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Updated: 22 जून, 2022 05:43 PM
ज्योति गुप्ता
ज्योति गुप्ता
  @jyoti.gupta.01
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शादी के बाद ससुराल में आई हुई किसी नवेली दुल्हन को ध्यान से देखना...वो कैसे कुछ बोलने से पहले हिचकिचाती है. काफी सोच समझकर वह अपने शब्दों का बाहर लाती है. उसके मन में यह डर बैठा रहता है कि कोई उस पर उंगली न उठा दे. उसे पता रहता है कि ससुराल के लोगों की निगाहें उसे अच्छी या बुरी बहू साबित करने वाली हैं. वह सारी तकलीफें इसलिए बर्दाश्त कर लेती है, क्योंकि उसे सबकी नजरों में सर्वगुण संपन्न बहू बनना है.

कहते हैं कि शादी के बाद हर लड़की की जिंदगी बदल जाती है, लेकिन क्यों?

आखिर ऐसा क्या हो जाता है कि लड़की को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है. जब ससुराल उसका दूसरा अपना घर है, सास-ससुर उसके माता-पिता हैं, देवर एकदम छोटा भाई है और ननद तो बहन ही है...जब सब अपने हैं तो फिर लड़की को बदलना क्यों पड़ता है? हां वह अपना बचपन का घर छोड़कर एक नए परिवार के साथ नए घर में शिफ्ट हो जाती है. वैसे तो कहा जाता है कि किसी लड़की का असली घर तो उसका ससुराल ही होता है.

marriage,problems after marriage, women problem after marriage, girl life changes after marriage, twitterअसल में भारत में बहुओं को नियंत्रण में रखने की बहुत पुरानी परंपरा है, जो 2022 में भी लागू है

हाए यह दुनिया जख्म भी देती है एहसास भी नहीं होने देती

सोचती हूं शादी के बाद अपने ही घरवाले किस तरह प्यार से बातों ही बातों में धीरे से जता देते हैं कि अब तुम पराई हो चुकी हो. शादी के बाद तुम उस तरह हक नहीं जता सकती जैसे पहले जताती थी. अब घर में कौन सी गाड़ी ली जाएगी, किस रंग की पेंटिंग होगी...यह तुमसे नहीं पूछा जाएगा क्योंकि अब तुम्हारी शादी हो चुकी है. बेटियां मन ही मन इस बात को अपना लेती हैं कि वे सच में पराई हो गईं.

अब करते हैं ससुराल वाले घर की बात...तो भले ही कितना नया जमाना आ जाए, बातें बोलने का तरीका बदल जाए, शादी की तस्वीरों के साथ हैश टैग लगने शुरु हो जाएं, लेकिन शादीशुदा महिला की जिंदगी में बहुत कुछ ऐसा है जिसकी टेंशन में उनकी उम्र बीत जाती है.

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दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा नहीं मतलब औरत सुखी

अगर किसी महिला से दहेज नहीं मांगा जाता, उसे मारा-पीटी नहीं जाता तो सभी लोग यह मान लेते हैं कि ससुराल में बहुत सुखी है, लेकिन उन छोटी-छोटी बातों पर कोई ध्यान ही नहीं देता जो हर महिला झेलती है, रोती है, कुढ़ती है और आखिरकार उसी स्थिति में खुद को ढाल लेती है. वह खुश दिखने के दबाव में रहती है इसलिए चाहते हुए भी कुछ बोल नहीं पाती.

शादी के बाद मिलने वाले वो प्रेशर जो एंजायटी देते हैं 

ससुराल में कोई मेरी बात का बुरा ना मान जाए, कोई मेरी बात का गलत मतलब न निकाल ले, कोई निगेटिव ना सोच ले, कहीं गलती से मैं कुछ गलत ना बोल दूं, ये करूं या ना करूं, क्या मैं यह बोल सकती हूं...ये दिक्कतें हर शादीशुदा महिला तो तब झेलना पड़ता है जब वो शादी करके ससुराल जाती है. सबकी निगाहें उसे जज करने के लिए तैयार रहती हैं. ऐसा लगता है कि शादी के बाद महिलाएं अपनी नहीं बल्कि अपने पति और ससुराल वालों की जिंदगी जीती हैं.

जैस- क्या उसके दोस्त उससे मिलने उसके घर आ सकते हैं? क्या वह अपनी मर्जी से किसी को अपने घर डिनर पर बुला सकती है? क्या वह पहले की तरह अपनी सहेलियों के साथ बाहर जा सकती है? क्या उसके माता-पिता उसके पास आकर रह सकते हैं? क्या उसका कजिन आ सकते हैं? क्या वह पार्लर जा सकती है? क्या वह अपने लिए शॉपिंग कर सकती है? वह अपने मायके या अपने रिश्तेदारों के घर शादी में जा सकती है? असल में इन सारी बातों के लिए शादीशुदा महिला को पति और ससुराल वालों की परमिशन लेनी होती है.

शादीशुदा औरत की जिंदगी पर दूसरों का कंट्रोल

मैंने देखा है कि जिस लड़की की शादी हो जाती है अगर उसे अपनी सहेली के घर शादी में जाना हो तो उसके मायके वालों के घर नेवता देना इतना जरूरी नहीं होता, जितना उसके ससुराल वालों को. इतना नहीं उसके सास-ससुर, पति, देवर सबसे यह मिन्नत करनी पड़ती है कि उसे प्लीज इस शादी में आने की परमिशन देकर एहसान करें. अगर वे मना कर दें तो लड़की चाहकर भी उस शादी में शामिल नहीं हो सकती. मायके वाले भी बोल देते हैं कि वो आ जाए तो अच्छा है, लेकिन ससुराल वाले कहीं भेजते नहीं है. सुसराल वालों का रवैया काबिले तारीफ माना जाता है, बहू का घर में रहना इज्जत से जोड़ दिया जाता है.

बात औरत तक आने से पहले ही तय कर दिया जाता है कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत

अब वह किसी के घर की बहू है, किसी के घर की इज्जत है इसलिए उसे हमेशा दूसरों के हिसाब से समाज के हिसाब से चलना होगा...अगर वह कहीं बाहर जाए, किसी फंक्शन में जाए तो वह बिना सास या पति के मर्जी भी डांस भी नहीं कर सकती, किसी से बात भी नहीं कर सकती...इस तरह वह अंदर ही अंदर घुटती रहती है और लोग कहते हैं कि ससुराल में क्या कमी है?

कोई उससे तो पूछो की उसे क्या चाहिए...उसे ससुराल में सबसे प्यार से ही बात करनी है. ननद को उसके नाम के साथ दीदी लगाना नहीं भूलना है. देवर को उसके नाम से नहीं बाबू या भइया कहके बुलाना है. किसी छोटे बच्चे को गलती से भी तुम नहीं कहना है. हालांकि वह अपने मायके में अपने भाई-बहन को तो आप नहीं कहती इसका मतलब यह तो नहीं कि वह उन्हें प्यार नहीं करती, खैर बात सिर्फ बोलने के तरीके को बदलना तो भी समझ आता है लेकिन उसे सुबह जल्दी जगने और पहली रसोई में टेस्टी खाना बनाने की भी टेंशन रहती है.

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सबकी बातों में बस हां में हां मिलाना में ही औरत की भलाई

अगर किसी की बात बुरी भी लग जाए तो चुप रहना पड़ती है. छोटी ननद की बात काट नहीं सकती भले ही वह गलत बोले, बहू को नए घर के नियम समझाए जाते हैं, उससे कहा जाता है कि अब वह पुरानी दुनिया को भूल जाए, उसे समझाया जाता है कि किसके सामने कैसे जाना है, पल्लू कहां लगाना जरूरी है, किससे बात करनी है और किसके साथ भोजन करना है.

ससुराल का ऐसा माहौल होता है कि पत्नी संकोच के मारे अपने पति के बारे में भी पूछ नहीं पाती. जो महिला आती है वही नया नियम बता कर चली जाती है, अगर लड़की भूल गई तो खैर नहीं. वह तो अपने कदम भी धीरे-धीरे रखती है चलने की आवाज आ गई तो उसे कुलक्ष्मी कहा जाएगा. वह भले भरभरके बरतन धोए लेकिन जरा भी आवाज नहीं आनी चाहिए. 

खाने से लेकर कपड़े पहनने का तरीका बदल दो

शादी के बाद उसे किस तरह के कपड़े पहनने हैं यह भी तय कर दिया जाता है. ससुराल में किसे क्या पसंद है उसे उसी हिसाब से चलना पड़ता है. मान लीजिए अगर किसी को आलू के पकौड़े पसंद नहीं है तो उसके लिए अलग से प्याज के बनाओ. किसी को अदरक वाली चाय चाहिए तो किसी को कॉफी चाहिए. किसी को हेल्दी खाना है तो किसी को चचपटा...कई बार तो बहू को समझा दिया जाता है कि, हमारे यहां खाना बनाने का तरीका अलग है. हम पहले प्याज डालते हैं फिर मिर्च...सरसो तेल नहीं रिफाइन में सब्जी बनाओ, आटे में नमक, चावल में नमक नहीं खाती तो सीख जाओ... खाने में चावल नहीं रोटी ही बनेगी.

शादीशुदा महिला मतलब ना सोने की जररूत ना थकान

शादी हो गई मतलब किसी लड़की को हर पल एक्टिव रहना है. उसे सारे काम फटाफट करने है. वह एक मशीन है जो सब मैनेज कर सकती है. चाय बनाने से लेकर पति के अंडरवियर तक का ध्यान रखना है. शादी में दुल्हन को ना खाना नसीब होता है ना सोना...शायद ऐसा इसलिए ताकि वह अपने आने वाली जिंदगी की झलक देख ले.

ससुराल में सब होता है लेकिन दुल्हन को जल्दी खाना और सोना नसीब नहीं होता है. बात सिर्फ खुद को बदलने की नहीं होती बल्कि इतना होने के बाद खुश रखने का दबाव भी होता है. नई नवेली दुल्हन सुंदर दिखनी चाहिए. उसे सभी की छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना होता है. अरे, शादी के दिन भी भले ही आप दुल्हन हो लेकिन आपके दिमाग में यह टेंशन रहती है कि बारात में आई महिलाओं को कोई दिक्कत तो नहीं. अरे वह ननद है माने उसका ओहदा शादी वाले दिन बड़ा होता है, वह दुल्हन की बहन बड़ी बहन है. इसलिए आपको उसके हर नखरे सहने होंगे, उसकी बातें बर्दाश्त करनी होंगी, उसके लिए मेहंदी वाली से लेकर पार्लर तक की बुकिंग भी करनी पड़ सकती है.

महिलाओं ने ट्विटर पर लिखा अपना दुख कहा- हर बात के लिए परमिशन की भीख मांगनी पड़ती है

नीरू नागराजन ने अपने ट्वीट में लिखा है कि, 'कभी-कभी मैं अपनी पिछली शादी और छोटी-छोटी बातों के बारे में सोचती हूं जो मुझे चिंता में डाल देती थीं. "मेरी चचेरी बहन अमेरिका जा रही है, क्या मैं उससे मिलने जा सकती हूँ?" एक परिवार के सदस्य की शादी हो रही है, क्या आप शादी में आएंगे?" सब कुछ भीख मांगने जैसा था.

वह लिखती हैं कि कई इंडियन पुरुष और उनकी फैमिली इन छोटी-छोटी चीजों में गर्व महसूस करते हैं. हालांकि अगर आप किसी व्यक्ति को कंट्रोल करते हैं, छोटी बातों के लिए उन्हें टेंशन देते हैं तो यह गर्व की बात कतई नहीं है. इनके ट्वीट पर कई महिलाओं ने अपनी-अपनी कहानी बताई है, जिसे देखकर समझा जा सकता है कि आज भी महिलाओं की क्या हालात है? एक ने लिखा है कि शादी के बाद मुझे पास में रहने वाली दोस्तों से मिलने नहीं दिया जाता था, मेरे ससुर ने कहा था कि शादी के बाद दोस्ती नहीं होती है. इस पोस्ट को कई महिलाओं ने अपनी तकलीफ मानी है.

असल में हमारे यहां बहुओं को नियंत्रण में रखने की बहुत पुरानी परंपरा है, जो 2022 में भी लागू है. इस बात को वे मर्द नहीं समझेंगे जो कमेंट में 'मर्द को दर्द होता है' लिख जाते हैं. महिलाओं के लिए समय बदला है, वे आत्मनिर्भर हैं. बाहर काम करने जाती हैं लेकिन उनकी जिंदगी पर उनके पति और ससुराल वालों का कंट्रोल होता है. हमसे से कई ने अपनी मां, चाची, भाभी की जिंदगी ऐसी ही देखी है, उन्हें अपने ससुराल में अपने लोगों को बुलाने से पहले इजाजत लेनी पड़ती है.

शादी के बाद बहू अपनी मां पास मायके रहने नहीं जा सकती, उसे ससुराल की 10 जिम्मेदारियां गिना दी जाती हैं. वे कहीं अकेले बाहर घूमने नहीं जा सकती...शादी के बाद हर महिला खुद को खुशी-खुशी पूरी तरह बदल देती है, लेकिन बात ढलने तक कहां है?

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लेखक

ज्योति गुप्ता ज्योति गुप्ता @jyoti.gupta.01

लेखक इंडिया टुडे डि़जिटल में पत्रकार हैं. जिन्हें महिला और सामाजिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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