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Updated: 06 जुलाई, 2022 07:44 PM
रीवा सिंह
रीवा सिंह
  @riwadivya
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'सर तन से जुदा' जैसे बयान कितने सामान्य होते जा रहे हैं. इनका सामान्य होना भयावह है. कट्टरता लोकतंत्र की हत्या करने पर अमादा है. धर्म के नाम पर जान ले ली जाए, धर्म को इतना प्रधान कभी नहीं होना था. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के लिये नहीं होना चाहिए, सही है. शिवलिंग पर टिप्पणी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, पैग़म्बर पर टिप्पणी सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास! मैंने पैग़म्बर और आयशा पर 2020 में लिखा था और सवाल किये थे. उन्हें मानने वाले लोगों ने भी उस विवाह को ग़लत कहा था. एक स्वस्थ और सार्थक विमर्श हुआ था.

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आज वह पोस्ट देखकर अचंभित रह जाती हूं. आज नुपूर शर्मा की टिप्पणी का आलम यह है कि उनका समर्थन करने वाले एक मामूली दर्जी का सिर धड़ से अलग कर दिया गया और बकायदा वीडियो बनाकर बताया गया कि यह कृत्य उन्होंने किया है, जैसे कोई आने वाला हो इसपर उन्हें शाबाशी देने.

उदयपुर में कर्फ़्यू लग गया, इंटरनेट सेवाएं बाधित रहीं ताकि शान्ति बरती जाए. उस समाज में कोई कहां से शान्ति ढूंढेगा जहां धर्म के नाम पर मारपीट, लिन्चिंग और अब ऐसे क़त्ल होने लगे हों. उस क़ातिल को आप क्या सौहार्द का पाठ पढ़ायेंगे जिसे अपने जघन्य कृत्य पर ज़रा भी अफ़सोस न हो!

लोग यहीं इस बात को कह देंगे कि मुसलमानों के साथ भी बर्बरता हो रही है, आपके कहने से पहले ही स्वीकारती हूं कि हो रही है. लेकिन यह कहकर किसी के क़त्ल का बचाव किया जा सकता है क्या? हम सभी आग की लपटों में हैं. विमर्श की जगह विलुप्त हो रही है, कट्टरता को हेरोइज़्म की तरह प्रदर्शित किया जा रहा है.

कई बार महिमामंडित भी किया जा रहा है. हम में से बहुत कम लोग बिना किसी लेकिन, किन्तु, परन्तु के किसी भी ग़लत को ग़लत कहने की हिमाक़त करते हैं. जो ऐसा करते हैं वे भी इस वीभत्स समाज में तलवार की धार पर चल रहे हैं.

पता है कि सभी नश्वर हैं लेकिन क्या इस तरह मरने के लिये जी रहे हैं हम? आग की लपटें कब किस ओर मुड़ें कोई नहीं जानता. अंगारों का कोई अपना नहीं होता. एक दिन सभी मारे जाएंगे लेकिन भारत का स्व तो आज ही मर रहा है. कोई ख़ुदा कोई ईश्वर क्यों नहीं बचाता इसे!

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लेखक

रीवा सिंह रीवा सिंह @riwadivya

लेखिका पेशे से पत्रकार हैं जो समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं.

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