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Updated: 18 फरवरी, 2021 05:34 PM
प्रभाष कुमार दत्ता
प्रभाष कुमार दत्ता
  @PrabhashKDutta
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा अभी न हुई, लेकिन यहां का चुनावी रण अपने चरम पर है. कांग्रेस, वाम मोर्चा, इंडियन सेक्युलर फ्रंट, AIMIM और कुछ अन्य छोटे दल भी इस सियासी अखाड़े में ताल ठोक रहे हैं. लेकिन, असली मुकाबला सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भाजपा के बीच ही माना जा रहा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी चुनाव में उतर रही है. दूसरी ओर भाजपा ने यह कहते हुए अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है कि उसके पास कई सशक्त नेता हैं.

हाल ही में कोलकाता में आयोजित इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट में पश्चिम बंगाल मेंविधानसभा चुनाव के प्रमुख रणनीतिकार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, 'मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल का ही होगा, लेकिन यह मैं तय नहीं कर सकता की कौन होगा. पार्टी का संसदीय बोर्ड इस पर निर्णय लेगा.' भाजपा ने अभी भले ही मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे का खुलासा नहीं किया है, लेकिन अगर भाजपा पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव में टीएमसी को झटका देने में कामयाब रहती है, तो उसके पास मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हैं. आइए इन दावेदारों पर डालते हैं एक नजर.

दिलीप घोष

पश्चिम बंगाल की भाजपा इकाई में नौवें अध्यक्ष हैं दिलीप घोष. अगर भाजपा बंगाल में चुनाव जीतती है, तो वह मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे. घोष का आरएसएस पृष्ठभूमि से होना ही उन्हें सीएम पद का सबसे बड़ा दावेदार बनाता है. 2014 में भाजपा की सक्रिय राजनीति में आने से पहले दिलीप घोष ने 1984 में आरएसएस 'प्रचारक' के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी. शुरुआत में भाजपा की राज्य इकाई के महासचिव के रूप में नियुक्त होने के बाद 2015 में उन्हें पश्चिम बंगाल का पार्टी अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. 2020 में घोष को फिर से राज्य के पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुना गया था.

दिलीप घोष पश्चिम बंगाल में टीएमसी के खिलाफ भाजपा की राजनीतिक लड़ाई में सबसे आगे रहे हैं. भाजपा के प्रदेश प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय के साथ मिलकर पार्टी के प्रचार अभियान को आगे बढ़ाने के साथ ही दिलीप घोष का कद भी बढ़ता जा रहा है. 2016 में दिलीप घोष के नेतृत्व में ही भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपना खाता खोला था. चुनाव में भाजपा ने तीन सीटें जीतीं थीं, जिसमें दिलीप घोष ने खुद चुनाव लड़ा था और खड़गपुर सदर से सात बार के विधायक कांग्रेस के ज्ञान सिंह सोहनपाल को हराया था.

2019 के आम चुनाव में भाजपा ने टीएमसी के खिलाफ अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की. पिछले चुनाव में पश्चिम बंगाल से केवल दो सीट जीतने वाली भाजपा ने 2019 में 18 सांसदों को लोकसभा में भेजा. तृणमूल कांग्रेस के 43.3 फीसदी के मुकाबले भाजपा का वोट शेयर 40.7 फीसदी तक बढ़ गया. दिलीप घोष ने मेदिनीपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की. हालांकि, घोष अपनी खड़गपुर सदर विधानसभा सीट पर भाजपा को जीत नहीं दिला सके, जो उनके लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद खाली हो गई थी. टीएमसी ने 2019 के उपचुनावों में इस सीट पर जीत दर्ज की थी.

घोष की सबसे बड़ी खामी है उनका बड़बोलापन. भाजपा नेता ने वर्षों से अपनी टिप्पणियों के जरिये कई विवादों को जन्म देते रहे हैं. दिलीप घोष ने सितंबर 2020 में कोरोना महामारी की समाप्ति की घोषणा करने और ममता बनर्जी पर भाजपा के कार्यक्रमों (जिसके एक महीने बाद उनमें कोरोना वायरस की पुष्टि हुई थी) को रोकने के लिए लॉकडाउन प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाया था. घोष ने जादवपुर यूनिवर्सिटी को लेकर कहा था कि भाजपा विश्वविद्यालय के एंटी नेशनल और आतंकवादियों पर बालाकोट जैसी एयर स्ट्राइक करेगी. दिलीप घोष खुले तौर पर नाम लेकर हमला करने के लिए जाने जाते हैं और हिंसा की धमकी देने से भी नहीं कतराते हैं.

हालांकि, भाजपा ने किसी भी मौके पर सार्वजनिक रूप से उन्हें इन बयानों के लिए कुछ नहीं कहा है, लेकिन घोष का 'बड़बोलेपन' से भरा व्यवहार पार्टी को आंतरिक रूप से प्रभावित करता है.

मुकुल रॉय

किसी समय पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए एक बाहरी व्यक्ति और प्रतिद्वंद्वी रहे मुकुल रॉय अब पार्टी के एक प्रभावशाली नेता बन गए हैं. सितंबर 2020 में उन्हें भाजपा ने पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया था. भाजपा के कई पुराने नेताओं और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा की तरह मुकुल रॉय का कद भाजपा में नहीं घटा. हालांकि, इसे टीएमसी छोड़ कर भाजपा में आने वालों को पार्टी की ओर से मिलने वाले फायदे के तौर देखा गया. रॉय के साथ टीएमसी के पूर्व सांसद अनुपम हाजरा भी जनवरी 2019 में भाजपा में शामिल हुए थे, जिन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया गया.

टीएमसी के संस्थापक सदस्यों में से एक मुकुल रॉय पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी थे. उन्हें टीएमसी के मुख्य जमीनी नेता के रूप में जाना जाता था. 66 वर्षीय रॉय को 2006 में राज्यसभा के लिए नामित किया गया था और 2017 में इस्तीफा देने तक सदस्य बने रहे. वह यूपीए सरकार में राज्यसभा सांसद के अपने कार्यकाल में रेल मंत्री भी रहे. 2015 में करोड़ों रुपये के शारदा चिट फंड घोटाले में पूछताछ के लिए सीबीआई के बुलावे के बाद ममता बनर्जी के साथ मुकुल रॉय के समीकरण बिगड़ने लगे थे.

जांच के दौरान उन्होंने एक से अधिक मौकों पर शारदा कंपनी के मालिक सुदीप्त सेन से मुलाकात की बात कुबूल की थी. शारदा घोटाले की जांच आगे बढ़ने के बाद 2016 में मुकुल रॉय को नारद स्टिंग टेप के जाल में फंस गए. जिसमें कथित तौर पर कई टीएमसी नेताओं को रिश्वत लेते या मांगते दिखाया गया था. हालांकि, रॉय ने इन आरोपों का खंडन किया है.

रॉय ने 2017 में टीएमसी से नाता तोड़ लिया और भाजपा में शामिल हो गए. सियासी गलियारों में इस बात की भी चर्चा थी कि 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जबरदस्त जीत के बाद पार्टी में ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद से भी रॉय नाराज थे. 2017 के बाद से पश्चिम बंगाल में भाजपा के बढ़ते प्रभाव में मुकुल रॉय ने अहम भूमिका निभाई और कई अन्य टीएमसी नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को भी भाजपा में शामिल होने के लिए प्रभावित किया. शारदा-नारद घोटालों के फंदे उनकी गर्दन के चारों ओर घूमते रहते हैं. माना जाता है कि रॉय ने भाजपा में शामिल होकर खुद को सुरक्षित कर लिया है.

भाजपा ने यह कहते हुए अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है कि उसके पास कई सशक्त नेता हैं.भाजपा ने यह कहते हुए अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है कि उसके पास कई सशक्त नेता हैं.

शुभेंदु अधिकारी

टीएमसी का जहाज छोड़ भाजपा की नैय्या में सवारी करने वाले शुभेंदु अधिकारी को पार्टी में शामिल हुए मुश्किल से दो महीने हुए हैं. लेकिन, वह पहले ही पश्चिम बंगाल में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में अपनी जगह स्थापित कर चुके हैं. जब 19 दिसंबर, 2020 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में अधिकारी भाजपा में शामिल हुए, तो वह इस चुनावी समर का सबसे हाई-प्रोफाइल दलबदल में से एक बन गया.

तृणमूल कांग्रेस पार्टी के सदस्य के रूप में शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम में 2007 के भूमि आंदोलन की अगुवाई के दौरान ममता बनर्जी की नजरों में आए थे. यह उनके राजनीतिक सफर में एक अहम मोड़ साबित हुआ.

शुभेंदु अधिकारी के पिता और भाई भी टीएमसी से जुड़े रहे हैं. अधिकारी पहली बार 2009 में पूर्वी मिदनापुर की तमलुक लोकसभा सीट से जीत हासिल कर सांसद बने. 2014 में इस सीट पर उन्होंने फिर से जीत हासिल की. 2016 में अधिकारी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में उतरे. उन्होंने टीएमसी के टिकट पर नंदीग्राम विधानसभा सीट से जीत हासिल की. ममता बनर्जी ने उन्हें अपनी सरकार में मंत्री बनाया था.

अधिकारी ने 2020 की शुरुआत से ही टीएमसी के कार्यक्रमों और कैबिनेट की बैठकों में जाना बंद कर दिया था. टीएमसी में अधिकारी ने असंतोष के स्वर उठाने शुरू कर दिए थे. कहा जाता है कि शुभेंदु अधिकारी पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते दबदबे और पार्टी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के हस्तक्षेप से नाखुश थे. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस अधिकारी के पार्टी से जाने को किसी भी तरह का झटका मानने से खारिज करती रही है. वहीं, ममता बनर्जी का आगामी चुनावों में नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का ऐलान एक अलग कहानी बताता है. 

टीएमसी के शीर्ष सूत्रों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी का प्रभाव कंठी दक्षिण और नंदीग्राम की दो विधानसभा सीटों तक ही सीमित है, जहां वह पूर्व में विधायक रह चुके हैं. वहीं, भाजपा उनके गृह जिले पूर्वी मिदनापुर के साथ जंगल महल के जिलों बांकुरा, पुरुलिया, बीरभूम, झारग्राम और पश्चिम मिदनापुर में जीत का भरोसा लगाए बैठी है. अगर शुभेंदु अधिकारी इस क्षेत्र की 60 विधानसभा सीटों को भाजपा के खाते में ले आते हैं, तो वह भाजपा की जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में उभर सकते हैं. हालांकि, इसे लेकर भाजपा में असंतोष के स्वर बढ़ सकते हैं कि चुनाव से कुछ ही समय पूर्व आए नेता को इतना बड़ा पद कैसे दिया जा रहा है.

स्वपन दासगुप्ता

पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित स्वपन दासगुप्ता एक प्रसिद्ध पत्रकार हैं, जिन्होंने इंडिया टुडे सहित कई प्रमुख अंग्रेजी प्रकाशनों में संपादकीय पदों पर काम किया है. वह एक जाने-माने बुद्धिजीवी हैं, जो मुखर होने के साथ ही अपने विचारों के लिए जाने जाते हैं. अप्रैल 2016 में स्वपन दासगुप्ता को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था.

बंगाल के उच्च श्रेणी या भद्रलोक के सदस्य दासगुप्ता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के सर्वोच्च पद के करीबियों के तौर पर देखा जाता है. दासगुप्ता के चुनाव में उतरने पर भाजपा एक ऐसे बौद्धिक वर्ग को अपने साथ जोड़ने का इरादा रखती है, जिसने बंगाल में भाजपा के लिए 'हिंदी पट्टी' की पार्टी की संभावना के मद्देनजर अपनी नाक सिकोड़ रखी है.

लेकिन दिलचस्प यह है कि भाजपा ने स्वपन दासगुप्ता की भूमिका को केवल भद्रलोक या बुद्धिजीवियों या कोलकाता के बड़े तबकों तक सीमित नहीं किया है. हालिया महीनों में दासगुप्ता को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की लगभग सभी रैलियों और रोड शो में देखा गया है. पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के आगमन से पहले भाजपा की 'पोरीबोर्तन यात्रा' के झारग्राम के हालिया लॉन्च में वह राजनीतिक भाषण भी दे रहे थे. तो, क्या लालगढ़ की धूल और घास इस पत्रकार-नेता के लिए नबना (राज्य सचिवालय) का रास्ता तय कर सकती है?

लॉकेट चटर्जी

पश्चिम बंगाल भाजपा में इस 46 वर्षीय महिला नेता का कद तेजी से बढ़ रहा है. हुगली से सांसद लॉकेट चटर्जी वर्तमान में पश्चिम बंगाल में भाजपा की महासचिव हैं. टीएमसी की पूर्व सदस्य लॉकेट चटर्जी 2015 में भाजपा में शामिल होने के बाद से ही लगातार पार्टी के नेतृत्व का विश्वास हासिल करती आ रही हैं. 2019 में अपनी पहली चुनावी जीत के बाद लोकसभा में पार्टी व्हिप नियुक्त होने से लेकर राज्य महिला मोर्चा के अध्यक्ष से पार्टी महासचिव के बनाए जाने तक अभिनेत्री से राजनेता बनीं लॉकेट के लिए आगे कई रास्ते खुले हैं. अगर भाजपा 2021 को बंगाल में अपना भाग्यशाली साल साबित करती है, तो क्या एक महिला की जगह कोई महिला ले सकती है? इसका पता जल्द ही चल जाएगा.

देबाश्री चौधरी

देबाश्री चौधरी वर्तमान में केंद्र सरकार में महिला और बाल विकास राज्य मंत्री हैं. वह केंद्रीय मंत्रिपरिषद में पश्चिम बंगाल राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले दो चेहरों में से एक है. पहली बार सांसद और सरकार में पहली बार मंत्री बनीं चौधरी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABPP) के साथ पुराना नाता है.

ये केवल कुछ नाम हैं, जिन्हें हम आपके लिए निकालकर लाए हैं. इसके साथ एक निष्पक्ष चेतावनी भी है, भाजपा पहले भी लोगों के पूर्वानुमानों को झटका दे चुकी है. इसलिए, भाजपा की जीत की स्थिति में अगर कोई क्रिकेटर इस पद का दावेदार बन जाए, तो हमें दोष न दें.

लेखक

प्रभाष कुमार दत्ता प्रभाष कुमार दत्ता @prabhashkdutta

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में असिस्टेंट एडीटर हैं.

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