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Updated: 20 अक्टूबर, 2017 09:18 PM
कमलेश सिंह
कमलेश सिंह
 
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चलिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं. दिवाली की. इसमें एक गाय भी है.

जब मैं छोटा था, तो हमारे घर में दिवाली बड़ी फीकी हुआ करती थी. हमारे आसपास लोग काली पूजा को जबरदस्त ढंग से मना रहे होते थे, लेकिन हमारे परिवार के दसेक घरों में ऐसा कुछ नहीं होता था.

बताया गया था कि हमारे पुरखों में कई दिवाली वाले दिन एक लड़ाई में काम आ गए थे. ऐसे में सिर्फ एक या दो दिए जलाकर त्योाहार के नाम पर इतिश्री कर ली जाती थी. जबकि हमारे आसपड़ोस में दिवाली की गूंज रहती थी. नए रंग-बिरंगे कपड़े पहने मेरी उम्र के बच्चे एक-दूसरे को मिठाई बांट रहे होते थे.

पटाखों की आतिशबाजी से रोशन हो चुकी अमावस्या की काली रात को देखकर हम ईर्श्या से भर जाते थे, लेकिन कह कुछ नहीं पाते. घरवालों से पटाखा मांगते तो सख्ती से मना कर दिया जाता, "हम नहीं मनाते" दिवाली. लेकिन इसकी वजह हमारी समझ से बाहर ही रहती.

इसी तरह कई दिवाली बीत गईं. हम बच्चे अगर पूछते कि कितनी दिवाली के बाद हम भी दिवाली मनाएंगे तो जवाब मिलता के तब जब दिवाली पर हमारे खानदान में किसी बच्चे का जन्म होगा.

पूरी रिश्तेदारी में नजर डालने पर तो मुझे इसकी संभावना ना के बराबर ही नजर आई. हम हैरान थे. उम्मीद और प्रार्थना ही कर सकते थे कि ऐसा जल्द हो. लेकिन फिर दिवाली आईं और चली गईं.

मेरी पीढ़ी ने कोई लड़ाई नहीं देखी थी. इसलिए हम उस भावना से खुद को नहीं जोड़ पाते थे. लेकिन पिछली पीढ़ी के साथ ऐसा नहीं था, और दिवाली उनकी यादों को ताजा कर देती थी. उनके मन में कहीं होगा कि बीती को बिसार कर आगे बढ़ें. लेकिन फिर समाज के रिवाज उन्हें ऐसा करने से रोक देते थे. और ऐसा इसलिए भी क्योंकि मामला दुख का था.

गाय, दिवाली, धर्म, आस्था, त्योहार    हम हमेशा खुश रहना चाहते हैं, यदि खुशी मनाने का बहाना मिल जाए तो क्‍या कहना...

हम एक दादाजी को इस सबका दोषी मानते हैं. उन्हीं के कहने पर ये लड़ाई हुई थी तय दिन से पहले. दिवाली पर सब काली मां का आशीर्वाद लेकर निकले, लेकिन कुछ कभी नहीं लौटे.

ये लड़ाई तभी होनी थी जबकि मुकाबले के लिए पर्याप्त बाहुबल और अस्त्र-शस्त्र उपलब्ध हो जाते. रिश्तेदारी के लोगों को भी पहुंचना था साथ देने के लिए.जीत का विश्वास और मां काली का आशीर्वाद काम ना आया. दुश्मन ऊंचाई पर थे. तीर और भालों की बरसात का अंत लाशों में हुआ. बाकी रह गईं बहादुरी की कहानियां. और दिवाली पर पूर्ण विराम. हर दिवाली के पहले सवाल कि हम कब पटाखे जलाएंगे, औरों की तरह कब घर को सजाएंगे?

जवाब वही मिलता, जब तक कि घर में किसी बच्चे का जन्म नहीं होता. फिर गाय भी परिवार की ही सदस्य है, इसलिए बछड़े का जन्म भी मान लिया जाएगा. यदि काली गाय का बछड़ा हुआ तो. हमारे घर में कुछ काली गायें थीं, इसलिए उम्मीद बंधी हुई थी. हमने कुछ दिवाली और इंतजार किया. आखिर एक दिवाली के पहले वाली रात किसी गाय ने बछड़े को जन्म दिया.

इस तथ्य को कि गाय काली नहीं थी, सब निगल गए. दीवाली पुन: आरंभ हो गई. अब वर्षों बाद, दिवाली वाले दिन, घर से दूर, अकेला और उदास, मैं यह सब याद करते समझ पाया कि इस सबके मायने क्या हैं. समझ आया कि खुशी की कामना करना निराशा से ज्यादा तीव्र भावना है. बुरे अनुभव को भुला देने की इच्छा ज्यादा ताकतवर है उसे याद रखने की इच्छा से. हमें दिवाली मनाने के लिए किसी कारण की जरूरत नहीं थी.

हमें बस बहाना चाहिए था. यदि आप दुख की गहराई से बाहर आना चाहते हैं तो इशारा ही काफी है. उस दिवाली अपने घर, अकेला और उदास, मैं बाहर निकला और पटाखे खरीदे. और बच्चों का जो भी पहला झुंड मुझे मिला, उनको दे दिए. दिवाली फिर हैप्पी हो गई.

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लेखक

कमलेश सिंह कमलेश सिंह

ले‍खक इंडिया टुडे (डिजिटल) के मैनेजिंग एडिटर हैं.

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