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Updated: 09 दिसम्बर, 2020 07:39 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राजस्थान में हुए पंचायत चुनाव (Rajasthan Panchayat Election Results) में BJP ने सत्ताधारी कांग्रेस ढंग से रगड़ (BJP beats Congress) दिया है. अब तो अशोक गहलोत को भी ठीक से समझ में आ ही गया होगा कि सचिन पायलट (Ashok Gehlot VS. Sachin Pilot) की ठीक से 'रगड़ाई' न होने के बावजूद कैसे उनके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से पहले कांग्रेस उपचुनावों में जीतती आ रही थी - और अब कैसे बीजेपी ने तमाम दिग्गजों के इलाके में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए वापसी की जोरदार दस्तक के साथ साथ मजबूत संकेत भी दे रही है.

बीजेपी ने राजस्थान की पंचायतों और जिला परिषद चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए सूबे के सभी कांग्रेसी दिग्गजों को उनके गढ़ में जबरदस्त शिकस्त दी है - और इसके साथ ही बरसों से चली आ रही वो परंपरा भी टूट गयी है कि 'जिसकी सरकार नतीजे भी उसी के' पक्ष में आते हैं. 2003 और 2013 में जब अशोक गहलोत की सरकार बनी थी तो जिला परिषद और पंचायत समिति चुनाव में 70 फीसदी सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी - और बिलकुल वैसे ही जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वसुंधरा राजे विराजमान रहीं बीजेपी के हिस्से में भी करीब दो-तिहाई सीटें दर्ज हुई थीं.

अशोक गहलोत पंचायत चुनाव के नतीजों को चाहे जैसे ले रहे हों और आलाकमान के सामने सचिन पायलट को जिम्मेदार ठहराने को जो भी रणनीति तैयार कर रहे हों, लेकिन लगता नहीं कि सचिन पायलट को ये रिजल्ट आश्चर्यजनक लग रहे होंगे - और अशोक गहलोत के मुकाबले तो उनको राहुल गांधी ही ज्यादा जिम्मेदार नजर आ रहे होंगे. ये जरूर है कि सचिन पायलट को भी अहमद पटेल की कमी शिद्दत से महसूस हो रही होगी - क्योंकि राजस्थान को लेकर जो कमेटी बनी है - न तो अब तक उसकी कोई सलाह सामने आयी है और न ही चुनावी वादों को लेकर राजस्थान के लोगों के सामने कोई रोड मैप पेश किया गया है.

समझने और समझाने के लिए तर्क और कुतर्क तो कभी भी गढ़े जा सकते हैं, लेकिन राजस्थान के लोगों ने कांग्रेस नेतृत्व को एक तरीके से ये पैगाम तो भेज ही दिया है कि कांग्रेस में अब उनकी दिलचस्पी धीरे धीरे कम होने लगी है - कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी ये अच्छी तरह समझ ही लेना चाहिये कि ये एग्जिट पोल नहीं है, ये तो गहलोत-पायलट के झगड़े के रुझान बन कर आने लगे हैं - और फाइनल नतीजे आने में भी बहुत ज्यादा वक्त बाकी नहीं है.

ये चुनाव नतीजे हैं कोई एग्जिट पोल नहीं

राजस्थान पंचायत चुनाव के रुझान आये तो हैदराबाद नगर निगम चुनाव की तरह ही, लेकिन बिहार चुनाव में नीतीश कुमार के 'अंत भला तो सब भला' जैसा कुछ नहीं हुआ. शुरू में तो कांग्रेस ने भी हैदराबाद में बीजेपी की तरह बढ़त के साथ माहौल भी बनाये रखा, लेकिन शाम होते होते रुझानों के आंकड़े पलटी मारने लगे. रुझान जब नतीजों में तब्दील होने शुरू हुए तो बीजेपी की तरह कांग्रेस वापसी नहीं ही कर पायी - और आखिरकार बीजेपी नेताओं के लिए खुश होने का बहाना दे दिया कि बिहार से हैदराबाद होते हुए जो बयार बहती चली आ रही है, राजस्थान के बाद पश्चिम बंगाल में भी कमल खिलाने की कोशिश कर सकती है. वैसे उससे पहले अभी जम्मू-कश्मीर और दूसरे राज्यों के निकाय चुनावों से खबर अभी आयी नहीं है.

ashok gehlot, sachin pilot, rahul gandhiराजस्थान के पंचायत चुनावों पर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के झगड़े का साफ असर - राहुल गांधी भी चपेट में!

नतीजों से जुड़ी रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के 21 जिला प्रमुखों के लिए चुनाव में बीजेपी 14 और कांग्रेस 5 सीटें जीतने में सफल रही है. पंचायत चुनाव में 1833 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की है, जबकि कांग्रेस को 1713 सीटों पर जीत मिली है.

नजर तो सभी की टोंक और अजमेर जैसे इलाकों पर है क्योंकि वे इलाके सचिन पायलट के हिस्से रहे हैं. सचिन पायलट फिलहाल तो राजस्थान की टोंक विधानसभा सीट से विधायक हैं, लेकिन 2014 तक वो अजमेर से सांसद रहे और केंद्रीय मंत्री भी रहे. बीते दिनों जब तक अशोक गहलोत से खुल कर झगड़ा नहीं हुआ था, सचिन पायलट राजस्थान के डिप्टी सीएम और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे.

टोंक जिला परिषद में जहां कांग्रेस 25 में से 10 सीटें ही जीत पायी, वहीं अजमेर पंचायत में भी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. ऐसा भी नहीं कि ये सिर्फ सचिन पायलट के साथ हुआ है, उनके बाद राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये गोविंद सिंह डोटासरा के इलाके लक्ष्मणगढ़ में भी कांग्रेस को टोंक से सिर्फ एक ही सीट ज्यादा 11 मिली हैं, 25 में से. लक्ष्मणगढ़ में बीजेपी को 13 सीट और एक सीट पर निर्दलीय को जीत मिली है. जहां तक अजमेर का सवाल है तो जिम्मेदारी तो अशोक गहलोत के कैबिनेट साथी मंत्री रघु शर्मा की भी बनती है. आखिर वो भी वहीं से आते हैं और फिलहाल सरकार में हैं भी. जब कोटा अस्पताल में बच्चों की मौत हुई थी तो ये रघु शर्मा ही रहे जो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ साथ अपने से पहले की बीजेपी सरकार को जिम्मेदार ठहरा कर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे थे. सोनिया गांधी तब सचिन पायलट को मौके पर जाकर हालात का जायजा लेने के लिए दिल्ली से भेजा तो वो कोटा अस्पताल में ही अपनी ही सरकार पर सवाल उठाने लगे - आखिर कब तक हम अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे और दूसरों पर दोष मढ़ते रहेंगे? सचिन पायलट की यही वो बात रही जो अशोक गहलोत से विवाद के कांग्रेस दरबार में पहुंचने तक जहर की तरह रिसती रही और अशोक गहलोत मन माफिक समझाते रहे. मीडिया में भी वो सचिन पायलट को लेकर जहर ही उगलते रहे - 'अच्छा दिखने से कुछ नहीं होता. अच्छी अंग्रेजी बोलने से कुछ नहीं होता.' हो सकता है नतीजों की समीक्षा में 'हुआ तो हुआ' मोमेंट मान कर राहत महसूस करने की कोशिश हो रही हो.

और सिर्फ पायलट और डोटासरा की ही कौन कहे - जो हाल खेल मंत्री अशोक चांदना के इलाके बूंदी का है, वही सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना के चित्तौड़गढ़ इलाके में कांग्रेस का है. हर तरफ हार की ही भरमार है.

अब सवाल ये है कि अशोक गहलोत 10, जनपथ पर बीजेपी के दिखाये गये सचिन पायलट के वीडियो का हवाल देते हैं तो राहुल गांधी वाले वीडियो को कैसे नजरअंदाज करेंगे? अगर अंधेरगर्दी ही मची हो तो बात और है!

राहुल गांधी की भी तो जवाबदेही बनती है

चूंकि सोनिया गांधी के दरबार में अशोक गहलोत का जादू चलता है, इसलिए मान कर चलना होगा कि सचिन पायलट ही कठघरे में खड़े किये जाएंगे. करीब करीब वैसे ही जैसे सोनिया गांधी को काम करते देखे जा सकने वाले कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चिट्ठी लिखने वाले G-23 नेताओं के खिलाफ अशोक गहलोत जैसे नेता धावा बोल दिये थे. मुमकिन है अशोक गहलोत बीजेपी का वो वीडियो भी दिखाते हुए ये भी समझाने की कोशिश करें कि देखिये कैसे सचिन पायलट बीजेपी के संपर्क में अब भी हैं. सच, तो ये है कि बीजेपी ने इस वीडियो में सचिन पायलट को भी टारगेट किया है - और चुनाव नतीजे भी बता रहे हैं कि लोगों पर इसका गहरा असर हुआ है.

लेकिन तब क्या होगा जब फिर से कपिल सिब्बल या पी. चिदंबरम जैसे नेता सचिन पायलट के पक्ष में खड़े हो जायें और राहुल गांधी वाले वीडियो की भी याद दिलायें जो बीजेपी ने ट्वीट किया था - ऐसे तो जिम्मेदारी राहुल गांधी पर भी आ बनती है.

ये अक्टूबर, 2018 का वाकया है. तब कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी ने बीजेपी नेतृत्व को निशाने पर लेते हुए कहा था, 'हमारे मुख्यमंत्री... हमारे नेता खोखले भाषण नहीं देंगे... हमारे नेता झूठ नहीं बोलेंगे... 15 लाख का वादा नहीं करेंगे, लेकिन जो हमने कह दिया जो आपने मंच से सुन लिया - मैं आपको गारंटी देकर कहता हूं वो हम पूरा करके दिखाएंगे.'

भूले तो अशोक गहलोत भी नहीं होंगे जब उनके विश्वास प्रस्ताव जीत लेने के बाद सचिन पायलट मीडिया के सामने राजस्थान के लोगों को राहुल गांधी के इन्हीं वादों की याद दिलाने की कोशिश कर रहे थे, ये कहते हुए कि जो बातें तय हुई हैं उन पर अमल किये जाने का उनको भी इंतजार है.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की पहल पर राहुल गांधी से मुलाकात में सचिन पायलट को भरोसा दिलाया गया था कि उनकी तरफ से उठाये जा रहे मसलों पर गौर फरमाने के लिए एक कमेटी बनायी जाएगी जो उसी की सिफारिशों के आधार पर एक्शन प्लान तैयार होगा. सोनिया गांधी ने इसके लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी भी बना रखी है - तीन सदस्यों में सबसे अहम अहमद पटेल तो अब रहे भी नहीं. अहमद पटेल के अलावा कमेटी में कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और अजय माकन को शामिल किया गया है. कमेटी कुछ मीटिंग हुई बतायी जाती हैं, लेकिन अक्टूबर के पहले हफ्ते में अहमद पटेल के कोविड-19 पॉजिटिव हो जाने और फिर केसी वेणुगोपाल की मां के निधन के चलते बात आगे बढ़ ही नहीं पायी.

अगर अब भी अशोक गहलोत राहुल गांधी और खुद को छोड़ कर सिर्फ सचिन पायलट के सिर पर ही हार का ठीकरा फोड़ने की कोशिश करते हैं और ये समझाइश भी सोनिया गांधी के गले उतर जाती है कि वास्तव में अशोक गहलोत नहीं सचिन पायलट ही 'निकम्मा और नकारा' हैं.

अगर अब भी 'रगड़ाई' की ही तलवार लटकती महसूस हो, फिर तो सचिन पायलट को अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अपने दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया की राय एक बार आंख मूंद कर जरूर लेनी चाहिये.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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