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Updated: 08 मार्च, 2022 08:01 PM
सरिता निर्झरा
सरिता निर्झरा
  @sarita.shukla.37
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस. शोर शराबा उत्सव, विमर्श सभी कुछ. एक पूरा दिन दे दिया उसे जिसने ये दुनिया बनाने में की साझेदारी. लेकिन साझेदारी दिखी कहाँ. घर के चार दीवारी के भीतर के काम को कौन ही देख रहा है? उन्नंती के पथ पर अग्रसर भारत की उन्नति की गति अभी भी आधी ताकत पर ही है क्योंकि आधी आबादी का बड़ा प्रतिशत वो नहीं कर पा रहा जिसकी उनमे काबिलियत है. इसे अपने आस पास की स्त्रियों से ही जोड़ कर मत देखिए. सोशल मिडिया पर 5000 की सीमा है और भारत इस्वर की कृपा से 130 करोड़ पार कर रहा है. कामकाजी शहरी और पढ़े लिखे तबके को शायद बदलते भारत की बदलती नारी दिखेगी जो की पूरे देश का प्रतिनिधत्व करती है किन्तु यह देश का असल चेहरा नहीं है.

Womens Day, International Womens Day, Woman, Work, Job, Education, School, Salary, Manजैसा हमारा समाज है ,महिलाओं को कम ही मौके दिए जाते हैं कि वो अपना करियर चुन सकें

शिक्षित vs कामकाजी महिलाओं के आंकड़े

भारत में 78. 8 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले मात्र 59. 9 % प्रतिशत महिलाएं शिक्षित हैं.यकीनन पिछले सौ सालों में ये गिनती भारतीय स्त्रियों की बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी. शिक्षा में एक लम्बी छलांग लगाने के बावजूद कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत निम्न है. 76 % पुरुषों के सामने मात्र 20 .3 % महिलाएं कामकाजी है. 68% प्रतिशत स्नातक यानि ग्रेजुएट लड़कियां महिलाएं देश के वर्क फ़ोर्स का हिस्सा नहीं है. कारण? सामाजिक मानसिक बदलाव की सीमा!

महिलाओं के काम न करने को दो हिस्सों में बांटना बेहतर है.

80% प्रतिशत महिलाएं वो जिन्हे अपने काम के एवज़ में कोई परिश्रमिक नहीं मिलता. एक घरेलू महिला जिस पारिश्रमिक की हकदार है वह कुल मिला कर भारत की 40 % GDP बनाता है. इससे बड़ी चोरी या स्कैम मानव इतिहास में शयद ही कभी हुआ हो, चल रहा हो और भविष्य में निरंतर चलने की उम्मीद भी हैं.

'कुछ नहीं' करने वाली औरतें

अगर एक घर संभालने वाली महिला का दिन देखें तो अक्सर सुबह 4 से 6 के बीच शुरू होता है. बच्चों का स्कूल और पति का ऑफिस, भेज कर फ्री होने से ज़रा पहले, बस घर की साफ-सफाई, जिसे बिखेरने का काम दो या तीन लोगों ने किया है. पूरे घर के कपड़े, धुलाई और प्रेस करना, और साथ ही डस्टिंग बस! बड़े शहर की बात ना करें तो आज भी अधिकतर घर में, ये काम घर की स्त्रियाँ ही करती हैं.

नात बांत रिश्तेदार कुछ बाहर के काम जैसे राशन-सब्जी लाने, बिजली के बिल भरने, स्कूल की फ़ीस और ज़रूरत पड़ने पर बैंक के काम. बस और क्या? कुछ नहीं करने वाली को प्रोफेशनल से रिप्लेस करें तो पता चलेगा की 8 -10 लाख का पैकेज आप कुछ नहीं में ही बचा ले गए! इसके बावजूद भारत में 80 % प्रतिशत महिलाएं अपने काम के लिए कभी सराही नहीं जाती. नो डाउट वी आर लो इन हैप्पीनेस इंडेक्स!

किन्तु इस लेख में बात केवल उनकी जो उस कांच की छत पर हाउसके का पत्थर फेंकना चाहती है. ब्रेकिंग डी ग्लास सीलिंग!

'साक्षात्कार में- सवाल'

महिला के नौकरी आवेदन में - मैरिटियल स्टेटस यानि शादी शुदा है या नहीं इसे ध्यान से देखा जाता है. आप शादी शुदा है? ये सवाल पुरुष से भी पूछा जा सकता है, किन्तु कारण अलग होंगे. स्त्री यानि 'वीमेन एम्प्लोयी से यह सवाल उनके पद, तनख्वाह काम के प्रति समर्पण, नौकरी के स्थायित्व, सभी के मद्देनज़र पूछा जाता है. बच्चे है तो कितने बड़े और नहीं तो कब प्लान कर रही है ऐसे निजी सवाल भी पूछे जाते है !

परिवारों की आर्थिक मज़बूती भी औरतों को काम काजी महिलाओं की श्रेणी से दूर रखती है क्योंकि 'सुख सुविधा है तो काम की क्या ज़रूरत?', यह सोच आज भी बहुत से परिवारों में है. शिक्षित करने का ध्येय उसकी मानसिक, सामाजिक व आर्थिक आत्मनिर्भरता कभी नहीं रही. उसे शिक्षित होने की आज़ादी ही इसलिए दी गयी की वो घर को दहलीज़ के भीतर बेहतर ढंग से संभाले.

50 % महिलाएं शादी के बाद नौकरी छोड़ देती है. ये आंकड़ा बहुत बड़ा है और वजह है एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी. हम एक महिला को कामकाज के स्थान पर वो स्पोर्ट नहीं दे पाते जिससे वो अपनी ज़िम्मेदारियों को संभल सके. कितने ऑफिस है जहां छोटे बच्चों के लिए क्रेश की सुविधा है? नई मां के लिए फीडिंग रूम की व्यवस्था है ?वर्क फ्रॉम होम के ऑप्शन है ?

उसकी काबिलियत पर प्रोमोशन अपने समकक्ष पुरुष साथी के साथ ही मिल जाती है ? क्यों परिवार एक कामकाजी महिला को परिवार की इकाई के तौर पर वो संबल नहीं दे पाता की वो अपने करियर की महत्ता भी परिवार के बराबर रखे? बावजूद इसके महिला अपने हौसले से सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है बल्कि एक स्वस्थ प्रतियोगी भी है ऐसे में हम उसके काम को कमतर आंकने में कोई कोर कस्र नहीं छोड़ते.

मार्च 2019 में मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स के सर्वे के अनुसार महिलाएँ पुरुषों के मुकाबले 19 % कम तनख्वाह में काम करती हैं.जहाँ एक घंटे के लिए पुरुष न्यूनतम 245 रूपये कमाता है वहीं महिला उसी काम और समय के लिए उससे कम मात्र 193 रूपये कमाती है. भारतीय कॉर्पोरेट जगत में उच्च स्थानों पर मात्र 17. 3 % प्रतिशत महिलाएं हैं जबकि विश्व स्तर पर ये आंकड़ा 24 % है - हालांकि ये भी कम ही है.

ये सारे आंकड़े मिलकर भी स्त्री के हौसले का आंकलन नहीं लगा सकते. पिछले दो सालों में कामकाज में आए बदलाव को स्त्रियों ने अपने पक्ष में लेते हुए वर्कफ्रॉम होम से कामकाज में लौटने की शुरुआत की है. कंपनियां भी इस नए तरीके को अपनाने की कोशिश में है.

हमे एक ऐसा समाज बनाने की आवश्यकता है जहां महिला अपनी शिक्षा को देश की बढ़ोत्तरी में भी लगाए. ये ज़िम्मेदारी हम सबकी साझी है. किसी भी देश की आधी आबादी अगर 21वीं सदी में भी अपने हक और पहचान के लिए जद्दोजहत कर रही हो ,तो यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए की देश आधा ही बदला है, आधा बदलाव अभी बाकि है.

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लेखक

सरिता निर्झरा सरिता निर्झरा @sarita.shukla.37

लेखिका महिला / सामाजिक मुद्दों पर लिखती हैं.

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