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Updated: 23 जून, 2019 04:12 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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ममता बनर्जी और राहुल गांधी के सलाहकारों की पीड़ा इन दिनों एक जैसी लगती है. एक जैसी क्या, करीब करीब एक ही लगती है. सलाहकारों की दोनों ही टीमें अपने नेता के तात्कालिक फैसलों से परेशान होंगी, समझा जा सकता है. फर्क सिर्फ यही है कि एक टीम कोलकाता में है और एक दिल्ली में - बाकी सब समान भाव से ही चलायमान है.

ममता बनर्जी के सलाहकार तो ऑफ द रिकॉर्ड भी बात नहीं कर पाते, राहुल गांधी वाले थोड़े हिम्मत जरूर जुटा लेते हैं. शायद इसलिए भी कि राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया है और अब तो गांधी परिवार से अलग किसी और को कमान देने की कवायद भी काफी आगे बढ़ चुकी होगी. राहुल गांधी ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर 'न्यू इंडिया' वाला ट्वीट क्यों किया, ज्यादातर लोगों की समझ से परे है. मगर कोई बोले भी तो क्या बोले? यही वजह है कि सभी ने खामोशी अख्तियार कर ली है, ताकि आबरू बची रहे.

ममता बनर्जी और राहुल गांधी में आपसी मतभेद चाहे जितने भी हों, विरोधी पक्ष से मुकाबले का दोनों का तरीका मिलता जुलता है. दोनों ही नेताओं की जंग में सियासी दुश्मन एक ही है - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. ममता बनर्जी भी बीजेपी के खिलाफ जंग में राहुल गांधी जैसा ही रास्ता अख्तियार कर रही हैं.

उधार के सिंदूर से सुहागन नहीं बनते, मगर बताये कौन!

ममता बनर्जी सरकार भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हुए खुद को पेश करने की पूरी कोशिश कर रही है. पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम लेकर उस बंगाली समुदाय को अपने में मिलाना चाहती है जिनके वोट उसके हाथ से काफी मात्रा में फिसल चुके हैं.

जैसे ममता बनर्जी जय श्रीराम पर रिएक्ट कर घिर गयी थीं, योग दिवस पर राहुल गांधी का भी ट्वीट के बाद वही हाल हुआ है. ऐसा लगता है जो चिढ़ ममता बनर्जी को जय श्रीराम के स्लोगन से है वही भावना राहुल गांधी के मन में राष्ट्रवाद को लेकर है, जिसके दम पर बीजेपी दोबारा केंद्र की सत्ता में लौट भी चुकी है. कांग्रेस नेताओं को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर राहुल गांधी योग दिवस पर 'न्यू इंडिया' वाले ट्वीट से क्या संदेश देना चाहते थे? कुछ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस के ज्यादातर नेता मान रहे हैं कि वो ट्वीट कोई छोटी मोटी गलती नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर भयंकर भूल है जिसकी भरपाई तत्काल काफी मुश्किल है. वो भी तब जबकि कांग्रेस हार से उबरने की ओर बढ़ रही है. तो क्या यही वजह रही कि कांग्रेस का कोई भी नेता या प्रवक्ता राहुल गांधी के बचाव में सामने नहीं आया है? वैसे भी राहुल गांधी तो जता ही चुके हैं कि जो कमिटमेंट वे कर चुके हैं उनके बारे में वो खुद की भी नहीं सुनने वाले - चाहे वो कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की बात हो या फिर राफेल डील पर उनके नजरिये की. राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद राहुल गांधी ने कहा भी कि राफेल पर उनके स्टैंड में कोई बदलाव नहीं आया है. मतलब, लोगों ने मान लिया 'मैं भी चौकीदार हूं', प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित तमाम बीजेपी नेताओं ने ट्विटर पर अपने नाम से पहले लगाया हुआ 'चौकीदार' भी हटा लिया, लेकिन राहुल गांधी का नारा नहीं बदला है - 'चौकीदार चोर है'. जैसे राहुल गांधी की कांग्रेस रवैया बदलने को तैयार नहीं है, बिलकुल वही हाल तृणमूल कांग्रेस का भी है. टीएमसी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर बीजेपी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है. एक टीएमसी नेता ने कहा कि अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिंदा होते तो बीजेपी को देखकर शर्मिंदा हो रहे होते.

टीएमसी और कांग्रेस दोनों ही चुनाव हारने के बाद भी रवैया बदलने के लिए तैयार नहीं लगते. ममता बनर्जी की सरकार ने पहली बार 2018 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जरिये बंगाली भद्रलोक के मोहभंग को काटने की कोशिश की थी. 2018 में भी टीएमसी नेताओं ने सरकारी स्तर पर कार्यक्रम कर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद किया और उन्हें महान दूरदर्शी और देशभक्त बताया.

mamata and rahul on same path against modiजिस रास्ते चल कर राहुल गांधी फेल हो गये, ममता बनर्जी को वही पसंद क्यों है?

त्रिपुरा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद जब लेनिन की दो मूर्तियां क्षतिग्रस्त कर दी गयीं तो कोलकाता में उसके रिएक्शन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति के साथ तोड़फोड़ और कालिख पोतने की घटना हुई. करीब तीन महीने के भीतर ही सरकारी स्तर पर मुखर्जी की मूर्ति फिर से बनवा दी गयी. मूर्तियों को लेकर राजनीति इस साल भी देखी गयी जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गयी. बीजेपी नेतृत्व ने चुनाव बाद नयी मूर्ति का वादा किया था, उससे पहले ही ममता बनर्जी ने नयी मूर्ति लगाकर अनावरण भी कर दिया - और मौके पर खूब अपने मन की बात की.

आखिर लोग कैसे हजम करें कि जो ममता बनर्जी 'जय श्रीराम' सुनते ही चिढ़ जाती हैं, वो श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्मदिन मना कर कोई मैसेज भी दे सकती हैं. पश्चिम बंगाल में खुद 34 से 22 सीटों पर पहुंच जाने और बीजेपी को 2 से 18 पर पहुंचा देने के बाद भी ममता बनर्जी को क्या ये बातें नहीं समझ में आ रही हैं? अगर समझ में नहीं आ रही हैं तो कोई समझा भी नहीं सकता. ममता बनर्जी के सलाहकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही होगी, बस मन मसोस कर रह जाते होंगे.

खुद ही क्यों नहीं करते बुलंद इतना कि...

मुस्लिम तुष्टिकरण के मामले में बीजेपी ममता बनर्जी और कांग्रेस दोनों को ही एक ही टारगेट प्वाइंट पर रखती है. अरसे से कांग्रेस इस बात से जूझ रही है कि बीजेपी ने उसे मुस्लिम पार्टी के तौर पर स्थापित कर दिया है - ममता बनर्जी को लेकर भी बीजेपी यही प्रचारित करती है - और दोनों ही इससे उबरने के रास्ते की तलाश में तरह तरह के ऊल जूलून तरीके आजमाते रहते हैं.

ममता के सामने दोहरी मुश्किल खड़ी हो गयी है. अब तो मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने साफ साफ कह दिया है कि वो समुदाय के लोगों को बचाने की जगह पूरी सख्ती से अपराध में शामिल मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ एक्शन लें. मुस्लिम समुदाय की ओर से ही ऐसा बयान आना ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला ही है. यानी जो इल्जाम बीजेपी नेता ममता बनर्जी पर लगाते रहे हैं वो सही साबित हो रहा है.

1. मुस्लिम तुष्टीकरण : ममता बनर्जी करीब डेढ़ साल पहले गंगासागर गयी थीं. ममता बनर्जी ने कपिल मुनि के आश्रम में मुख्य पुजारी ज्ञानदास महाराज के साथ करीब घंटा भर बिताया. बाद में ममता ने मुलाकात को लेकर खुशी जताते हुए दोबारा आने का वादा भी किया.

2. सॉफ्ट हिंदुत्व : राहुल गांधी के सॉफ्ट हिंदुत्व की तरह टीएमसी नेताओं ने बीरभूम में ब्राह्मण सम्मेलन भी कराया था. तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के करीबी बताये जाने वाले अनुब्रत मंडल ने एक ब्राह्मण सम्मेलन में आठ हजार पुरोहितों को गीता और उपहार भेंट कर सम्मानित किया था.

3. दीवार से सिर टकराना : ममता बनर्जी के श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर बीजेपी नेतृत्व सवालिया निशान लगाने की कोशिश वैसी ही लगती है जैसे खुद को कट्टर हिंदू साबित करने के चक्कर में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही हिंदुत्व ज्ञान पर सवाल खड़ा कर दिया था. राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने गीता का हवाला देते हुए कहा कि हर प्राणी ज्ञानवान है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदुत्व की इस नींव को नहीं समझते. तब राहुल गांधी को जवाब देने के लिए सुषमा स्वराज ने मोर्चा संभाला और सवाल किया - क्या हिंदुत्व के बारे में अब राहुल गांधी से सीखना होगा?

ममता बनर्जी और राहुल गांधी दोनों ही उस बात को भूल जा रहे हैं कि जो उनकी अपनी खासियत है वही किसी के उनसे जुड़ने का आधार हो सकता है. दूसरे की कॉपी करने से कुछ भी फायदा नहीं होने वाला. जिस बात के लिए ममता बनर्जी ने बंगाल में परिवर्तन का नारा दिया उसके बारे में ममता क्यों नहीं सोचतीं. ऐसा क्यों है कि लोग मानने लगे हैं कि परिवर्तन के नाम पर सिर्फ सत्ताधारी पार्टी का नाम बदल गया और कुछ भी नहीं. या बदलाव कुछ दिन दिखा फिर सब कुछ उसी पुराने ढर्रे पर चलने लगा. राहुल गांधी ने भी ऐसा ही किया है. हर बार किराये के दूसरे नुस्खे आजमाते रहे हैं - और वे बातें पीछे छोड़ दी हैं जिनके लिए कांग्रेस जानी जाती रही है.

बात तो यही हुई कि कांग्रेस तब तक देश में सत्ता पर कब्जा बनाये रखी जब तक उसे कोई ठोस चुनौती नहीं मिली - और जब चुनौती मिली तब वो ढेर हो गयी. ममता बनर्जी भी तो कांग्रेस की ही उपज हैं - तेवर थोड़े अलग जरूर हैं. तृणमूल कांग्रेस के लोगो कांग्रेस हटा देने से थोड़े ही कुछ बदल जाता है!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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