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Updated: 10 मई, 2019 04:10 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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लगता तो पहले से ही था. अब तो औपचारिक ऐलान भी हो चुका है. सपा-बसपा गठबंधन आम चुनाव से आगे भी बने रहने की संभावना है. ये बात अब मायावती की ओर से भी कह दी गयी है. पहले ऐसा सिर्फ अखिलेश यादव ही कहते रहे. नामुमकिन तो नहीं लगता था - क्योंकि गठबंधन में फाइनल अथॉरिटी तो मायावती ही हैं, लेकिन उनके बयान के बाद काफी हद तक मुमकिन लगने लगा है.

सपा-बसपा गठबंधन के लंबे और टिकाऊ होने की संभावना की वजह भी सिर्फ एक ही है - डील पक्की होना.

मायावती को प्रधानमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव देखना चाहेंगे या नहीं, इस सवाल का जवाब वो गोलमोल ही दिया करते रहे - हालांकि, अब साफ कर दिया है. दोनों की एक दूसरे के प्रति भूमिका भी अब साफ हो गयी है.

सारी बातों के बावजूद एक सवाल जहां का तहां बना हुआ है - क्या डील की तरह मायावती का इरादा भी पक्का है? और क्या अखिलेश यादव भी आखिर तक धैर्य बनाये रखेंगे? विधानसभा चुनाव तो तीन साल दूर है - पहले तो दोनों नेताओं को 23 मई के बाद की अग्नि परीक्षा से गुजरना है.

मायावती हैं तो क्या-क्या मुमकिन है?

कांग्रेस को लेकर मायावती के तीखे बयानों के बावजूद राहुल गांधी लगातार संयम बरतते हुए सम्मान प्रकट करते रहे हैं. मायावती के प्रभाव में आकर अखिलेश यादव के कड़े रूख के बाद भी राहुल गांधी भरसक चुप ही रहते हैं. कांग्रेस उम्मीदवारों को लेकर प्रियंका गांधी वाड्रा के बयान के बाद थोड़ा विवाद जरूर हुआ था, लेकिन फौरी भूल सुधार के साथ प्रियंका वाड्रा ने नया बयान जारी कर दिया. प्रियंका वाड्रा के बयान के बाद करीब 24 घंटे पूरे यूपी में कांग्रेस उम्मीदवारों वोटकटवा के तौर पर देखा जाने लगा था.

कांग्रेस को सपा-बसपा गठबंधन से दूर रखने के बावजूद राहुल गांधी का धैर्य की वजह भी चुनाव नतीजों के बाद की स्थिति को देखते हुए लगती है. अब तो बीजेपी की ओर से भी मायावती पर डोरे डाले जाने लगे हैं. देखना ये होगा कि लोक सभा चुनाव के नतीजे पूरी तरह आ जाने के बाद जो राजनीतिक समीकरण बनते हैं उसमें मायावती की क्या भूमिका बनती है?

सीन 1 : मायावती पीएम बन जायें - जनता का आखिरी फैसला क्या होगा, किसे पता? फिर भी जब तक सही तस्वीर नजर न आये भला कौन इस बात से इंकार कर सकता है कि मायावती देश की अगली प्रधानमंत्री नहीं बनने जा रही हैं. जैसे कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद एचडी कुमारस्वामी के दोनों हाथों में लड्डू थे, मायावती के सामने भी वैसी संभावनाएं हो सकती हैं. कुमारस्वामी की ही तरह एक हाथ में छोटा तो दूसरे हाथ में बड़ा लड्डू. एक गठबंधन मायावती को प्रधानमंत्री की कुर्सी ऑफर करे - और दूसरा सरकार में हिस्सेदारी. कुमारस्वामी ने तो बड़े लड्डू को तरजीह दी - मायावती क्या फैसला लेती हैं ये उन पर निर्भर करता है.

सीन 2 : गठबंधन की सरकार में हिस्सेदारी - जरूरी नहीं है कि छोटा लड्डू बिलकुल ही खारिज करने लायक हो. एनडीए को लेकर सुब्रमण्यन स्वामी का ही कहना है कि मायावती हाथ मिला सकती हैं, लेकिन नेतृत्व बदलने की उनकी शर्त भी हो सकती है. अगर ये नौबत आती है तो मायावती केंद्र सरकार का हिस्सा भी बन सकती हैं. प्रधानमंत्री की कुर्सी न सही, सरकार में हिस्सेदार होने का ये फायदा तो होगा ही कि आयकर और सीबीआई के छापे तो नहीं पड़ेंगे. ये भी कम है क्या?

सीन 3 : सरकार को बाहर से सपोर्ट दें - अगर मायावती को लगता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी तो मिलने से रही और सरकार में शामिल होकर भी कोई खास फायदा नहीं होने वाला तो बाहर से समर्थन का विकल्प भी खुला होगा. इस स्थिति का फायदा ये होगा कि सरकार के हर फैसले में अड़ंगा लगाया जा सकता है. शोर मचाने का पूरा मौका मिल सकता है और फिर छापों से निजात की गारंटी तो है ही.

सपा-बसपा गठबंधन की डील में कितना दम?

ऐसे कई मौके आये जब मायावती की उस खास मुस्कुराहट पर आशंका के बादल मंडराते हुए लगते थे. सपा-बसपा गठबंधन की घोषणा के वक्त अखिलेश यादव का जवाब सुनने के बाद मायावती के चेहरे पर खुशी देखने लायक थी. अखिलेश का जवाब तब स्पष्ट भी नहीं था - 'आपको पता है मैं किसे...'

mayawati, akhilesh yadavसपा-बसपा गठबंधन की उम्र कितनी लंबी है?

कुछ ही दिन बाद जब अखिलेश यादव कोलकाता रैली में पहुंचे तो वो नये प्रधानमंत्री की बात करने लगे थे. वजह तब ममता बनर्जी की मौजूदगी रही होगी. बाद के दिनों में भी देश को 'नया प्रधानमंत्री' और 'यूपी से पीएम' जैसी बातें अखिलेश किया करते थे - लेकिन अब स्टैंड क्लियर करना पड़ा है. बकौल अखिलेश यादव ही, मायावती को प्रधानमंत्री बनाने में समाजवादी पार्टी पूरा सहयोग करेगी - और अगली बार अखिलेश यादव के यूपी का सीएम बनने में बीएसपी की वोट ट्रांसफर की जिम्मेदारी रहेगी. मायावती और अखिलेश यादव ने इस तरह अपनी अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य बांट लिये हैं. यही, दरअसल, सपा-बसपा गठबंधन को लेकर दोनों नेताओं के बीच हुई डील है - और ये डील पक्की है. मगर, कितनी पक्की है? ये बहुत हद तक निर्भर करता है कि नतीजे आने के बाद देश में राजनीतिक परिस्थितियां कैसी बनती हैं?

ये डील ही है जो समझौते कराती है. ये डील ही है जो गठबंधन कराती है. ये डील तभी चलती है जब दोनों पक्षों को लगता है कि वो ज्यादा फायदे में है या फिर उसके पास दूसरा कोई चारा नहीं है - और जब तक ऐसी भावना कायम रहती है डील भी बरकरार रहती है. वरना, सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. ऐसे मौड़ पर दुर्घटना भी महज मौके की एक तलाश होती है. तलाश पूरी होते ही डील भी टूट जाती है. गठबंधन को टिकाऊ बनाने के मकसद से मंजिलें पहले ही आपस में बांट ली गयी हैं. अखिलेश की मंजिल लखनऊ तक ही सीमित है, लेकिन मायावती की मंजिल दिल्ली है. मायावती और दिल्ली के बीच की दूरी में भी राजनीतिक हालात और किस्मत की बड़ी भूमिका है.

गौर करने वाली बात ये है कि मायावती के मंजिल हासिल करने के सफर में वक्त बहुत कम बचा है. 23 मई को आम चुनाव के नतीजे आने के बाद परिस्थितियां क्या शक्ल लेती हैं - मायावती की किस्मत कौन सा करवट ले पाएगी, उसी पर निर्भर करेगा. अगर कोई सूरत बनी फिर तो बल्ले बल्ले ही है. अगर ये मुमकिन नहीं हो पाया तो? फिर तो बड़ी मुश्किल होगी.

अखिलेश की मंजिल तक के सफर में तीन साल का फासला है. 23 मई के बाद तो अखिलेश यादव हाथ खड़े कर देंगे - जो हुआ सो हुआ. जो कर सका कर दिया. जितना मुमकिन था, जोर लगा दिया.

ये कर्तव्य और हक की डील है. अखिलेश अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, मायावती को हक दिला पायें जरूरी तो नहीं. मायावती को हक मिले न मिले, अखिलेश की अपेक्षा या उनका हक खत्म तो नहीं हो जाएगा. अगर मायावती का काम नहीं बन सका तो डील के तहत उन्हें अगले पांच साल इंतजार करना होगा. उससे पहले अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने में मायावती को फिर से जी जान से जुटना होगा. क्या वाकई ऐसा मुमकिन होगा?

बड़ा सवाल ये है कि दिल्ली दूर हो जाने की स्थिति में क्या मायावती लखनऊ नहीं लौटना चाहेंगी? अगर सफर लंबा हो, मंजिल थकाऊ और स्पष्ट न हो फिर तो हालात के हिसाब से फैसला लेना होगा? हालात तो यूटर्न के लिए ही मजबूर करेगा. यूटर्न का मतलब मायावती के सामने दिल्ली की जगह लखनऊ चुनने का विकल्प बचा होगा.

क्या अपनी मंजिल चूक जाने पर भी मायावती यूपी के सीएम की कुर्सी पर अखिलेश यादव को बिठाना पसंद करेंगी? क्या मौजूदा राजनीति में इतना त्याग मुमकिन है कि मायावती खुद मुख्यमंत्री बनने की बजाये अखिलेश यादव के सीएम बनने में मददगार बनें? अगर ऐसा नहीं हुआ तो गठबंधन का भविष्य क्या होगा?

वैसे भी जिस तरह देश के सभी गठबंधनों की मियाद 23 मई को ही खत्म होती नजर आ रही है - क्या आगे भी मायावती और अखिलेश राजनीतिक तौर पर साथ बने रह सकेंगे?

आगे क्या होगा, कैसे समझा जाये? लोक सभा का चुनाव वो लड़ रहा है जिसे मुख्यमंत्री बनना है, वो नहीं जिसे प्रधानमंत्री बनना है!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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