीबी को लेकर मायावती बेखबर रहीं. अनिल सिंह ने तो बीएसपी से टिकट तब लिया जब बीजेपी में उनकी दाल नहीं गली. इसमें भी शक नहीं कि मायावती ने अनिल सिंह टिकट अपनी ही शर्तों पर दी होंगी. टिकट देने की मायावती की शर्तें क्या होती हैं, बीएसपी छोड़ने वाले नेताओं के बयान देखे जा सकते हैं.

अनिल सिंह ने टिकट बीएसपी से लिया. चुनाव भी जीता. सदन में अपनी नेता मायावती की बातों का जिक्र भी करते रहे. बात जब राज्य सभा चुनाव के लिए वोट देने की आयी तो अंतरात्मा की सुनने का फैसला किया - हम तो महाराज जी के साथ रहेंगे. महाराज जी बोले तो गोरखपुर मंदिर के महंत और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ.

गठबंधन नहीं, पार्टी बचानी होगी

जिस तरह से बीएसपी ने अपने विधायक अनिल सिंह का वोट गंवाया है वो किसी भी पार्टी के लिए बहुत ही खतरनाक बात है. अनिल सिंह ने किन परिस्थितियों में ऐसा किया उसके लिए दूसरों पर तोहमत मढ़ने से पहले मायावती को खुद अपने अंदर झांक कर देखना होगा. मायावती के लिए आखिरी इम्तिहान तो 2022 में होगा, लेकिन उससे पहले 2019 और कैराना उपचुनाव छमाही और तिमाही टेस्ट की तरह हैं. ये वैसे ही टेस्ट हैं जिनके मार्क्स सालाना इम्तिहान में बहुत मायने रखते हैं.

मायावती के लिए फिलहाल सत्ता हासिल करने या फिर अखिलेश यादव की पार्टी से गठबेधन से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं को साथ रखने और बीएसपी को बचाये रखना जरूरी है. अगर ऐसा नहीं किया तो मायावती को अपना जनाधार और खास वोट बैंक भी गवांते देर नहीं लगेगी. मायावती को मालूम होना चाहिये कि दलितों का असली हमदर्द कौन है इसको लेकर कांग्रेस, बीजेपी और उसके सहयोगियों में जबरदस्त होड़ मची हुई है.

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