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Updated: 21 फरवरी, 2021 10:00 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) से भले ही बीजेपी परिवर्तन का नारा छीनने की कोशिश कर रही हो और 'सोनार बांग्ला' बनाने से लेकर 'आसोल पोरिबोर्तन' का दावा कर रही हो - लेकिन मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा न होना बीजेपी पर भारी पड़ रहा है.

बेशक अमित शाह ने पश्चिम बंगाल (West Bengal Election 2021) के लोगों से वादा किया है कि बीजेपी के सत्ता में आने पर जो भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा वो उसी मिट्टी का लाल होगा, लेकिन तृणमूल कांग्रेस को वो ये कहने से नहीं रोक पा रही है कि बीजेपी पश्चिम बंगाल में बाहर से आकर घुसपैठ की कोशिश कर रही है.

तृणमूल कांग्रेस का आधिकारिक चुनावी स्लोगन (TMC Slogan) आ जाने के बाद तो ये साफ हो गया है कि ममता बनर्जी चुनावी जंग में बंगाली कार्ड खेलने की तैयारी पूरी कर चुकी हैं. बीजपी नेता अमित शाह के निशाने पर आये ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी घूम घूम कर चुनावी रैलियों में कह रहे हैं कि चुनाव खत्म होते ही बाहरी लोग वापस चले जाएंगे.

अक्सर ये समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि जो बीजेपी राजनीतिक विरोधियों को देशभक्ति के नाम पर हरदम ही कठघरे में खड़ा किये रहती है, कैसे उसे कई राज्यों में बाहरी साबित करने की कोशिश शुरू हो जाती है. बिहार में तो 2015 में ये देखने को मिला ही था, यूपी में अखिलेश यादव अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बाहरी बताने लगे हैं. असल में अखिलेश यादव, योगी आदित्यनाथ के डीएनए वाले कमेंट से चिढ़े हुए हैं और लोगों को ये समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वो तो उत्तराखंड के रहने वाले हैं. वो भी तब जबकि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने से पहले गोरखपुर से पांच बार सांसद रह चुके हैं.

तृणमूल कांग्रेस ने जो चुनावी नारा दिया है उसमें ममता बनर्जी को बंगाल की बेटी के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है - और बंगाल के लोगों से बेटी के सपोर्ट में बाहरियों के खिलाफ खड़े होने की अपील की जा रही है.

दीदी ना, बेटी बोलो!

राजनीति में भी संबोधन के अलग अलग शब्द होते हैं. बीजेपी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को लोग महाराज कह कर बुलाते हैं तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ को महाराज जी. सिंधिया को लोग ग्वालियर घराने के वारिस होने के नाते महाराज बुलाते हैं जबकि योगी गोरक्षपीठ का महंत होने के नाते महाराज जी बुलाते हैं. कई जगह तो सम्मान देने के लिए नाम में सिर्फ जी लगा लेते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में दादा, पंजाब में पाजी, गुजरात में भाई और दक्षिण में अन्ना शब्द का इस्तेमाल वैसे ही होता है.

मायावती को जैसे लोग बहन जी कह कर बुलाते हैं वैसे ही ममता बनर्जी को दीदी बुलाया जाता है - और चुनावों में भी, यहां तक कि कटाक्ष के लिए भी संबोधन नहीं बदलता. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को टारगेट करते वक्त भी सारे विरोधी नेता दीदी कह कर ही संबोधित करते हैं.

abhishek banerjee, amit shah'सोनार बांग्ला' के खिलाफ बेटी बचाओ जैसा है तृणमूल कांग्रेस स्लोगन

हाल फिलहाल बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने ममता बनर्जी को पीशी कह कर बुलाना शुरू किया है. नड्डा कहते हैं पीशी और भाइपो की सरकार जाने वाले ही. पीशी का मतलब आंटी होता है और इस तरह बीजेपी बुआ-भतीजे की सरकार के तौर पर पेश करती है. ममता बनर्जी को फेमिली पॉलिटिक्स के नाम पर कठघरे में खड़ा करने के लिए बीजेपी नेता दीदी की जगह जब तब प्रसंग आने पर पीशी बुलाने लगे हैं.

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भी बहन जी ही कहलाना पसंद करती हैं - यहां तक कि जब मायावती का ट्विटर अकाउंट भी बना तो नाम के पहले सुश्री जोड़ा गया लेकिन फिर कुछ ही देर बाद सुश्री हटाकर सिर्फ मायावती कर दिया गया.

पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का स्लोगन तो यही मैसेज दे रहा है - 'बांग्ला निजेर मेये के ई चाए.'

स्लोगन का मतलब ये है कि 'बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है' - और ये भी मतलब समझाने की कोशिश है कि बीजेपी बाहरी है और बंगाल की बेटी को बाहरी आक्रमण से बचाने की जिम्मेदारी अब बंगाल के लोगों पर आ गयी है. टीएमसी मुख्यालय तृणमूल भवन में डेरेक ओ ब्रायन, सुब्रत बक्सी, पार्थ चटर्जी और काकुली घोष दस्तीदार जैसे सीनियर नेताओं की मौजूदगी में ये स्लोगन लॉन्च किया गया.

वैसे भी ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी तकरीबन सभी चुनावी सभाओं में लोगों को यही समझाने की कोशिश करते हैं कि बीजेपी बाहरी है और उसे बंगाल की संस्कृति की कोई समझन नहीं है.

सत्ता में आने से पहले ममता बनर्जी ने परविर्तन के साथ साथ मां, माटी और मानुष का नारा दिया था और वो वाम मोर्चे के शासन को सत्ता से बेदखल करने बेहद कारगर रहा.

बंगाली कार्ड में नजर महिला वोट पर

बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है - ये बोल कर ममता बनर्जी चाहते हैं कि अब तक सपोर्ट करते आये सभी लोग पहले की तरह ही एकजुट रहें और बीजेपी के सोनार बांग्ला या आसोल पोरिबोर्तन से प्रभावित ना हों. दरअसल, तृणमूल कांग्रेस को फुरफुरा शरीफ दरगाह वाले पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के ममता बनर्जी विरोधी तेवर से भी किसी बड़े झटके की आशंका होने लगी है. अब्बास सिद्दीकी के पहले असदुद्दीन ओवैसी से हाथ मिलाने की बात कही जा रही थी, लेकिन फिर वो कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के साथ नजर आ रहे हैं, लेकिन उसमें भी उनकी डिमांड आड़े आ रही है. जो भी हो अब्बास सिद्दीकी जो पहले ममता बनर्जी के सपोर्टर रहे अब खिलाफ जा चुके हैं, लिहाजा नुकसान तो तय है.

लोक सभा चुनाव में एक बड़ी आबादी ममता बनर्जी से दूर छिटक कर बीजेपी के पक्ष में चली गयी थी, नतीजे वैसे ही फिर से आये तो भी ममता बनर्जी के लिए मुश्किल हो सकती है - क्योंकि पूर्ण बहुमत न आने की स्थिति में ममता बनर्जी के लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा. ये समस्या बीजेपी के साथ नहीं आती, लेकिन उसके राजनीतिक विरोधी चूक ही जाते हैं. हरियाणा में 2020 के चुनाव नतीजे आने के बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों सत्ता के बराबर के दावेदार रहे, लेकिन बीजेपी के केंद्र की सत्ता में होने का फायदा मिला और दुष्यंत चौटाला बड़े आराम से बीजेपी के साथ चले गये. किसान आंदोलन में भी सब कुछ दांव पर लगाकर भी वो बीजेपी के साथ ही बने हुए हैं.

ममता बनर्जी ने बंगाली कार्ड तो खेला ही है अब उनकी महिला वोट पर भी नजर टिकी लगती है. चूंकि प्रशांत किशोर ममता बनर्जी के चुनाव अभियान की निगरानी कर रहे हैं, इसलिए ये चुनावी स्लोगन भी काफी सोच समझ कर गढ़ा गया लगता है.

प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी को दीदी की जगह अब बीजेपी के पीशी की की काट खोजते हुए 'मेये' यानी लड़की या बेटी के रूप में प्रोजेक्ट करने का फैसला किया है. दीदी जो भाव है वो बड़े होने का है, जबकि मेये में ये बेटी में बदल जाता है जिसे दुलार और आशीर्वाद की जरूरत होती है - और ममता बनर्जी बीजेपी को बाहरी बताकर बंगाल के लोगों से अपने लिए वोट और जीत का आशीर्वाद मांगने की कोशिश कर रही है.

ये भी देखने को मिला है कि मायावती सामान्य दिनों में ही बहनजी कहलाना पसंद करती हैं, लेकिन जैसे ही विवादों में घिरती हैं उनके साथ साथ बीएसपी नेता और उनके समर्थक भी दलित की बेटी के साथ नाइंसाफी होने की बात करते हुए शोर मचाने लगते हैं - ममता बनर्जी ने भी अब वही रास्ता अख्तियार कर लिया है और बीजेपी के खिलाफ मोदी सरकार के बेटी बचाओ अभियान की तर्ज पर ही अपना चुनावी स्लोगन गढ़ डाला है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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