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Updated: 22 मई, 2022 10:28 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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बिल्कुल ठीक समझ रहे हैं आप. यह कहानी दूसरे मुग़ल बादशाह हुमायूं और चित्तौड़ की राजपूत रानी कर्णावती के भाई-बहन वाले भावुक प्यार की ही है. हुमायूं जिंदगी भर इस अफ़सोस के साथ जिया और एक दिन अकबर के हाथ में मुगलिया तख़्त छोड़कर मर गया. उसके जीवन में यह ऐसा बोझ है, जिसका एक दबाव आज भी हम और आप अपने कंधों पर शिद्दत से महसूस करते हैं और दब जाते हैं. हुमायूं के उस दर्द को कम करने के लिए भारत ने खुले दिल से गंगा जमुनी संगम की एक नई नदी को अपनी चेतना की धमनियों में बहाया. हमने पत्थर हृदय को भी मोम सरीखा कोमल कर पिघला दिया.

लेकिन याददाश्त का क्या करें. वह है कि रह-रहकर पीछा करने को विवश करता है. लोग जख्म कुरेद देते हैं तो सवाल खड़ा हो जाता है. क्या कभी आपने गौर किया कि जो बादशाह एक राजपूत बहन की राखी पाने के बाद बंगाल से चित्तौड़ तक आनन-फानन में दौड़ पड़ता है उसके यहां बाद की पीढ़ियों तक अकबर, शाहजहां और औरंगजेब कैसे पैदा होते रहते हैं? यह बड़ा सवाल है और कश्मीर से तिरुअनंतपुरम तक का भारत असल में इसी सवाल के नैरेटिव से अपने-अपने इतिहास की अंधेरी सुरंग में भटकने को अभिशप्त है. यह गलती इतिहास की भी नहीं बल्कि हमारी दृष्टि की है. हमारी वह दृष्टि जो कई तरह के उपनिवेशों से आजतक आजाद ही नहीं हो पाई है.

हुमायूं का राखी प्रसंग क्या था और उसकी घुसपैठ इतिहास में कैसे हुई है, इस पर विचार करते हुए आगे बढ़ते हैं. इस पर तो तर्क करने का कोई तुक ही नहीं है कि धार्मिक फतह को निकले मुगलों ने मध्यकालीन इतिहास में असंख्य झूठ गढ़े. कभी इस सवाल पर गौर किया है कि ब्राह्मण-राजपूत समेत लगभग हर जाति का धर्मांतरण हुआ. वह जैसे भी हुआ हो- ताकत के जोर पर, सत्ता के लालच में या ऐसी तमाम घटनाएं जिनकी वजह से उन्हें लगा कि उनके पुराने धर्म में उनका निजी अस्तित्व अपवित्र हो गया और नष्ट हो चुका है. एक लंबे वक्त तक भारत में बहिष्कार की जो सामजिक कुरीति रही है उसका भी बहुत बड़ा योगदान है मौजूदा भारत की तमाम चिंताओं में. अभी भी भारतीय समाज व्यवस्था में किसी भी जातीय धार्मिक तौर पर बहिष्कृत व्यक्ति की वापसी के रास्ते बहुत तंग हैं. जबकि यह दौर इंटरनेट का है.

humayunवेब सीरीज द एम्पायर में आदित्य सील ने हुमायूं का किरदार निभाया है. (प्रतीकात्मक फोटो)

धर्मांतरण, नैरेटिव और इतिहास में उनकी घुसपैठ

मैंने आसपास ऐसे तमाम सैम्पल पाए हैं जिसमें उच्च कुलीन हिंदू से मुसलमान बनने वालों के पास धर्मांतरण की अपनी कहानियां हैं और वो कहानियां हिंदुओं की किसी प्रथा, किसी व्यवस्था, जातिवाद या मुगलों की दयालुता से जाकर जुड़ती हैं. आप लोगों से खुलकर बात करेंगे तो ये चीजें पता चल जाएंगी. राखी के लिए कर्णावती को बचाने निकले हुमायूं की कहानी भी हिंदू से मुस्लिम बने समुदाय में पीढ़ियों से गुजरती आ रही हैं. खासकर धर्मांतरण करने वाले उच्चवर्गीय मुसलमानों में. सवाल है कि यह इतिहास में घुसा कैसे? याददाश्त का इतिहास में घुसपैठ की यह घटना ज्यादा पुरानी भी नहीं, बस 19वीं शताब्दी का है.

असल में ब्रिटिश इंडिया के राज में कर्नल जेम्स टॉड राजस्थान में ही था. उसने वहां के इतिहास पर एक किताब लिखी- "राजस्थान का इतिहास और पुरावशेष." स्वाभाविक था कि राजस्थान के इतिहास पर आधारित यह किताब भारतीय छात्रों में खूब पढ़ी गई. अंग्रेज से बड़ा विद्वान भारत में भला कोई हुआ है. शेक्सपियर से कई सौ साल पहले जन्मे कालिदास को भी "भारत के शेक्सपियर" का तमगा मिल सकता है. जबकि कायदे से शेक्सपियर को यूरोप का कालिदास बनना था. यह हमारी औपनिवेशिक अंग्रेजी परस्त सोच का दुर्भाग्य है.

खैर, कर्नल जेम्स टॉड की किताब के एक हिस्से ने भारतीय चेतना में रचे बसे छात्रों को खूब आकर्षित किया. कर्नल टॉड ने 1535 की घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि राणा संगा की विधवा महारानी कर्णावती पति के निधन के बाद अपने बड़े बेटे विक्रमादित्य को गद्दी पर बिठाकर मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ से शासन कर रही थीं. गुजरात के शासक बहादुर शाह की उसपर नजर थी. राणा सांगा वहीं शूरवीर हैं जिन्होंने हुमायूं के पिता को नाको चने चबवा दिए, इतिहास आज भी चिल्ला चिल्लाकर उसकी गवाही देता है.

चित्तौड़ में महिलाओं के तीन जौहर इतिहास प्रसिद्द हैं

किताब के मुताबिक़ बहादुर शाह की मंशा को रानी कर्णावती भांप चुकी थीं. ऐसे में उन्होंने हुमायूं को राखी भिजवाई और एक बहन के नाते मदद मांगी. हुमायूं उस वक्त बंगाल के अभियान पर था, मगर जैसे ही उसे रानी कर्णावती का पत्र मिला भाई की भूमिका निभाने के लिए बिना एक क्षण गंवाए वह मेवाड़ के लिए निकल पड़ा. हुमायूं मेवाड़ तो पंहुचता है मगर तबतक देर हो चुकी थी. कर्णावती ने राजपूत युवराजों को कहीं सुरक्षित भिजवा कर बिल्कुल आख़िरी क्षण में जौहर कर लिया. जौहर इसलिए कर लिया क्योंकि तब विदेशी आक्रमणकारी हारे हुए राज्य की रानियों और दूसरी महिलाओं को जबरदस्ती अपने हरम में रखते थे या उसे ओहदेदार लोगों में बांट दिया करते थे.

चित्तौड़ के तीन जौहर इतिहास प्रसिद्द हैं. आपने कभी विचार भी नहीं किया होगा कि जो महारानी पति के निधन पर सती नहीं होती वह जौहर कर रही है और भारतीय समाज के माथे पर लिख दिया गया कि यहां सतीप्रथा का प्रचलन है. यह क्यों था? किताब के मुताबिक हुमायूं को अपनी देरी का अफसोस होता है और बदले में वह बहादुरशाह का दमन करता है. मेवाड़ को मुक्त कराता है और उसे राणा सांगा के ही उत्तराधिकारियों को सौंपकर दिल्ली लौट जाता है.

humayun tombदिल्ली में हुमायूं का आलीशान मकबरा है.

कर्नल जेम्स टॉड ने यह संदर्भ किस शिलालेख या पत्र से उठाया वही जानें. हो सकता है कि ऐसा ही हुआ हो जैसे जिसका जिक्र हूबहू कर्नल साब ने अपनी किताब में किया. लेकिन इसी कहानी से जुड़े और भी तथ्य हैं जो कर्नल सब की बात को झूठा साबित करने के लिए पर्याप्त हैं. नीचे के आठ पॉइंट्स में इसी कहानी के दूसरे सिरों को जोड़ना बिल्कुल भी मुश्किल काम नहीं.

1) सिद्ध हो चुका है कि उस दौर में मुगलिया सल्तनतों का अभियान जितना राजनीतिक था उससे कहीं ज्यादा धार्मिक था. तत्कालीन इस्लाम में भाई बहन का विचार सिर्फ एक माता के गर्भ से जन्मे बच्चों को लेकर माना जाता है. यहां तक कि चाचा-मौसी-मामा की बेटी को भी बहन के रूप में नहीं देखा जाता. सल्तनतों में ऐसी रिश्तेदारियों के प्रमाण खोजना मुश्किल नहीं. हालांकि भाई बहन को लेकर इस तरह के विचार भारतीय परंपरा में नहीं मिलते.

2) हरम में पांच-पांच सौ और हजार-हजार औरतों को भी नपुंसक रक्षकों की निगरानी में रखने वाले बर्बर शासकों से एक विधर्मी महिला के लिए भाई-बहन की भावना का तर्क संदिग्ध क्यों नजर नहीं आता है.

3) राणा सांगा और बाबर के बीच जिस तरह की दुश्मनी थी उसमें शायद ही गुंजाइश बचती हो कि राणा सांगा की पत्नी बाबर के बेटे उस हुमायूं से सैन्य मदद मागने को चिट्ठी लिखती है जो खुद बाबर के बनाए सल्तनत को बरकरार रखने में चौतरफा संघर्ष कर रहा है. बाबर ने तो सल्तनत ही जिहाद के नारे की वजह से कायम की.

4) राणा सांगा और बाबर के बीच 1527 में खानवा की जंग हुई थी क्या 7 साल के अंदर ही मेवाड़ और दिल्ली में भाई बहन वाले संबंध बन गए थे. तत्कालीन विदेशी आक्रांताओं की राजनीति में भला हुमायूं एक हिंदू रानी के लिए बहादुर शाह जैसी मिलती जुलती इस्लामिक शक्ति से दुश्मनी क्यों ही मोल लेने उतरा. क्या वह इतना बहादुर भी था? इतिहास ही बताता है कि वह लड़ाई छोड़कर कैसे ईरान भाग गया था.

5) एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि वह बहादुर शाह जैसी मिलती जुलती इस्लामिक शक्ति से जंग करने निकल पड़ा, पर यह क्यों नहीं माना जा सकता कि इसमें हुमायूं की राजनीतिक दिल्ली सल्तनत के गुजरात तक विस्तार की राजनीतिक इच्छाशक्ति थी ना कि महारानी कर्णावती के प्रति भाई बहन वाले प्रेम की भावना.

6) अगर हुमायूं कर्नल साब की धारणा के हिसाब से इतिहास में करेक्ट था तब आखिर कौन सी बात रही कि महाराणा प्रताप अपने वंशजों पर कृपा करने वाले महान हुमायूं के बेटे महान अकबर से चिढ़े रहते हैं. उसे मृत्यु तक नाम नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से "तुर्क" ही कहकर बुलाया. युद्ध से पहले सुलह के लिए पहुंचे मानसिंह और महाराणा के ऐतिहासिक संदर्भ देख लीजिए.

7) महाराणा प्रताप रानी कर्णावती के दूसरे बेटे राणा उदय सिंह के बेटे थे जिन्होंने 30 साल तक राज्य किया. जब हुमायूं ने राणा सांगा के परिवार से भाई बहन वाला रिश्ता बना लिया था और जैसा कि कर्नल साब का विवरण है- बहादुर शाह से खुद राज्य जीतकर सौंपा फिर अकबर जैसा महान मुग़ल महाराणा प्रताप को अधीन क्यों करना चाहता था.

8) हुमायूं के बेटे अकबर से महाराणा प्रताप की घृणा की वजह क्या थी कि उन्होंने अकबर की दासता को स्वीकार करने की बजाए भीलों के साथ जंगल में फटेहाल दिन गुजारना पसंद किया और मृत्यु तक संघर्ष ही करते रहे. कम से कम महाराणा प्रताप से तो ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती.

अंग्रेज लेखक ने इतिहास का एक और मनगढ़ंत किस्सा लिखा

इस बात पर कोई मतभेद नहीं कि हुमायूं ने ही बहादुर शाह के गुजरात राज का अंत किया था. क्योंकि बहादुर शाह पश्चिम में एक बड़ी चुनौती बन चुका था और मेवाड़ तक राज्य विस्तार की उसकी योजना दिल्ली के बादशाहों के आंख की किरकिरी रही होगी. इतिहास बहादुर शाह के राजस्थान तक पहुंचने का मतलब किस तरह निकालेगा. क्या वह दिल्ली के और नजदीक नहीं आ रहा था. ऊपर के सभी आठ तर्क हुमायूं की राखी वाली कहानी को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त हैं. बावजूद कि इन चीजों को भी शायद ही प्रमाणित किया जा सके. जैसे राखी वाली कहानी प्रमाणित नहीं होती.

हां, लेकिन कर्नल साब की ही किताब में दिए एक और महान झूठे संदर्भ से उसे पूरी तरह ध्वस्त जरूर किया जा सकता है. असल में जिस किताब में हुमायूं के राखी वाले एपिसोड का जिक्र है उसी में राजस्थान का एक और इतिहास दावे के साथ लिखा गया है. यह भी कपोल कल्पित है. अकबर से राजपूत राजकुमारी जोधाबाई के विवाह की कहानी. जबकि इतिहास में किसी जोधाबाई का विवाह अकबर से हुआ ही नहीं और यह प्रमाणिक रूप से भी सिद्ध हो चुका है. बावजूद कि उसी इतिहास पर बॉलीवुड ने जोधा अकबर नाम की एक फिल्म तक बना दी.

aurangzeb-raw-grave-_052222075957.jpgऔरंगजेब

हुमायूं और बहादुरशाह के इतिहास के दूसरे सिरे को देखें तो इतिहास की ही कई किताबों में बाकायदा दिल्ली के बादशाह और गुजरात के शासक के बीच पत्राचार का जिक्र है. मध्यकाल के इतिहास पर आधारित एसके बनर्जी की किताब हुमायूं बादशाह में हुमायूं को लिखे बहादुर शाह के पत्र का जिक्र मिलता है. इसमें बहादुर शाह काफिरों को मारने का विवरण दे रहा है. हुमायूं और बहादुर शाह के बीच काफिर कौन थे? कहीं यह काफिर मेवाड़ में महाराणा प्रताप का परिवार ही तो नहीं था- इतिहासकारों को इस तथ्य पर और शोध करना चाहिए.

हुमायूं की योजना राजनीतिक और इतिहास में उसकी वजहें मिलती हैं

इतिहास की एक और किताब "द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया फॉर चिल्ड्रेन (वोल्यूम 2 ): फ्रॉम द मुगल्स टू द प्रजेंट" में भी ऐसे तथ्य हैं जो हुमायूं की राखी एपिसोड वाली कहानी को तार-तार करने के लिए पर्याप्त हैं. इसमें साफ़ साफ़ लिखा गया है कि हुमायूं, बहादुर शाह के हाथों चित्तौड़ के बर्बाद होने का इंतज़ार कर रहा था. बहादुर शाह तो इतिहास में कहता पाया जाता है कि भला दिल्ली सल्तनत किसी काफिर की मदद को आगे क्यों ही आएगा? क्यों ना माना जाए कि उसे यह भरोसा तत्कालीन इस्लाम से हासिल हो रहा था.

उधर, दिल्ली सल्तनत विस्तार के लिए हुमायूं की मंशा थी कि वह एक ही युद्ध लड़कर एक ही साथ गुजरात और मेवाड़ के दो लक्ष्य हासिल कर ले. राणा संगा के निधन के बाद कोई भी बुद्धिमान बादशाह ऐसा ही करना चाहेगा. भला इससे चतुराई पूर्ण रणनीति और क्या हो सकती है. किताब का दावा है कि हुआ भी बिल्कुल ऐसा. जब बहादुर शाह ने चित्तौड़ को बर्बाद कर कब्जा कर लिया उसके कुछ महीनों बाद हुमायूं ने जोरदार तैयारी के साथ बहादुर शाह पर हमला किया. राणाओं का परिवार तो महाराणा प्रताप तक चित्तौड़ के लिए अकबर से संघर्ष ही करता दिखता है.

सबसे बड़ी बात यह कि हुमायूं या अकबर इतने ही सहृदय थे तो फिर उनके लालन-पालन का असर उनकी बाद की पीढ़ियों में क्यों नजर नहीं आता. मुगलिया या दिल्ली की इस्लामिक सत्ताओं के इतिहास में केवल एक दाराशिकोह दिखता है. उसे भी साजिश के तहत क़त्ल कर दिया गया. दाराशिकोह का पिता शाहजहां भी अपने दूसरे बेटे औरंगजेब से कहां कम था भला. शाहजहां कितना बड़ा आततायी था कि ओरछा के महाराजा की एक नाफ़रमानी भर से उसने ओरछा के मंदिर को ध्वस्त करने के आदेश दिए. कमान सबसे योग्य मुग़ल औरंगजेब ने ही संभाली थी.

क्या यह घोर आश्यर्य की बात नहीं कि हुमायूं और महान मुग़ल अकबर के मौजूद होने के बावजूद उनके घरों में पीढ़ी दर पीढ़ी औरंगजेब ही पैदा होते रहे. कोई औरंगजेब ना हो तो बताइए. हुमायूं का राखी वाला किस्सा बस मुगलों को दयालु शासक स्थापित करने की कोशिश है. भारत का इतिहास कभी अंधेरी सुरंग से बाहर निकल पाएगा. यह देश का बड़ा दुर्भाग्य है.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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