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Updated: 12 अगस्त, 2022 07:02 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी अपने हिसाब से 2024 के मैदान में कूद पड़े हैं. राहुल गांधी के अलावा मार्केट में ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) भी बने हुए हैं. राष्ट्रपति चुनाव के बाद ममता बनर्जी विपक्षी खेमे से दूरी बनाती नजर आ रही हैं, जबकि राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि सत्ता की राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है - ऐसे में देखें तो अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे दावेदार नीतीश कुमार ही नजर आते हैं.

आठवीं बार मुख्यमंत्री पद के लिए शपथग्रहण के बाद नीतीश कुमार ने तेवर दिखाने के साथ साथ इरादा भी जाहिर कर दिया है, लेकिन ममता बनर्जी की ही तरह डिस्क्लेमर के साथ. नीतीश कुमार नयी पारी शुरू करते ही उसी स्वर में बोल रहे हैं, जिस लहजे में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी को शिकस्त देने के बाद बोल रही थीं - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2024 में चैलेंज करने की लिए विपक्ष के एकजुट होने की अपील और प्रधानमंत्री पद का दावेदार न होने की बातें.

नीतीश कुमार की बातों से लगता है कि वो अपने दोनों हाथों में लड्डू महसूस कर रहे हैं. करीब करीब वैसे ही जैसे ममता बनर्जी बोला करती थीं, एक पैर से बंगाल जीतेंगे और दोनों पैरों से दिल्ली. ऐसा लगता है जैसे नीतीश कुमार को भी लगता है एक हाथ का लड्डू उनके लिए बिहार में बीजेपी को गच्चा देना है - और दूसरे हाथ में जो लड्डू है वो दिल्ली की राजनीति से जुड़ा है.

एक बात तो माननी पड़ेगी अब तक सिर्फ नीतीश कुमार ही अब तक सही सलामत बचे हुए हैं, वरना 2014 के बाद बीजेपी ने अपने सभी गठबंधन साथियों को अपने पैरों पर सीधे खड़े होने लायक भी नहीं छोड़ा है - उद्धव ठाकरे के घाव तो अभी ताजा ताजा हैं, प्रकाश सिंह बादल और चंद्रबाबू नायडू का जो हाल हो रखा है, सबको मालूम है. बिहार में चिराग पासवान मालूम नहीं किस उम्मीद में नीतीश कुमार को आंख दिखा रहे हैं, यूपी में तो ओमप्रकाश राजभर बीजेपी के पास लौट ही आये हैं.

ये नीतीश कुमार का अपना लंबा राजनीतिक अनुभव और कौशल ही है जो बिहार की राजनीति में रिंग मास्टर बने हुए हैं. उद्धव ठाकरे जैसी स्थिति आने से पहले ही अपने खिलाफ साजिशों को नाकाम कर चुके हैं - और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. 2017 में भी नीतीश कुमार के सामने ऐसी ही स्थिति पैदा हो गयी थी. एक बार फिर नीतीश कुमार ने वैसी ही तेजी और सूझबूझ दिखाते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी बचा ली है.

महागठबंधन में लौटते ही नीतीश कुमार बीजेपी के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कड़े तेवर में नजर आने लगे हैं - और ये समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर विपक्ष एक साथ मिल कर लड़े तो 2024 में बीजेपी को सत्ता में आने से रोका जा सकता है. सवाल ये है कि क्या नीतीश कुमार तब तक मैदान में ऐसे ही टिके भी रहेंगे?

नीतीश, ममता और केजरीवाल

मुख्यमंत्री पद के शपथग्रहण के बाद जिस तरीके से नीतीश कुमार ने सवाल किया, वो काफी महत्वपूर्ण है - "2014 में जो जीतकर आए थे... 24 के बाद रह पाएंगे तब न?"

2019 के आम चुनाव से पहले ममता बनर्जी कई मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'एक्सपाइरी डेट पीएम' कहते सुनी गयी थीं - और 2021 में चुनाव जीतने के बाद तो लगा जैसे बंगाल की तरह ही दिल्ली भी फतह कर देंगी.

Nitish Kumar, mamata banerjee, arvind kejriwalनीतीश कुमार का कहना है कि वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, लेकिन ये भी दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2024 में सत्ता में वापसी नहीं कर पाएंगे

जैसे नीतीश कुमार अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज कर रहे हैं, ममता बनर्जी भी ऐसा ही करती रही हैं, लेकिन साल भर में ही उनके तेवर बदल गये हैं. असल में ममता बनर्जी कांग्रेस को छोड़ कर पूरे विपक्ष को एकजुट करना चाहती थीं. शरद पवार इसके लिए राजी नहीं हुए और ममता बनर्जी को काफी निराशा हुई है. विधानसभा चुनावों में भी ममता बनर्जी ने गोवा में काफी मेहनत की थी - असम से लेकर हरियाणा तक कई भर्तियां भी की थी, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम हुईं.

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के पास बड़ा मौका था. नीतीश कुमार तो बीजेपी के साथ थे, लेकिन ममता बनर्जी विपक्षी दलों के नेताओं के साथ सीधे संपर्क में थीं. असल सोनिया गांधी की उस वक्त तबीयत सही नहीं थी और राहुल गांधी प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में उलझे हुए थे - लेकिन ममता बनर्जी चीजों को संभाल नहीं पायीं. ऐसा लगता है, अगर वहां ममता की जगह नीतीश कुमार होते तो विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर सकता था. हार तो पहले से तय थी, लेकिन लड़ाई में विपक्ष को तौलने का मौका तो मिला ही था.

फिर भी ममता बनर्जी ने विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा से हाथ खींच लिया - और उपराष्ट्रपति चुनाव से भी अलग हो गयीं. ये तो ऐसा लगा जैसे वो विपक्ष के साथ नहीं हैं और बीजेपी का विरोध नहीं कर रही हैं. ममता बनर्जी को लेकर एक सवाल उस मुलाकात को लेकर भी उठाया जाने लगा जिसमें वो दार्जिलिंग में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ चाय पी रही हैं.

क्या ममता बनर्जी ने मैदान छोड़ दिया है? ऐसे दो मौके आये हैं जब ममता बनर्जी के दो स्टैंड देखने को मिले हैं. एक, जब सोनिया गांधी के सपोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय के एक्शन पर साझा बयान जारी हुआ. दो, जब प्रवर्तन निदेशालय के ही अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की बात उठी. सोनिया गांधी वाले साझा बयान पर तो ममता बनर्जी की पार्टी की तरफ से किसी ने दस्तखत नहीं किया, लेकिन ईडी के अधिकारों की बात पर ममता बनर्जी विपक्ष के साथ खड़ी नजर आयीं.

ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं का ऐसा ही ढुलमुल रवैया तब भी दिखा जब राज्य सभा के सदस्य सस्पेंड किये जाने को लेकर संसद परिसर में धरना दे रहे थे. ये ठीक है कि तृणमूल कांग्रेस की तरफ से भी विरोध प्रदर्शन कर रहे सदस्यों के खाने पीने के इंतजाम किये गये थे, लेकिन एक वक्त ये भी देखने को मिला जब टीएमसी सांसद अलग गोल बना कर बैठे हुए थे.

गोवा में आम आदमी पार्टी को स्टेट पार्टी का दर्जा मिलने के बाद अरविंद केजरीवाल का भी जोश हाई है - और वो एक और राज्य में ऐसा होने का इंतजार कर रहे हैं ताकि उनको नेशनल पार्टी का दर्जा हासिल हो जाये.

नीतीश कुमार ने तो अभी नयी पारी की शुरुआत ही की है. ममता बनर्जी का क्या रुख रहता है, देखना है. राहुल गांधी को लेकर भी खबर आ रही है कि अब भी वो कांग्रेस अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हैं, ऐसे में ले देकर सिर्फ अरविंद केजरीवाल ही बचते हैं जो 2024 की शिद्दत से तैयारी कर रहे हों.

राहुल गांधी और ममता बनर्जी का रुख थोड़ा शांत देख कर लगता है कि नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल में ही होड़ होने वाली है - लेकिन स्वीकार्यता के हिसाब से देखें तो नीतीश कुमार से विपक्षी खेमे में कम ही विरोध होगा. नीतीश कुमार की एक छवि ही उनके रास्ते में रोड़ा है, उनके अपने गठबंधन सहयोगी के साथ बने रहने की अनिश्चितता.

नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल में से किसी ने भी प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी नहीं जतायी है, लेकिन केजरीवाल अब ये जरूर कह रहे हैं कि आम आदमी की सरकार आयी तो दिल्ली और पंजाब की तरह ही वो पूरे देश को 'रेवड़ी' बांटेंगे. ये रेवड़ी शब्द, दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने ही हाल ही में दिल्ली सरकार के मुफ्त की चीजों की घोषणा को लेकर कहा था.

नीतीश ने मोदी को चैलेंज क्यों किया?

नीतीश कुमार को तो प्रधानमंत्री मोदी को चैलेंज करना ही था, लेकिन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पहले ही मुद्दा दे दिया था. जेपी नड्डा ने हाल ही में अपने बिहार दौरे के वक्त कहा था, 'हम अपनी विचारधारा पर चलते रहे तो देश से क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो जाएंगी.'

कांग्रेस के उदयपुर चिंतन शिविर के वक्त राहुल गांधी ने भी विचारधारा का नाम लेकर क्षेत्रीय पार्टियों पर ऐसा ही टिप्पणी की थी - और उसका ज्यादादर राजनीतिक दलों ने विरोध किया था.

नीतीश कुमार एक तरीके से जेपी नड्डा के कमेंट का जवाब दे रहे थे, लेकिन उसी में उनको प्रधानमंत्री मोदी तक को भी चैलेंज करने का बहाना मिल गया - और नड्डा के बयान को ही मुद्दा बनाते हुए नीतीश कुमार ने 2024 की तैयारी के लिए अपील कर डाली, 'मैं विपक्ष को 2024 के लिए एकजुट होने की अपील करता हूं.'

नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी या जेपी नड्डा किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन दावा यहां तक कर डाला है कि 2024 में बीजेपी की सत्ता में वापसी तो होने से रही.

नीतीश कुमार कह रहे थे, '2014 में आने वाले... 2024 में रहेंगे तब ना...'

और साथ में एक बात और भी जोड़ दी, 'हम रहें या न रहें... वे 2024 में नहीं रहेंगे.'

और फिर जेपी नड्डा को भी अपने अंदाज में चैलेंज कर दिया, 'जिन लोगों को लगता है कि विपक्ष खत्म हो जाएगा तो हम लोग भी तो आ ही गए विपक्ष में... जितना करना है वो लोग करते रहें न.'

जेपी नड्डा के बयान पर शरद पवार का रिएक्शन भी नीतीश कुमार जैसा ही है, लेकिन वो उसे बीजेपी नेतृत्व को टारगेट कर रहे हैं, न कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को. शरद पवार ने कहा है, 'बीजेपी अपनी सहयोगी पार्टियों को ही खत्म करने में जुटी है... प्रकाश सिंह बादल के साथ भी ऐसा ही हुआ... एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद शिवसेना के साथ यही हुआ... बिहार में भी ऐसा ही होने वाला था, लेकिन नीतीश कुमार ने महाराष्ट्र में जो हुआ उससे सीख ली.'

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मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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