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सियासत

 |  3-मिनट में पढ़ें  |   12-03-2018
अरविंद मिश्रा
अरविंद मिश्रा
  @arvind.mishra.505523
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उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख एवं बहुचर्चित लोकसभा सीटों पर उप-चुनाव में 2014 के चुनावों के मुकाबले काफी कम मतदान हुआ. गोरखपुर से यहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के और फूलपुर से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफा देकर विधान परिषद के लिए चुने जाने के कारण इन दोनों सीटों पर चुनाव हुए थे. लोकसभा उप चुनाव बहुचर्चित इस लिए क्योंकि गोरखपुर से प्रदेश के मुख्यमंत्री चुनाव जीतते थे और फूलपुर से वहां के उप मुख्यमंत्री चुनाव जीते थे. इस बार गोरखपुर उप चुनाव में मात्र 47.45 प्रतिशत मतदान हुआ जहां 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान 54.67 प्रतिशत मतदान हुआ था. यानि इस बार करीब 7 प्रतिशत कम. वहीं फूलपुर में 37.40 प्रतिशत मतदान हुआ जहां 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान 50.20 प्रतिशत मतदान हुआ था. यानि इस बार करीब 13 प्रतिशत कम.

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तो अहम सवाल ये कि आखिर इस उप चुनावों में इतना कम मतदान क्यों हुआ? जबकि ये दोनों सीटें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या द्वारा जीती गई थीं. आखिर समाजवादी पार्टी को मायावती ने भी समर्थन दिया था. आखिर ऐसा क्या हुआ जिससे पिछले चुनाव के मुकाबले 12 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज हुई हो गई. ऐसे में भी कम मतदान होना क्या संकेत देता है? आखिर जनता का रुझान किस की तरफ है? सपा और बसपा के एक साथ आने से भाजपा को मुश्किल तो नहीं होगी? या फिर भाजपा को सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ सकता है?

भाजपा को शहरी क्षेत्रों में कम वोट मिलना इसके लिए खतरे की घंटी हो सकती है क्योंकि शहरी मतदाताओं में ही भाजपा की पकड़ मज़बूत मानी जाती है. अगर हम फूलपुर लोकसभा की बात करें तो यहां के दो शहरी विधानसभा क्षेत्रों में सबसे कम मतदान हुआ. मसलन इलाहाबाद पश्चिमी में 31 प्रतिशत और इलाहाबाद उत्तर में 21.65 प्रतिशत ही मतदान हो पाया. इलाहाबाद उत्तर विधानसभा में ही इलाहाबाद यूनिवर्सिटी भी स्थित है जिसके युवा मतदाता 2014 में बढ़-चढ़कर भाजपा के लिए मतदान किया था. वैसे भी 2014 के लोकसभा को छोड़कर यहां समाजवादी पार्टी और बसपा का ही बर्चस्व रहा है. इसलिए यहां भाजपा को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है और इसका सीधा लाभ समाजवादी पार्टी को मिल सकता है.

अगर बात गोरखपुर की करें तो यहां भी भाजपा के लिए शहरी इलाकों के मतदाताओं में उत्साह कम रहा यानि गोरखपुर शहर में मात्र 37.76 प्रतिशत मतदान ही हो पाया. कहीं ऐसा तो नहीं कि गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के उम्मीदवार न होने के कारण से यहां के मतदाताओं में उत्साह नहीं रहा? अगर ऐसा होता है तो 29 साल बाद इस गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की कमान गोरक्ष पीठ से बाहर की हो जायेगी.

वैसे तो भारतीय चुनावों में मतदाताओं का मूड जानना थोड़ा कठिन है इसलिए ये भविष्यवाणी करना भी उतना ही कठिन है कि इन दोनों सीटों के उप- चुनाव में कौन जीतेगा. और इसकी सटीक जानकारी 14 मार्च को ही मिल पायेगी, जब इनके नतीजों का ऐलान होगा.

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अरविंद मिश्रा अरविंद मिश्रा @arvind.mishra.505523

लेखक आज तक में सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

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