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Updated: 04 सितम्बर, 2021 09:37 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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एबीपी न्यूज और सी वोटर सर्वे के मुताबिक भी यूपी में सत्ता परिवर्तन जैसे कोई संकेत बिलकुल नहीं हैं. सर्वे के हिसाब से योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करते ही नजर आ रहे हैं - और बीजेपी को चैलेंज करने के मामले में समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ही आगे दिखायी पड़ रहे हैं, न कि कांग्रेस या मायावती की बहुजन समाज पार्टी.

मुद्दे की बात यूपी चुनाव (UP Election 2022) में हार या जीत का नहीं है और न ही हार जीत में फासले की फिक्र है - मुद्दा बीजेपी की सीटों के घटने का है. ऐसा लग रहा है जैसे विधानसभा चुनावों में बीजेपी की संभावित जीत भी ब्लॉक प्रमुख और जिला परिषद अध्यक्ष के चुनावों जैसी ही होने जा रही हो.

चुनाव पूर्व सर्वे के मुताबिक बीजेपी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 259 से 267 सीटें मिल सकती हैं. यूपी की मौजूदा विधानसभा में बीजेपी के पास अपने 309 विधायक हैं और गठबंधन साथी अपना दल के 9 जोड़ दें तो 315 हो जाते हैं.

अगला चुनाव भी बीजेपी, अपना दल के साथ मिल कर ही लड़ने जा रही है और यही वजह रही कि कुछ ही दिन पहले केंद्र के मोदी मंत्रिमंडल में हुई फेरबदल में अनुप्रिया पटेल को भी शामिल किया गया है. हालांकि, निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद थोड़े नाराज दिखे, लेकिन वो भी चुनाव साथ ही लड़ेंगे. अभी तक तो ऐसे ही संकेत मिले हैं.

सर्वे की नजर से देखें तो अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी 109 से 117 सीटें हासिल कर सकती है - लेकिन ये नंबर तो अखिलेश यादव के 400 सीटें जीतने के दावे से काफी पीछे है.

yogi adityanath, narendra modiचुनाव पूर्व सर्वे जो संकेत दे रहे हैं, उसमें बीजेपी नेतृत्व के लिए बड़ा मैसेज है!

बीएसपी नेता मायावती की मुश्किलें अभी खत्म होती नहीं नजर आ रही हैं क्योंकि सर्वे में उनके हिस्से में 12 से 16 सीटें ही दर्ज हो पा रही हैं - और प्रियंका गांधी वाड्रा की पार्टी कांग्रेस की हालत तो पांच साल बाद भी जरा भी सुधरी हुआ नहीं लग रही - महज 3 से 7 सीटों से संतोष करना पड़ सकता है.

चुनाव होने में अभी काफी समय बाकी है और ये सर्वे असली नतीजों के करीब होगा या पूरी तरह उलटा हो सकता है, कोई दावा नहीं कर सकता - लेकिन एक मजबूत संकेत तो देता ही है. खास कर तब जब परिस्थितियां भी संकेतों से मिलती जुलती ही प्रतीत हो रही हों.

2019 के आम चुनाव में भी बीजेपी की सीटें यूपी में कम हो गयी थीं, लेकिन पूरे देश में 2014 के मुकाबले ज्यादा सीटें मिली थीं - और ये अपनेआप में एक बड़ा संदेश था, लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में भी लोक सभा की तरह सीटें घट जायें तो बीजेपी के लिए चिंता की बात होनी चाहिये.

2014 में बीजेपी यूपी में लोक सभा की 71 सीटें जीती थी, लेकिन 2019 में 9 सीटें कम हो जाने से ये संख्या घट कर 62 रह गयी - 2024 के आम चुनाव के हिसाब से बीजेपी के लिए यूपी विधानसभा चुनाव जीतना तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन नंबर कहीं ज्यादा मायने रखता है.

बीजेपी का राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णिम काल न सही, लेकिन यूपी में तो बीजेपी के लिए ये स्वर्णिम युग ही समझा जाना चाहिये. 2017 के विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी के पास मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा भी न था, जबकि एक छोर से तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ललकार रहे थे तो एक अलग छोर से पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी नेता मायावती.

अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र में सत्ता संभालने के तीन साल बाद अपने दम पर यूपी में तीन सौ से ज्यादा सीटें दिला देते हैं तो अब तो उनके साथ योगी आदित्यनाथ भी मोर्चे पर तैनात हैं - अब अगर इस योगी-मोदी युग में बीजेपी यूपी में स्वर्णिम काल जैसा महसूस न कर सके और वैसे ही नतीजे नहीं ला सके तो मान लेना होगा कि कहीं न कहीं कोई गंभीर बात जरूर है.

राम मंदिर निर्माण का क्या कोई फायदा नहीं?

मोदी-योगी युग की दुहाई दी जाती रही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू संगठनों की तरफ से 2019 के आम चुनाव से पहले ये सवाल उठाया जाता रहा कि जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और यूपी के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ बैठे हों, फिर भी अयोध्या में राम मंदिर न बने तो कब बनेगा? तब बीजेपी के गठबंधन साथी रहे शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे का भी ये सवाल था.

लेकिन ये सवाल एक झटके में ही खामोश हो गये थे, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने एक इंटरव्यू के जरिये साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक सरकार सिर्फ इंतजार करेगी - कुछ और सोचने की जरूरत नहीं है. बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ गया और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन हुए भी साल भर से ऊपर हो चुका है - अब मंदिर के बन जाने का इंतजार है.

जिस कंडीशन पर मंदिर निर्माण को लेकर सवाल उठाये जा रहे थे, 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी बिलकुल वही परिस्थिति बनी रहने वाली है - देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और यूपी के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कट्टर हिंदू नेता की छवि से आच्छादित योगी आदित्यनाथ.

ऐसे में आने वाले चुनाव नतीजों को लेकर मंदिर जैसा ही सवाल बनता है - उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए ये तो बीजेपी का गोल्डन पीरियड ही समझा जाएगा. जब मौका और दस्तूर दोनों हो तो जाहिर है बीजेपी के खाते में सबसे ज्यादा सीटें आने की संभावना भी जतायी जा सकती है - और समर्थकों को अपेक्षा भी हो सकती है.

पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव सत्ता में वापसी के लिए योगी आदित्यनाथ को चैलेंज कर रहे हैं - एक ताजातरीन सर्वे में भी ये बात सामने आयी है और पंचायत चुनाव के नतीजों से भी ऐसा ही संकेत मिला था.

अखिलेश यादव अगले चुनाव में समाजावादी पार्टी के हिस्से में यूपी विधानसभा की 403 में से 400 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं - थोड़े लाइट मूड में कहते हैं कि तीन सीटें विपक्ष को मिलेंगी, ताकि लोकतंत्र मजबूत रहे.

अखिलेश यादव का दावा दिल्ली के नतीजों जैसा जायका पेश करने की कोशिश कर रहा है, जब 2015 में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिली थीं और बीजेपी को महज तीन विधायकों की जीत से संतोष करना पड़ा था. 2020 में अरविंद केजरीवाल इतिहास बिलकुल वैसे ही तो दोहरा नहीं सके, लेकिन इतनी गुंजाइश तो रही कि खुलेआम मंच से कह सकें - 'दिल्लीवालों... आई लव यू!'

अखिलेश यादव का हो सकता है अपना अंदाजा हो, या फिर संभव है ये महज एक राजनीतिक बयान ही हो, लेकिन पलड़ा तो बीजेपी के पक्ष में दिखायी दे रहा है - और 400 सीटों का सपना बीजेपी नेता योगी आदित्यनाथ तो अखिलेश यादव के मुकाबले आसानी से देख सकते हैं - अब अगर सर्वे ऐसे संकेत नहीं दे रहा है तो बीजेपी नेतृत्व के साथ साथ RSS को भी समझ लेना चाहिये कि कहीं न कहीं कोई लोचा तो है.

मतलब कोई न कोई लोचा है

सर्वे में लोगों से चुनावी मुद्दों को लेकर भी सवाल पूछे गये - और ये भी कि वे योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज से किस हद तक संतुष्ट हैं. एक महत्वपूर्ण सवाल तो कोरोना से भी बनता ही है, लिहाजा वो भी पूछा गया है.

सर्वे में सैंपल साइज क्या लिया जाता है और मेथडोलॉजी क्या अपनायी जाती है, बहुत कुछ उस पर भी निर्भर करता है - लेकिन आंकड़ों से इतर अगर लोगों के परसेंटेज के हिसाब से देखें तो मालूम होता है कि लोग बेरोजगारी को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा मानते हैं. बेरोजगारी के अलावा जो दो और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं वे महंगाई और किसानों का मुद्दा समझ में आया है.

एक बात जो बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात होनी चाहिये वो है - भ्रष्टाचार. बेशक मामूली नंबर हों, लेकिन ऐसे में जबकि बीजेपी भ्रष्टाचार के प्रति देश भर में जीरो टॉलरेंस का दावा करती हो, अगर एक भी राज्य में थोड़े से लोग भी भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दे कै तौर पर दर्ज कराते हैं तो नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

सर्वे में काफी कम लोग, सिर्फ तीन फीसदी ने भ्रष्टाचार को यूपी चुनाव के लिए मुद्दा बताया है. लगता है बीजेपी नेतृत्व को एक बार चेक जरूर करना चाहिये कि कहां लूप होल छूटा हुआ है. वैसे ही 39 फीसदी लोगों ने बेरोजगारी को चुनावी मुद्दा माना है, 26 फीसदी लोगों ने महंगाई और 19 फीसदी लोगों को किसानों का मसला चुनावी मुद्दा बनता नजर आ रहा है.

हालांकि, सर्वे के कुछ नतीजे अजीब भी लगते हैं. मसलन, कोरोना को लेकर. सर्वे में शामिल 10 फीसदी लोग मानते हैं कि कोरोना भी चुनावी मुद्दा हो सकता है. जितने भी लोगों ने ऐसी बात कही है, उससे ज्यादा तो कोरोना वायरस की दूसरी लहर के दौरान बीजेपी कार्यकर्ता ही बेहाल परेशान लग रहे थे - और बड़े से बड़े नेता भी किसी भी तरह की मदद पहुंचाने में खुद को असहाय महसूस कर रहे थे.

हालत तो ये हो गयी थी कि बीजेपी के कई नेता जिनमें कुछ तो योगी सरकार में मंत्री हैं, उनको भी कोरोना काल कि मुश्किलों को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखना पड़ा था. शिकायत में तो नेताओं ने यही लिखा था कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं, लेकिन समझने वाली बात तो ये रही कि बदइंतजामी के कारण हालात कितने भयावह रहे.

ऑक्सीजन, जरूरी दवाइयों और अस्पताल में एक बेड तक के लिए लोग सड़कों पर कोविड पॉजिटिव मरीजों को लेकर लगातार इधर उधर भागते रहे. जौनपुर से बेटे के इलाज के लिए वाराणसी पहुंची एक महिला का वायरल वीडियो भी याद ही होगा जब ई-रिक्शा पर ही उसका बेटा दम तोड़ दिया था - और बेटे के शव के साथ महिला को घर लौटना पड़ा था.

वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है - और जब हालात बेकाबू होने लगे तो विशेष रूप से कंट्रोल करने की जिम्मेदारी पूर्व नौकरशाह और बीजेपी नेता अरविंद शर्मा को देनी पड़ी. अरविंद शर्मा वाराणसी में कंट्रोल रूम बना कर यूपी के कई जिलों में कोविड 19 से उपजे हालात की निगरानी कर रहे थे.

पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोविड कंट्रोल के वाराणसी मॉडल की दिल खोल कर तारीफ करते रहे, लेकिन जब वाराणसी से बीजेपी की चुनावी मुहिम की शुरुआत की तो सारा क्रेडिट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दे डाले.

योगी आदित्यनाथ को 'यूपी के यशस्वी, उर्जावान और कर्मठ मुख्यमंत्री श्रीमान योगी आदित्यनाथ जी...' कह कर संबोधित करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा वो हैरान करने वाला रहा, 'उत्तर प्रदेश ने जिस तरह से कोरोना की दूसरी लहर को फैलने से रोका है, वह अभूतपूर्व है...'

और भी हैरान करने वाली बात रही यूपी में कोविड 19 के प्रकोप की तुलना गोरखपुर और आस पास के इलाकों में बरसों से चली आ रहे दिमागी बुखार से प्रधानमंत्री मोदी की तुलना करने वाली. प्रधानमंत्री मोदी यही समझाने की कोशिश कर रहे थे कि पहले की सरकारों और योगी सरकार में यूपी के लोगों की सेहत की कितनी चिंता है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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