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Updated: 19 फरवरी, 2021 06:29 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) का अमित शाह (Amit Shah) के साथ चुनावी जंग में अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) को आगे करना काफी दिलचस्प लगता है. आमतौर पर ऐसे मामलों में विरोधियों के हमले से बचाव का रास्ता खोजते हुए आरोपों का खंडन करते देखा जाता है, लेकिन ममता बनर्जी ने ऐसा नहीं किया है.

ममता बनर्जी आमने सामने की लड़ाई में यकीन रखती हैं - और बार बार ये दोहराती रहती हैं कि वो भागने वाली नहीं हैं वो लड़ेंगी और लड़ती रहेंगी - असल में यही उनकी सबसे बड़ी ताकत भी है और राजनीतिक पहचान भी.

पश्चिम बंगाल में फिलहाल बीजेपी 'बुआ-भतीजा' की राजनीति और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रही है. ऐसे हमलों की शुरुआत तो करीब करीब वैसे ही हुई जैसे 2019 में सपा-बसपा गठबंधन को देखते हुए बीजेपी नेतृत्व ने यूपी में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों मायावती और अखिलेश यादव को टारगेट किया था, लेकिन वे हमेशा ही बचाव की मुद्रा में देखे गये. अगर कभी पलटवार की कोशिश भी नजर आती तो वैसी नहीं जैसे ममता बनर्जी कर रही हैं.

अभिषेक बनर्जी पर पहला जोरदार अटैक बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा की तरफ से हुआ था. जेपी नड्डा ने नाम तो नहीं लिया था, लेकिन राजकुमार कह कर संबोधित करते हुए भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. ये करीब करीब वैसा ही रहा जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव को जंगलराज का युवराज कह कर संबोधित किया था - और अब बारी बारी बीजेपी के सभी बड़े नेता टीएमसी नेतृत्व को बुआ-भतीजा बोल कर हमला करने लगे हैं.

ममता बनर्जी ने अमित शाह को काउंटर करने के लिए अपने हिसाब से कमजोर नस खोजी है और मौका देख कर तेजी से धावा भी बोल रही हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को ललकारते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहने लगी हैं कि उनसे सीधे भिड़ने से पहले वो टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी से मुकाबला कर लें - सवाल ये है कि क्या ममता बनर्जी और अमित शाह की इस लड़ाई में अभिषेक बनर्जी टिक भी पाएंगे?

क्या अभिषेक इतने मजबूत हैं

सिर्फ अमित शाह या जेपी नड्डा ही अभिषेक बनर्जी को चुनावी राजनीति में घसीट रहे हों, बिलकुल ऐसा भी नहीं है. अभिषेक बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस में बढ़ते दखल से पार्टी के वे सभी नेता परेशान रहे हैं. ऐसे नेताओं को अपने और ममता बनर्जी के बीच में अभिषेक बनर्जी का आ जाना कभी सुहाया नहीं है - और ऐसे ही नेताओं में से एक शुभेंदु अधिकारी भी रहे हैं जो अब बीजेपी के मंच से मुख्यमंत्री को टारगेट कर रहे हैं. बीजेपी ज्वाइन करने से पहले भी कई बार शुभेंदु अधिकारी ने अभिषेक बनर्जी के साथ साथ चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपनी बगावत की वजह बताया था.

अभिषेक बनर्जी से चिढ़ने वाले नेताओं की बातों पर ममता बनर्जी कभी ध्यान भी देते नहीं देखी गयीं. बगावती रुख अख्तियार करने वाले नेताओं की तरफ से भी बार बार यही संकेत दिये जाते रहे कि ममता बनर्जी से उनको पहले की ही तरह अब भी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन उनके भतीजे या प्रशांत किशोर का हस्तक्षेप वे हरगिज नहीं चाहते थे. हां, ये जरूर चाहते थे कि अभिषेक बनर्जी को हर मामले में टांग अड़ाने से ममता बनर्जी रोकने की कोशिश जरूर करें, लेकिन कभी ऐसा देखने को नहीं मिला.

mamata banerjee, amit shah, abhishek banerjeeअभिषेक बनर्जी को तो लगता है जैसे ममता बनर्जी ने अमित शाह के आगे सियासत की सूली पर ही चढ़ा दिया है!

अब तो ममता बनर्जी ने डंके की चोट पर अभिषेक बनर्जी को आगे कर दिया है. फिर तो यही समझा जाना चाहिये कि ममता बनर्जी अपनी तरफ से नये सेनापति के तौर पर अभिषेक बनर्जी को अधिकृत कर रही हैं - और वो भी अपने सबसे बड़े और सबसे ताकतवर राजनीतिक विरोधी सीनियर बीजेपी नेता अमित शाह के खिलाफ.

हो सकता है ममता बनर्जी ने ऐसा सिर्फ अमित शाह के खिलाफ चेक प्वाइंट खड़ा करने के मकसद से किया हो, लेकिन टीएमसी नेताओं के लिए भी मैसेज तो हो ही सकता है. मतलब, टीएमसी के नेता भी ये मान लें कि अभिषेक बनर्जी सिर्फ उनके भतीजे नहीं हैं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस का भविष्य भी हैं. प्रशांत किशोर को जेडीयू का उपाध्यक्ष बनाते वक्त बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी ऐसे ही उनको पार्टी का भविष्य बताया था.

1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के 13 साल बाद 2011 में अभिषेक बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन कराया गया - तब 24 साल के रहे अभिषेक बनर्जी को टीएमसी के यूथ विंग की कमान भी सौंप दी गयी. बाद में 2014 में अभिषेक बनर्जी टीएमसी के टिकट पर डायमंड हार्बर से लोक सभा पहुंचे - और 2019 में अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे.

अमित शाह जहां दक्षिण 24 परगना जिले के काकद्वीप में रोड शो कर रहे थे, ऐन उसी वक्त ममता बनर्जी पैलान इलाके में रैली कर रही थीं. रैली में मौजूद लोगों से ममता बनर्जी ने कहा, 'मैंने अभिषेक से कहा कि वो जनता के लिए काम करे और राज्‍य सभा जाये, मगर उसका कहना रहा वो लोगों की तरफ से चुने जाने के बाद लोक सभा जाना चाहता है... '

और मौका देख कर ममता बनर्जी वो चुनौती भी दे डालीं जिससे हाल के दिनों में बचती हुई नजर आ रही थीं, 'मैं अमित शाह को चैलेंज देती हूं कि वो अपने बेटे को राजनीति में लेकर आयें.'

एक इंटरव्यू में ममता बनर्जी ने अमित शाह को भैया कह कर संबोधित किया था और फिर ये भी समझाया कि इस नाते उनके बेटे जय शाह भी तो उनके भतीजे ही हुए. तब ममता बनर्जी ये संदेश देने की कोशिश कर रही थीं कि चुनावी लड़ाई में निजी चीजें नहीं आनी चाहिये. अब तो ऐसा लगता है जैसे ममता बनर्जी ये कहना चाह रही हों कि बुआ-भतीजा हमले से बीजेपी बाज आये वरना जवाबी हमले उनको भी मालूम हैं.

बातों बातों में ममता बनर्जी कहती हैं कि वो कोई अशोभनीय बात नहीं करेंगी. आगे कहती हैं, 'सभी राजनीतिक दलों को गरिमा बनाए रखनी चाहिये. शिष्टाचार एकतरफा नहीं हो सकती - ये दोनों तरफ से होनी चाहिये.'

और फिर रैली में ममता बनर्जी की तरफ से बीजेपी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा चैलेंज भी पेश कर दिया गया - '...वे हर वक्त दीदी-भतीजा रटे हुए हैं. मैं अमित शाह को चैलेंज देती हूं कि वे पहले अभिषेक से लड़ें फिर बाद में मुझसे लड़ें.'

रैली में ममता बनर्जी ने कई बार अमित शाह के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार भी किया, बोलीं, केंद्र सरकार के एक मंत्री गंगासागर जाकर बुआ-भतीजे की बात कर रहे हैं. असल में अभिषेक बनर्जी को टारगेट करते हुए अमित शाह ने कहा था कि ममता सरकार में विकास से कोई मतलब नहीं है, एक ही लक्ष्य है - भतीजा बढ़ाओ.

अब तो कोई दो राय नहीं है कि ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को जंग के मोर्चे पर उतार दिया है, लेकिन सवाल ये है कि क्या वो इतने ताकतवर हैं?

अब तक अभिषेक बनर्जी के पास जो भी है वो सिर्फ ममता बनर्जी का भतीजा होने के नाते ही है - सत्ता की हनक को हटा दिया जाये तो अभिषेक बनर्जी के पास अब भी न तो शुभेंदु अधिकारी जैसा जनाधार है - और न ही मुकुल रॉय जैसी सांगठनिक क्षमता - जबकि, हाल फिलहाल शुभेंदु जैसे नेताओं के टीएमसी छोड़ने की बड़ी वजह भी अभिषेक बनर्जी ही हैं.

अभिषेक तो बहाना हैं

बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा चुनावी मैदान से बाहर भी होते हैं तो भी एक बात जरूर दोहराते हैं कि बंगाल में पीशी और भाईपो की सरकार जाने वाली है. पीशी मतलब आंटी और भाईपो भतीजे को कहते हैं - ध्यान देने वाली बात ये है कि बीजेपी नेतृत्व दीदी की जगह ममता बनर्जी को आंटी साबित करने में जुट गया है.

अभिषेक बनर्जी को आगे कर ममता बनर्जी चाहती हैं कि ये बहस और आगे बढ़े तो वो अमित शाह के बेटे जय शाह को मुद्दा बनाकर घसीट लें.

ऐसा भी नहीं है कि ममता बनर्जी अमित शाह पर हमेशा गुमनाम अटैक ही करती हैं, जब ठीक लगता है या हमले को धारदार बनाने की कोशिश होती है तो बाकायदा नाम भी लेती हैं - 'आप लगातार हम पर बुआ-भतीजा कहकर हमला करते हैं... आपके बेटे का क्या श्रीमान शाह - उन्हें इतने पैसे कहां से मिलते हैं?' और नतीजा ये होता है कि प्रशांत किशोर के सारे टिप्स भुलाते हुए ममता बनर्जी आग बबूला हो जाती हैं - 'मैं उनसे पूछती हूं कि जय शाह BCCI में कैसे घुसा? वो कैसे इतना अमीर बन गया?''

ये तो ऐसा लगता है जैसे ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को टीएमसी और बीजेपी की चक्की में पिसने के लिए आगे कर दिया है. अब तक अमित शाह और जेपी नड्डा ही अभिषेक बनर्जी को टारगेट कर ममता बनर्जी पर हमला बोला करते थे, अब तो ममता बनर्जी ने भी अभिषेक को आगे करके झोंक दिया है. आखिर ये दो चक्कियों के बीच में पिसने जैसा ही तो है.

ममता बनर्जी को ये लग रहा होगा कि ऐसा करने पर बीजेपी बुआ-भतीजे की बातें और फेमिली पॉलिटिक्स के आरोपों से पीछे हट सकती है - लेकिन क्या ऐसा वास्तव में हो पाएगा या अमित शाह की टीम काउंटर अटैक में कोई नया रास्ता अख्तियार करने वाली है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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