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Updated: 26 जनवरी, 2021 11:15 PM
सर्वेश त्रिपाठी
सर्वेश त्रिपाठी
  @advsarveshtripathi
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देश का संविधान आज बहत्तर वर्ष का हो गया. बचपन में जब स्कूल जाते थे तो झंडारोहण के बाद प्रभात फेरी निकलती थी. एक पैकेट बिस्किट और घर आते वक्त लिफाफे में मिलने वाले चार लड्डू से अपना गणतंत्र दिवस भी बहुत मधुर और शानदार बनता था. बहुत दिन तक गणतंत्र दिवस का दिन जनवरी ठंड की सुबह में टिपटॉप ड्रेस, तिरंगा और लड्डू के इर्द गिर्द ही नाचता और घूमता रहा. सच कहें तो स्कूल से हाथ में लड्डू लेकर लौटते वक्त बस यही ख़्याल होता था कि 26 जनवरी का बाकी दिन अब स्वतंत्रता दिवस की तरह मनेगा. यानि दिनभर खेलकूद और दोस्तों के साथ जी भर कर उधम मचाना है. जैसे अभी Delhi में उधम मचा है. हमारा गणतंत्र आज बहत्तर साल का बुज़ुर्ग बन गया है. सरकार बहादुर से पिछले कई दिन से सिंघु सीमा पर धरने पर बैठे किसान कई दौर की नाकाम बातचीत करने के बाद आज दिल्ली के भीतर ट्रैक्टर के साथ मार्च कर रहे हैं. पिछले कई दिन से पश्चिमी विक्षोभ के कारण वैसे ही उत्तर भारत का पारा गिरा हुआ है लेकिन दिल्ली में आज सरगर्मी बढ़ी हुई है. ऐसा लग रहा सरकार बहादुर भी बुजुर्ग गणतंत्र की तरह अभी किसानों के मन को टटोल ही रही है.

Republic Day, Delhi, Red Fort, Prime Minister, Farmer Protest, Demonstrationनए कृषि बिल के विरोध में लाल किले पर प्रदर्शन करते किसान

पता नहीं सरकार क्या टटोल रही है. वैसे भी कृषि कानूनों को लेकर सरकार अपना स्टैंड कई बार स्पष्ट कर चुकी है और अभी हाल में इन कानूनों को कुछ दिन के लिए ठंडे बस्ते में डालने की बात भी कर रही है. लेकिन अगर सरकार कृषि संगठनों को संतुष्ट नहीं कर पा रही है तो यह किसानों की नहीं बल्कि सरकार और उसके तंत्र की नाकामी है.हमारे लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रतिनिधि बनते है. कार्यपालिका से पूर्व वे विधायिका है.

जनता के प्रतिनिधि है. उनका प्राथमिक कर्तव्य है कि हर उस व्यक्ति की आवाज़ को तवज्जो दे जो असंतुष्ट और वंचित है. बाकी ईश्वर से प्रार्थना है किसान भाइयों का ट्रैक्टर मार्च शांति और सौहार्दपूर्ण तरीके से संपन्न हो जाए. वैसे भी चतुर राजनीति की छाया तो इस आंदोलन पर पड़ ही चुकी है. वाकई यह बहुत बुरा और दुखद है कि हमारे देश का मध्यवर्ग इस समय निमोना मटर खाकर सोया है.

लोकतंत्र को मजबूत करने वाले सड़क के संघर्ष अब वाट्सएप फेसबुक की गलबाजी में बदल चुके है. फ़िलहाल हम जय जवान जय किसान वाले देश है. औनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता के संघर्ष में हमनें अपने पारंपरिक मूल्यों और आदर्शों की जिस तरह हिफ़ाज़त की वह वाकई काबिले तारीफ़ है. आज भी दो तिहाई से ज्यादा जनता खेती किसानी से किसी न किसी रूप से तो जुड़ी ही है.

किसान से याद आया आज तो देश की राजधानी में किसान भाई लोग ट्रैक्टर परेड निकाल रहे. मैं कई दिन से इस बारे में सोच रहा था कि राजपथ पर अगर जय जवान के साथ देश भर से आए किसानों का ट्रैक्टर परेड हुआ तो वह दृश्य कैसा होगा. मेरे लिहाज से यह यही असली गणतंत्र है जब राजपथ लोकपथ में बदले. यह तो पहले ही होना था राजपथ पर डिज़ाइनर झाकियों की जगह नवीन कृषि संयत्रों के साथ देश भर से आए किसान अपने मस्त अंदाज में परेड करते.

शहरों में बैठी देश की जनता के भी भीतर यह अहसास बढ़ता कि जय किसान भी कोई चीज़ है. तब शायद आज यह नौबत ही न आती कि अपने किसान भाई आंसू गैस और लाठियों के बीच अपना ट्रैक्टर मार्च करते. दुर्भाग्य ही है, जिन ताकतों को आज राजपथ पर एक जुट होना था वे इस भीषण ठंड में अपनी मांगों के साथ सरकार बहादुर से मुक़ाबिल है.

मुझे नहीं लगता यह स्थिति किसी को भी अच्छी लग रही होगी. देश अपना ,सरकार अपनी, किसान अपने सब कुछ तो हमारा ही है. गणतंत्र दिवस का सबसे बड़ा संदेश ही यही है कि सभी तंत्र(system) से पहले गण यानि लोक यानि जनता यानि हम है. फिर भी न जाने क्यों राजपथ और लोकपथ में यह भेद इंडिया और भारत की तरह बना हुआ है.

ख़ैर ठंड ज्यादा है और घरैतिन भी नहीं है तो अभी हमें भी अपनी रोटी का जुगाड़ खुद ही करना है. अपना क्या है साहेब अभी फेसबुक पर एक बढ़िया सी फोटो चेप कर गणतंत्र दिवस मना लेंगे और बाकी बची छुट्टी का आनंद रजाई में घुसकर उठा लेंगे. हम कौन से जवान या किसान है.

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लेखक

सर्वेश त्रिपाठी सर्वेश त्रिपाठी @advsarveshtripathi

लेखक वकील हैं जिन्हें सामाजिक/ राजनीतिक मुद्दों पर लिखना पसंद है.

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