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Updated: 25 जून, 2019 05:00 PM
आशीष वशिष्ठ
आशीष वशिष्ठ
  @drashishv
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बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपने छोटे भाई आंनद को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं भतीजे आकाश को नेशनल कार्डिनेटर बनाकर कटोरी का घी थाली में गिराने का काम किया है. बीएसपी संगठन में बदलाव से ज्यादा चर्चा मायावती के भतीजे आकाश को लेकर हो रही हैं. युवा आकाश को मायावती का उत्तराधिकारी माना जा रहा है. आकाश के सक्रिय राजनीति में उतरने से यूपी की राजनीति में एक और युवा चेहरे की आधिकारिक एंट्री हो गई है. आकाश मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार के पुत्र हैं.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ प्लाईमाउथ से एमबीए डिग्री धारी 24 साल के आकाश शायद यूपी में सबसे कम उम्र के नेता हैं. 2015 में पढ़ाई खत्म कर देश लौटे आकाश पहली बार अपनी बुआ मायावती के साथ वर्ष 2016 में विधानसभा चुनाव से पूर्व सहारनपुर में एक रैली में दिखे थे. इसके बाद 2017 में मेरठ में एक चुनावी सभा में उन्होंने बुआ के साथ मंच साझा किया था. इस बीच आकाश की सक्रिय राजनीति में एंट्री से लेकर मायावती के उत्तराधिकारी के तौर पर कई कयास राजनीतिक गलियारों में लगते रहे. लेकिन कोई ठोस बात सामने नहीं आई.

14 अप्रैल, 2017 को अंबेडकर जयंती पर मायावती ने अपने छोटे भाई आनंद कुमार को यह कहते हुए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था कि वह पार्टी में निस्वार्थ भावना से ही कार्य करते रहेंगे और कभी सांसद, विधायक, मंत्री व मुख्यमंत्री आदि नहीं बनेंगे. इसी शर्त पर मायावती ने आनंद को उपाध्यक्ष नामित किया था. आनंद करीब एक वर्ष ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर बने रहे कि सबको चैंकाते हुए कर्नाटक चुनाव के बाद मायावती ने 27 मई, 2018 को आनंद को उपाध्यक्ष पद से हटा दिया था. इसकी वजह बीएसपी के अंदर कांग्रेस की तरह परिवारवाद की चर्चा शुरू होना बताया गया था. उस दौरान मायावती ने यह भी ऐलान किया था कि कोई उनके उत्तराधिकारी बनने का सपना न देखे. उन्होंने कहा था कि भविष्य में उनके परिवार का कोई भी सदस्य पार्टी संगठन के वरिष्ठ पद पर नहीं रहेगा, ना ही उसे चुनाव लड़ाकर सांसद, एमएलसी या मंत्री आदि बनाया जाएगा. इसके लिए उन्होंने बाकायदा पार्टी संविधान में कुछ संशोधन भी किए थे.

मायावती, आकाश कुमार, सपा, बसपामायावती के बाद अब आकाश धीरे-धीरे बसपा कार्यकर्ताओं के सामने चर्चा में आ रहे हैं.

लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद मायावती को उम्मीद थी कि केंद्र की सरकार उनके बिना नहीं बनेगी. अगर जनादेश साफ नहीं आया तो उनके हाथ प्रधानमंत्री की कुर्सी भी लग सकती है. लेकिन चुनाव नतीजों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेरने का काम किया. भाजपा पहले से ज्यादा मजबूत होकर सामने आयी. हां, वो अलग बात है कि सपा के साथ से बसपा शून्य से दस सीटों पर पहुंच गयी.

मायावती के पास केंद्र में कोई खास काम अगले पांच साल तक नहीं है. ऐसे में मायावती ने यूपी पर अपना फोकस कर दिया है. इसलिए उन्होंने चुनावी भतीजे अखिलेश को नसीहत देते हुए अलग चलने का फैसला सुनाने में कोई देरी नहीं की. कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने, अपने वोट बैंक की मजबूती परखने की मंशा से बसपा ने पहली बार उपचुनाव में उतरने का ऐलान भी किया है. वहीं वो यह भी दिखाना चाहती है कि यूपी की राजनीति में बीजेपी से केवल वो ही टक्कर लेने की हैसियत में हैं.

पिछले काफी समय में ऐसे कई मौके आए हैं, जब आकाश मीडिया के सामने आए हैं. बीती जनवरी में जब मायावती के जन्मदिन का कार्यक्रम हुआ तब भी आकाश ही छाए रहे थे, यही कारण रहा कि आकाश को मायावती के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाने लगा था.

लोकसभा चुनाव में मायावती ने आकाश को बसपा का स्टार प्रचारक बना कर अपने साथ रखा. मायावती के जन्मदिन पर, सपा से गठबंधन वाले दिन, राजद नेता तेजस्वी यादव से मुलाकात के समय और अखिलेश व मायावती के बीच गठबंधन की वार्ताओं के दौरान आकाश पूरी तरह सक्रिय रहे. लोकसभा चुनाव में आकाश बुआ मायावती की छाया बनकर रहे थे. पार्टी सूत्रों की माने तो मायावती भतीजे आकाश पर काफी भरोसा करती हैं. उसकी वजह यह है कि आकाश ने लोकसभा चुनाव में महत्वपूर्ण रोल अदा किया था. टिकटों के बंटवारे से लेकर चुनाव प्रबंधन की कमान तक उनके पास थी. बीती 6 फरवरी को जब मायावती ने सोशल मीडिया साइट ट्विटर पर एंट्री की, तब भी यही बात सामने आई थी कि ये आकाश के कहने पर ही हुआ है. इससे पहले मायावती हमेशा मीडिया से दूर ही रहती थीं, लेकिन अब लगातार वह हर मुद्दे पर ट्वीट करती हैं और बयान जारी करती हैं. मायावती ने चुनाव के दौरान ही आकाश को पार्टी में कोई अहम जिम्मेदारी देने की घोषणा भी की थी.

लोकसभा चुनाव की महागठबंधन व बसपा की रैलियों में आकाश बुआ मायावती के साथ नजर आये. बीती 16 अप्रैल को मायावती की गैरमौजूदगी में आकाश ने आगरा के कोठी मीना बाजार ग्राउंड में महागठबंधन की रैली को संबोधित भी किया था. असल में मायावती पर चुनाव आयोग ने 48 घंटे तक प्रचार करने पर रोक लगाई थी, जिसकी वजह से वह रैली को संबोधित नहीं कर सकती थीं. महागठबंधन की इस जनसभा में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी शामिल हुए, लेकिन हर किसी की नजरें आकाश पर थीं. आगरा में अपने पहले राजनीतिक भाषण में आकाश ने अपनी बुआ के स्टाइल में लोगों से कहा कि ‘उनकी बुआ आज नहीं आ सकी हैं, इसलिए वह उनका संदेश लेकर सामने आए हैं. बुआ का संदेश है कि आप उनके उम्मीदवारों को बड़े अंतर से जिताएं और विरोधियों की जमानत जब्त करवाएं.’

राजनीतिक विशलेषकों के अनुसार लगातार पार्टी के गिरते ग्राफ, बेस वोट बैंक में विपक्षी दलों की सेंधमारी, चुनावी हार, और भरोसेमंद सिपहसालारों की बगावत के बाद मायावती छांछ भी फूंक—फूंककर पी रही हैं. 63 साल की हो चुकी मायावती के लिए संगठन संभालना भी मुश्किल होता जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि शायद ऐसे में मायावती ने अपनों पर ही भरोसा जताते हुए उनको पार्टी में बढ़ाने का काम शुरू किया है.

वहीं मायवाती का इस बात का बखूबी इल्म है कि यूपी की राजनीति में उनका मुकाबला 47 साल के योगी आदित्यनाथ, 46 साल के अखिलेश, 40 साल के जयंत चैधरी, 47 साल की प्रियंका गांधी, 38 साल की अनुप्रिया पटेल, 39 साल के वरूण गांधी, 41 साल की डिम्पल यादव, 49 साल के राहुल गांधी और 43 साल की स्मृति ईरानी जैसे काफी कम उम्र के नेताओं से होगा. ऐसे में आकाश पार्टी का युवा और भविष्य का चेहरा बनकर पार्टी का मजबूती तो देगा ही. वहीं दलित समाज के युवा वोटरों को पाले में रखने में मददगार भी साबित होगा.

मायावती ने राजनीति के अखाड़े में अपने असली भतीजे को राजनीतिक घुट्टी पिलाकर उतार दिया है. जो उनकी छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखने को तैयार दिखाई दे रहा है. अब यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में आकाश अपने राजनीतिक विरोधियों की जमानत जब्त करवा पाते हैं या नहीं.

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आशीष वशिष्ठ आशीष वशिष्ठ @drashishv

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

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