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Updated: 20 अक्टूबर, 2020 08:08 PM
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
  @siddhartarora2812
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असलम (काल्पनिक नाम) की उम्र मात्र 18 साल की थी. वो मोस्को (Moscow) में पैदा हुआ था और पेरिस (Paris) में आ बसा था. उसको पुलिस ने गोलियों से छलनी कर दिया और उसे इस्लामिक आतंकी (Islamic Terrorist) टैग नेम दे दिया गया. क्यों? समुअल पेटी (Samuel Paty) नामक एक 47 साल के शिक्षक ने अपने 12-14 साल के छात्रों को सिविल एजुकेशन देते वक्त चार्ली हेब्दो नामक अख़बार का कार्टून दिखाया. उस कार्टून में इलामिक पैगम्बर मुहम्मद (Prophet Mohammad) थे. चार्ली हेब्दो (Charlie Hebdo) के ऑफिस के बाहर पिछले महीने दो जर्नलिस्ट को चाकू मार दिया गया था. अब इन जनाब समुअल पेटी का भी विरोध हो रहा था. विरोध के चलते फ़्रांस में ही रहने वाले असलम ने राह चलते समुअल का सिर रसोई के लम्बे मीट वाले चाकू से उड़ा दिया. काटने से पहले असलम चिल्लाया 'अल्लाह-हु-अकबर.' फ्रीडम ऑफ स्पीच (Freedom Of Speech) की बहुत भारी कीमत समुअल को चुकानी पड़ी. न समुअल ने वो कार्टून बनाया, न चार्ली हेब्दो उसके रिश्तेदार का अख़बार था मगर फिर भी उसको कुर्बानी देनी पड़ी. असलम ने गर्दन उड़ाने के बाद उसकी वीडियो सोशल मिडिया पर भी डाली. पुलिस जब उसे पकड़ने गयी तब जाने कौन सी गाड़ी पलटी कि उसे गोली मारनी पड़ी. शायद दस गोलियां मारी हैं.

France, Murder, Muslim, Prophet Mohammad, Cartoon, Teachersफ्रांस में टीचर की हत्या के बाद कुछ ऐसा नजारा है

अब ज़ाहिर है ये काम उसने अपनी मर्ज़ी से नहीं किया होगा. उसको ऊपर बाप लोगों की तरफ से ऑर्डर मिला होगा कि जन्नत पहुंचने की तैयारी करो, उसने की. उसके धर्म का मज़ाक उड़ाने वाले को साफ़ कर दिया. ख़ुद ‘शहीद’ कहलाया और शहीद के घरवालों को अच्छा मोटा मुआवज़ा भी मिलेगा. फ़िलहाल फ़्रांसीसी पुलिस घर के हर शख्स से गहन पूछताछ में उलझी है. इस घटना को तीन चार दिन हो चुके हैं. तीन दिन से मैं बैठा देख रहा था कि कितने भले लोग इसके ख़िलाफ़ बोलते हैं.

झक मार के एक स्वरा भास्कर ने ट्वीट किया कि ये ग़लत हुआ, इस तरह टेरर नहीं फैलाना चाहिए. वाकई कड़ी निंदा थी. इसके इतर छुटपुट विरोध में देखने को मिलता है कि जैसे भारत में एक ad से लोग आहत हो जाते हैं वैसे ही एक कार्टून से वो आहात हो गए. Shame on us.

क्या वाकई?

सबसे पहले तो फ्रीडम ऑफ स्पीच के दायरे को समझने की ज़रुरत है. इसका मतलब है कि डेमोक्रेसी मुझे ये हक़ देती है कि मैं भी कहना चाहूं, जो भी अपनी कला के द्वारा एक्सप्रेस करना चाहूं तो कर सकता हूं मुझे ये अधिकार है, बाशर्ते मेरी नियत किसी व्यक्ति या समुदाय को मानसिक या शारीरिक कष्ट पहुंचाने की न हो. अब पहली लाइन तो सबको प्लेकार्ड बनाते वक़्त याद रहती है मगर दूसरी लाइन तुरंत भूल जाते हैं.

मैं किसी भी तरह की हिंसा के पक्ष में नहीं, पर साथ ही मुझे ये भी नागवार गुज़रता है कि 2015 में चार्ली हेब्दो के ऑफिस के बाहर हुए बम ब्लास्ट के बावजूद चार्ली हेब्दो एक के बाद एक मुस्लिम पैगम्बरों के आपत्तिजनक कार्टून बना रही है. एक कार्टून है कि जिसमें मुस्लिम आदमी और औरत सी-बीच पर दौड़ते ख़ुश होते जा रहे हैं और दोनों पूर्णतया नंगे हैं. औरत हिजाब ओढ़े है पर मुंह के सिवा शरीर पर कोई कपड़ा नहीं है. ये कैसी फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन है?

कम्युनिस्टों की आदत रही है हमेशा एक्शन की बजाए रिएक्शन पर शोर मचाने की. वो आपको कारसेवकों की बोगी जला दी गयी ये नहीं बताते, गुजरात दंगे का हल्ला सुनाते हैं. यही यहां भी हो रहा है. निसंदेह जो हत्या हुई वो निंदनीय है, उसका तात्कालिक परिणाम भी निकल आया, जिसने किया वो बिना अदालत पहुंचे जहन्नुम पहुंच गया पर उसने ऐसा किया क्यों?

'एम-एफ हुसैन जैसे महान पेंटर को हिन्दू लोग गालियां देते हैं, हुंह ब्लडी बैकवर्ड लोग' ऐसा अक्सर कई क्रांतिकारी कलाकारों के मुंह से मैंने सुना है, पर वो नई पीढ़ी को ये नहीं बताते कि हुसैन ने दुर्गा माता की एक पेंटिंग बनाई थी जिसमें कपड़े बनाना उसे याद नहीं रहा था. क्यों न भड़के हिन्दू? आप टारगेट करके भड़काएंगे तो आपको निराश क्यों किया जायेगा?

मुस्लिम समुदाय इस मामले में ज़्यादा उग्र और ज़्यादा संगठित है. यहां आप एक ad और एक कार्टून की तुलना करते हैं पर फ़र्क देखिए कि एक ad बुरा लगने पर उस प्रोडक्ट का बॉयकाट होता है लेकिन एक कार्टून बुरा लगने पर सिर उसका उड़ाया जाता है जिसका इन सबसे कोई लेना देना नहीं था. ad बुरा लगने पर बॉयकाट कोई फतवे के चलते नहीं होता, आम जनता को बुरा लगता है, आम भावनाएं आहत होती हैं लेकिन कार्टून बुरा लगने पर ठेकेदार अपनी लेबर को हुक्म सुनाते हैं, लेबर मुस्तैदी से काम निपटाकर ‘जन्नत(?)’ की टिकेट गिफ्ट वाउचर में पा लेती है.

अब पेरिस में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहा है. नारे लग रहे हैं. क्या होगा उससे बताइए? क्या इस सिर कटने से चार्ली हेब्दो मुहम्मद के कार्टून्स बनाना बंद करेगा? क्या इस विरोध के बाद इस्लामिक आका फतवे जारी करना बंद कर देंगे? जवाब दोनों का एक ही है, नहीं!

फिर ये सब क्यों हुआ?

एक की जान जाने से किसी के अख़बार की फ्री-पब्लिसिटी हो गयी और किसी के मजहब की दहशत का एक और नमूना विश्व ने देख लिया. एक अब ज़्यादा पैसा बनायेंगे, दूसरे अब और बढ़िया विक्टिम कार्ड खेलेंगे कि ‘किसी एक’ की गलती पर पूरे धर्म को बदनाम किया जाता है और अपने संगठन में नए आत्मघाती लड़के जोड़ेंगे. आख़िर में बचे कट्टर हिन्दू शेर, वो अगली किसी फिल्म के बॉयकाट किए जाने का इंतज़ार करेंगे और फिर बेवकूफ साबित होंगे. फिर भी मुझे ख़ुशी होगी कि आतंकी साबित होने से कहीं बेहतर बेवकूफ साबित होना होगा.

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लेखक

सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' @siddhartarora2812

लेखक पुस्तकों और फिल्मों की समीक्षा करते हैं और इन्हें समसामयिक विषयों पर लिखना भी पसंद है.

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