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Updated: 26 मार्च, 2018 01:43 PM
गिरिजेश वशिष्ठ
गिरिजेश वशिष्ठ
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आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि एक राजनीतिक आंदोलन कितना खतरनाक रूप ले सकता है. गायों को लेकर हुए उग्र हिंदू आंदोलन ने देश के लिए अन्न संकट के हालात खड़े कर दिए हैं. गायों के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सरकारी संरक्षण से समस्या और जटिल हो गई है. अब तक कर्ज से किसानों की मौत हो रही थी, अब जानवरों की तबाही से किसान बर्बादी के मुहाने पर पहुंच गए हैं.

हालात ये हैं कि आतंक के बावजूद किसान गायों को मारने पीटने से डर रहे हैं. नतीजा ये है कि धीरे धीरे आवारा जानवरों की समस्या विकराल रूप ले चुकी है. उत्तर प्रदेश में हालात और भी भयानक हैं. जो जानवर अब दूध नहीं देते या जो नर बधिया नहीं किए गए उन्हें किसान दागकर छोड़ देते हैं. जब खुद खाने को नहीं तो गायों को कैसे खिलाएं.

ये जानवर धीरे धीरे अपना झुंड बनाकर घूमने लगे हैं. किसी भी खेत में घुस जाते हैं और देखते ही देखते फसल चट कर देते हैं. पहले ये समस्या सिर्फ बुंदेलखंड में थी लेकिन अब पूरे यूपी और आसपास के राज्यों में पहुंच गई है.

cow, farmer, UPगौरक्षा दल ने गायों को बचा तो लिया पर किसानों का क्या?

विज्ञान के जानकार कहते हैं कि इस अजीब सी परिस्थिति के कारण पूरा पारिस्थिक तंत्र गड़बड़ा गया है. जानवर लगातार फसलें नष्ट कर रहे हैं. किसान इससे तबाही की ओर हैं. गांवों में मीडिया नेटवर्क न होने के कारण उतनी खबरें नहीं आ पातीं लेकिन कई किसानों की मौत की खबर इसके बावजूद आ चुकी है.

एक मामला ये है-

उत्तर प्रदेश में बांदा जिले की नरैनी कोतवाली क्षेत्र के पनगरा गांव में खेत में खड़ी गेहूं की फसल आवारा जानवरों के चर लेने से लगे सदमे में एक किसान की मौत हो गई. उप जिलाधिकारी ने बाकायदा रिकॉर्ड पर यह जानकारी दी. उप जिलाधिकारी नरैनी डॉ. सीएल सोनकर ने बताया, पनगरा गांव का किसान छकना प्रजापति (60) ने अपने दो बीघे खेत में गेहूं की फसल बोई थी और हर रात खेत में बसनेर कर उसकी रखवाली करता था. शनिवार-रविवार की रात उसके खेत पहुंचने से पहले आवारा जानवरों का झुंड गेहूं की फसल चर गया, जिससे उसे खेत में ही सदमा लग गया.

दूसरा मामला उन्नाव का-

बेथर गांव के ग्राम प्रधान ब्लॉक क्षेत्र के प्रधान संघ अध्यक्ष सिद्धार्थ तिवारी की अगुवाई में डीएम शीतल वर्मा और एसपी जे रवीन्दर से बेथर गांव के ग्रामीण मिलने पहुंचे. जहां ग्रामीणों ने कहा कि वह सभी पिछले काफी समय से आवारा जानवरों के आतंक से परेशान हैं. वो खेतों में मेहनत करके फसल तैयार करते हैं और आवारा पशु रातों रात उनकी फसल को चट कर जाते हैं.

तीसरी खबर वैर से-

गांव मोरदा में आवारा जानवर के हमले से एक किसान घायल हो गया. गांव के ही जयसिंह, पुत्र कुंजी लाल जाट ने बताया कि गत रात्रि वह अपने खेतों में फसल की रखवाली कर रहा था. उसी दौरान आवारा जानवरों का एक झुंड आया. अपनी फसल की रखवाली कर रहे किसान को जानवरों ने ही उस पर हमला कर दिया. और उसे नीचे पटक लिया.  आवारा जानवरों की समस्या , ये तस्वीर बुंदेलखंड से है, वहां सूखे के दौरान ये हाल था.

चौथी खबर-

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी किसानों ने लगभग 250 आवारा जानवरों को गांव के एक प्राइमरी स्कूल में बांध दिया. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, ये किसान आवारा जानवरों की वजह से परेशान थे.

एक स्थानीय किसान ने अखबार को बताया कि जब से बूचड़खाने बंद हुए हैं, तब से आवारा जानवरों की संख्या बढ़ गई है. उन्होंने कहा कि गाय को बचाने के लिए यह अच्छा कदम है, लेकिन इनके लिए कोई व्यवस्था होनी चाहिए.

cow, farmer, UPयोगी सरकार को इस समस्या का समाधान निकालना होगा

पांचवीं खबर-

किसानों की समस्या गंभीर है. हाल ही में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने ऐलान किया कि आवारा गोवंश (सांड, गाय, नीलगाय) को सरकार की तहसील में बांध देंगे. इसके लिए उन्होंने लोगों से आह्वान किया है कि वह कस्बों और गांवों में आवारा घूम रहे इन पशुओं को पकड़कर तहसील लेकर पहुंचें.

ज्यादातर मामलों में फसलों की तबाही के पीछे आवारा जानवरों की बढ़ती संख्या जिम्मेदार है. किसान कहते हैं कि योगी सरकार की सख्ती और गौरक्षकों को खुली छूट के कारण कसाइयों ने ये काम बंद कर दिया है. किसान जानवरों को मारकर भी नहीं भगा सकते क्योंकि पता नहीं कब कौन उनकी ही जान ले ले. जो लोग इससे जुड़े हुए कारोबार करते थे और चमड़े के कारोबारी थे उन्होंने भी कारोबार बदल लिया है. हालात ये हैं कि मरे जानवर उठाने के लिए भी कोई नहीं मिल रहा है.

पारिस्थितिक विषयों के जानकार प्रद्युम्न सिंह कहते हैं कि अभी सरकार की नीतियां बदलनी होंगी. वरना दस साल में यूपी में खेती करना असंभव हो जाएगा.

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लेखक

गिरिजेश वशिष्ठ गिरिजेश वशिष्ठ @girijeshv

लेखक दिल्ली आजतक से जुडे पत्रकार हैं

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