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Updated: 17 फरवरी, 2021 05:03 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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मिथुन चक्रवर्ती (Mithun Chakraborty) ने भी पांच साल पहले राजनीति करीब करीब वैसे ही हालात में छोड़ी थी जैसे किसी जमाने में अमिताभ बच्चन ने. अमिताभ बच्चन कांग्रेस के टिकट पर लोक सभा चुनाव जीत कर संसद पहुंचे थे - और मिथुन चक्रवर्ती को तृणमूल कांग्रेस ने राज्य सभा भेजा था. दोनों में कॉमन बात ये भी रही कि दोनों ही राजनीति छोड़ कर अपना फिल्मी कॅरियर संवारने में व्यस्त हो गये. अमिताभ बच्चन ने तो लंबे अरसे बाद भी राजनीति में दिलचस्पी नहीं दिखायी, लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मिथुन चक्रवर्ती और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) की एक नयी मुलाकात ने ऐसे कयासों को हवा दे दी है.

मिथुन चक्रवर्ती और अमिताभ बच्चन के राजनीतिक रुझान में एक बुनियादी फर्क भी है. मिथुन चक्रवर्ती की छात्र जीवन से ही राजनीति में गहरी दिलचस्पी रही है, जबकि अमिताभ बच्चन गांधी परिवार की तत्कालीन नजदीकियों के चलते राजनीति में किस्मत आजमाने की कोशिश किये थे. जैसे अमिताभ बच्चन बोफोर्स घोटाले के कारण राजनीति से तौबा कर लिया, तकरीबन वैसे ही मिथुन चक्रवर्ती ने शारदा घोटाले की वजह से राजनीति से किनारा कर लिया था. हालांकि, राज्य सभा से इस्तीफा देने की वजह मिथुन चक्रवर्ती ने सेहत दुरुस्त न होना ही बताया था.

अंत भला तो सब भला वाले हिसाब से दोनों ही घोटालों के दागी साये से मुक्त हो चुके हैं. अमिताभ बच्चन को तो लंबा इंतजार करना पड़ा था, लेकिन मिथुन चक्रवर्ती ने प्रवर्तन निदेशालय में ब्रांड एंबेसडर के तौर पर कंपनी से मिले पैसे जमा कर पीछा छुड़ा लिया था. अब वो नयी पारी के लिए पूरी तरह तैयार लगते हैं. मिथुन चक्रवर्ती की पश्चिम बंगाल में अच्छी खासी फैन फॉलोविंग है - और बीजेपी उसी को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के खिलाफ एक कारगर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहेगी, बशर्ते - मोहन भागवत के साथ हुई मुलाकात के बाद बात थोड़ा आगे भी बढ़ जाये!

पर्सनल मुलाकात के पॉलिटिक मायने

देखा जाये तो मिथुन चक्रवर्ती और मोहन भागवत की हालिया मुलाकात की नींव 2019 में ही रखी गयी थी, लेकिन आम चुनाव के काफी बाद. मिथुन चक्रवर्ती अक्टूबर, 2019 में संघ मुख्यालय, नागपुर पहुंचे थे और उसी दौरान एक्टर ने संघ प्रमुख को घर आने का न्योता दिया था. अब अपडेट ये आया है कि मिथुन चक्रवर्ती के उस निहायत ही निजी न्योते को लेकर घर आने का वादा मोहन भागवत ने 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले ही पूरा कर दिया है.

मोहन भागवत ने मिथुन चक्रवर्ती से किया गया अपना वाद तब निभाया है जब वो डेढ़ साल के भीतर पश्चिम बंगाल का कई बार दौर कर चुके हैं. मिथुन चक्रवर्ती के बताये अनुसार वो लखनऊ से शूटिंग करके लौटे ही थे कि मोहन भागवत के मुंबई दौरे का कार्यक्रम बना और फिर घर पर मुलाकात का कार्यक्रम भी बन गया. मिथुन चक्रवर्ती से मिलने मोहन भागवत मड आइलैंड में उनके घर पहुंचे और सबके साथ नाश्ता किया, साथ ही, इस बार मिथुन चक्रवर्ती को पूरे परिवार को नागपुर आने का न्योता भी दिया.

अपने पिछले नागपुर दौरे में मिथुन चक्रवर्ती ने संघ प्रमुख से मुलाकात के साथ ही, डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमा के पास पहुंच कर श्रद्धासुमन भी अर्पित किया था.

mithun chakraborty, mohan bhagwatदो चुनावों के बीच मिथुन चक्रवर्ती और मोहन भागवत की मुलाकातें भले ही निजी हों लेकिन निशाने पर तो ममता बनर्जी ही लगती हैं!

मिथुन चक्रवर्ती का कहना है कि मोहन भागवत के साथ उनकी मुलाकात का कोई राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिये. सही बात है, ऐसा ही होना भी चाहिये - और ऐसा कोई सोचता भी नहीं अगर दो चुनावों के बीच के गैप में ये दोनों मुलाकातें नहीं हुई होतीं.

मिथुन चक्रवर्ती का कहना है कि ये महज एक पारिवारिक मुलाकात थी. रही बात, बंगाल चुनाव के चलते बीजेपी से जुड़ाव की तो मिथुन चक्रवर्ती का कहना है कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है. ये भी सही है, लेकिन एक सच तो ये भी है कि बीजेपी को मिथुन चक्रवर्ती की कहीं ज्यादा जरूरत है. ऐसे भी कह सकते हैं कि बीजेपी के लिए संघ को मिथुन चक्रवर्ती जैसी हर उस शख्सियत की जरूरत है जिसका इस्तेमाल चुनावों में तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के खिलाफ किया जा सके.

मिथुन भी मुकुल और शुभेंदु जैसे ही हैं

अब अगर मिथुन चक्रवर्ती के नागपुर दौरे को भी कुछ देर के लिए गैर राजनीतिक मान लिया जाये तो भी बात खत्म नहीं हो सकती. दलील पेश की जा सकती है कि अगर मिथुन चक्रवर्ती की कोई राजनीतिक महात्वाकांक्षा होती तो वो 2019 के आम चुनाव से पहले मोहन भागवत से मिले होते. ये भी मान लेते हैं, लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि मिथुन चक्रवर्ती ने आम चुनाव के नतीजे देखने के बाद अपना मन बदला हो.

अक्टूबर, 2019 से पहले वाली किसी मुलाकात की कोई खबर तो नहीं आयी थी, लेकिन किसी तरह का कोई संपर्क हुआ ही न हो, इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है. वैसे भी मिथुन चक्रवर्ती का नागपुर दौरा उनकी शुरुआती राजनीतिक विचारधारा के दायरे से बहुत दूर संपूर्ण हृदय परिवर्तन की मिसाल है जो अमूमन देखने को नहीं ही मिलती. बेशक मिथुन चक्रवर्ती संघ के सामाजिक कार्यों से काफी प्रभावित रहे हों, लेकिन छात्र जीवन भी वो कभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की तरह आकर्षित नहीं हुए, बल्कि वो तो वामपंथी विचारधारा के कायल रहे, बल्कि उसमें भी चार कदम आगे उन पर नक्सलबाड़ी का कुछ ज्यादा ही प्रभाव रहा है.

जुड़े तो वो कांग्रेस के स्टुडेंट विंग से भी थे लेकिन जल्द ही वो लेफ्ट की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ गये और फिर नक्सलवादी गुटों से भी, लेकिन भाई की मौत के बाद उनका नक्सलियों से मोहभंग हो गया - और वो हर तरीके से रिश्ता खत्म कर लिये. ये इतना भी आसान न था, इसलिए वहां की बातें वहीं रख कर मुंबई का रुख किया और उनकी अदाकारी की महारत लोगों के सामने आयी.

बरसों बाद मिथुन चक्रवर्ती की तृणमूल कांग्रेस से करीबी तब नजर आयी जब ममता बनर्जी ने बंगाली एक्टर को राज्यसभा भेज दिया. जो मिथुर चक्रवर्ती कुछ दिन पहले ही देश के बड़े टैक्स पेयर के तौर पर सुर्खियां बटोर रहे थे, शारद घोटाला सामने आने के बाद जांच एजेंसियों के निशाने पर आ गये. यहां तक कि प्रवर्तन निदेशालय के अफसरों के सामने पूछताछ के लिए भी पेश होना पड़ा.

असल में मिथुन चक्रवर्ती और बंगाली सिने बाला शताब्दी रॉय दोनों ही शारदा कंपनी के ब्रांड एंबेसडर रहे. पूछताछ में मिथुर चक्रवर्ती ने शारदा मिले दो करोड़ रुपये की बात स्वीकार की लेकिन लौटाने को भी तैयार हो गये. कुछ दिन बाद ही मिथुन की तरफ से ईडी अफसरों को टैक्स की रकम काट कर 1 करोड़ 19 लाख रुपये लौटाने की खबर भी आयी थी. शारदा घोटाले की जांच ईडी और सीबीआई कर रही है. शताब्दी रॉय के भी कुछ दिन पहले तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के संकेत मिल रहे थे लेकिन ममता बनर्जी की टीम ने उनको मना लिया और संगठन में उपाध्यक्ष बनने के बाद एक्टर ने बोल दिया कि पार्टी छोड़ने का उनका कोई इरादा कभी नहीं रहा.

शारदा जैसे घोटालों की आंच के शिकार मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता भी रहे हैं जिनके पाल बदलने में एक बड़ी वजह सत्ता के करीब होने की कवायद भी मानी जाती रही है. खुद ममता बनर्जी भी अक्सर घुमा फिर कर कहती रही हैं कि बीजेपी में चले जाने के बाद सब लोग बेदाग हो जाते हैं.

मिथुन चक्रवर्ती बीजेपी के लिए संघ को अगर कोई फायदा नजर आता है तो उसका पैमाना यही है कि वो शख्स ममता बनर्जी को कितना नुकसान पहुंचा सकता है. भले ही मिथुन चक्रवर्ती का मामला बिलकुल मुकुल रॉय या शुभेंदु अधिकारी जैसा न हो, लेकिन इतना तो है ही कि वो विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ एक क्रेडिबल आवाज हो सकते हैं. एक ऐसी आवाज जिसकी बात पश्चिम बंगाल के लोग सुनते हों. एक ऐसी आवाज जिसका लोगों पर असर हो सके.

ये जरूर है कि मोहन भागवत और मिथुन चक्रवर्ती की मुलाकात को बीजेपी नेता अमित शाह और बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली जैसा नहीं समझा जा सकता, लेकिन ये तो हर कोई मानता है कि पश्चिम बंगाल में मिथुन चक्रवर्ती भी काफी लोकप्रिय हैं. सौरव गांगुली की तरह मिथुन चक्रवर्ती को ममता बनर्जी के खिलाफ बीजेपी के सीएम फेस की तरह तो नहीं, लेकिन एक स्टार प्रचारक के तौर पर बीजेपी इस्तेमाल तो कर रही सकती है.

और कुछ न सही, लेकिन मिथुन चक्रवर्ती - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के 'आसोल पोरिबोर्तन' के संदेश को बंगाली समुदाय के बीच गहराई तक तो पहुंचा ही सकते हैं - मोहन भागवत को भला बीजेपी के लिए बंगाल में इससे ज्यादा क्या चाहिये!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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