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Updated: 13 अक्टूबर, 2019 01:20 PM
विनय कुमार
विनय कुमार
  @vinaya.singh.77
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समय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अंग होता है और अलग-अलग विचारधाराओं का महत्त्व अलग-अलग समय में भिन्न-भिन्न होता है. एक समय में अपरिहार्य लगने वाली चीज समय के साथ-साथ न सिर्फ महत्वहीन हो जाती है बल्कि आगे चलकर उनको त्यागना समय की सबसे बड़ी जरुरत नजर आने लगती है. एक समय था जब समाजवाद की अवधारणा के चलते अधिकतर महत्वपूर्ण तंत्र सरकारी थे या उनको सरकारी बना लिया गया. 1969 को चाहे और लोग भूल भी जाएं लेकिन न तो बैंकर भूल पाएंगे और न ही समाज का वह तबका जिसके लिए बैंकिंग सुविधा इस समय के बाद ही उपलब्ध हो पायी थी.

समय के साथ-साथ बैंकिंग उद्योग ने दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की की, कभी सिर्फ बड़े शहरों में रहने वाले बैंकों की शाखाएं सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल गयीं. जैसे-जैसे बैंकों का क्षेत्र बढ़ता गया, सरकार ने अपनी सारी कल्याणकारी योजनाएं इन सरकारी बैंकों के माध्यम से लागू करना शुरू कर दिया. न सिर्फ अत्यंत छोटे और मझोले कृषकों को बैंकिंग से जोड़ा गया, बल्कि इनके लिए आसान ऋण भी इन्हीं बैंकों के द्वारा उपलब्ध कराये गए. दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपनी छोटी छोटी बचत इन्हीं बैंकों के माध्यम से सुरक्षित रखना शुरू किये. सबसे बड़ा फर्क यह देखने को मिला कि इन बैंकों के लिए समाज की मदद और लोक कल्याणकारी कार्यक्रम लागू करना पहली प्राथमिकता हो गए और लाभ कमाना द्वितीय प्राथमिकता.  

फिर समय आया जब देश की अर्थव्यवस्था में खुलापन आया और दुनियां के तमाम विदेशी बैंक और प्राइवेट बैंक अपने देश में अपने अजेंडा लेकर आये. इन नए बैंकों के लिए लाभ कमाना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी और समाज सेवा के लिए नाममात्र का दिखावा करके ही ये संतुष्ट थे. चूंकि सरकार का कोई नियंत्रण इनपर नहीं था, इसलिए इनको कोई दिक्कत भी नहीं थी. फिर सरकार की नीतियां भी बदलीं और उसने भी बैंकों को लाभ कमाने के लिए जोर देना शुरू कर दिया. अब ग्लोबलाइजेशन के जमाने में बिना मुनाफा कमाए आप बाजार में भला कैसे टिके रह सकते हैं तो बैंकों ने भी अपनी रणनीति में बदलाव लाना शुरू कर दिया.

जो सरकारी उपक्रम किसी जमाने में सरकार और देश की शान हुआ करते थे, वही इस नए दौर में बोझ और बेकार लगने लगे. सरकार ने भी उनको निजी हाथों में बेचने की कवायद शुरू कर दी. इसके दो फायदे थे, एक तो सरकार को पैसा मिलना शुरू हो गया और दूसरा इनके देखभाल से भी मुक्ति मिल गयी. बड़े बड़े पूंजीपति जो सरकार के लिए चुनावी चंदे के सबसे बड़े स्रोत हैं, उनके दबाव में अनेक नीतियां बदली गयीं. इसी सिलसिले में बैंकों को भी निजी हाथों में बेचने की अफवाहें जोर पकड़ने लगीं जो ठीक भी लग रही थीं.

लेकिन बैंकों को निजी हाथों में बेचने का सबसे नकारात्मक पहलू जो सरकार के सामने आया वह यह था कि वह अपने तमाम दिखावटी कार्यक्रम कैसे लागू करवाएगी. न तो कोई विदेशी बैंक और न ही कोई निजी बैंक सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए तैयार होगा. अब इस समय में जब सारे काम बैंकों के माध्यम से ही करवाने हैं, चाहे वह पेंशन बांटना हो, कृषकों को ऋण देना हो, विभिन्न सरकरी कल्याणकारी योजनाओं को लागू करवाना हो या जान धन योजना में सबके खाते खोलना हो. अब इन कामों में सरकारी, सहकारी या ग्रामीण बैंको के अलावा और कोई बैंक तो सामने आएगा नहीं, तो सरकार की मजबूरी है कि वह इन बैंकों का अस्तित्व बनाये रखे. इनके अलावा एक बात और है और वह है बड़े उद्योग घरानों को ऋण दिलवाना, और वह भी सरकार इन्हीं सरकारी बैंकों के द्वारा ही करवा सकती है, निजी बैंक भला क्यों सरकार के कहने पर इनको ऋण देंगे.

इसलिए भले ही कुछ सरकारी बैंकों का मर्जर हो रहा है, लेकिन इन बैंकों को निजी हाथों में बेंचने का खतरा उठा पाना सरकार के लिए संभव नहीं लगता. हां इस मर्जर से लोगों की नौकरियों पर जरूर खतरा आएगा, पुराने लोगों को जबरन रिटायर किया जाएगा और नयी भर्तियां बंद हो जाएंगी.   

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लेखक

विनय कुमार विनय कुमार @vinaya.singh.77

लेखक बैंक ऑफ इंडिया (जोहनसबर्ग, साउथ अफ्रीका) में चीफ मैनेजर थे, अभी भोपाल में रह रहे हैं

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