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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   31-03-2018
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मायावती अब भी फूंक फूंक कर ही कदम बढ़ा रही हैं. ऊपर से जो लग रहा है, वास्तव में मायावती वही कर भी रही हैं, कहना मुश्किल है. ये मानना भी मुश्किल लग रहा है कि 2019 में अखिलेश और मायावती के बीच गठबंधन वैसा ही होगा जैसा आम तौर पर होता है.

मायावती अब चौंकाने लगी हैं. जब ये समझा गया कि समाजवादी पार्टी और बीएसपी में 2019 तक के लिए गठबंधन हो गया, तो मायावती ने सामने आकर साफ इंकार कर दिया. जब ये माना जा रहा था कि राज्य सभा चुनाव में बीएसपी उम्मीदवार को समाजवादी पार्टी का पूरा सपोर्ट न मिलने से दोनों साथ छोड़ देंगे, तो फिर से मायावती चौका दिया - '2019 तक साथ रहेंगे और बीजेपी को हराएंगे.'

ताज्जुब नहीं होना चाहिए अगर मायावती इस मामले में एक बार फिर सबको चौंका डालें. वैसे भी गठबंधन का इम्तिहान तो तब होता है जब साझीदारों के बीच सीटों का बंटवारा होना होता है.

तजुर्बे का फायदा तो ठीक है, मगर मिलेगा किसे?

यूपी में हुए राज्य सभा चुनाव के बात इन दिनों तजुर्बे की बातें होने लगी हैं. तजुर्बे की बात पहले मायावती ने अखिलेश यादव को लेकर कही थी. मायावती ने समझाया कि अगर अखिलेश यादव में अनुभव की कमी नहीं रहती तो वो बीएसपी उम्मीदवार की जीत पर जोर देते. राज्य सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार जया बच्चन तो चुनाव जीत गयीं, लेकिन बीएसपी उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर हार गये.

akhilesh, dimpleतजुर्बा तो है, मगर मुफ्त में नहीं मिलने वाला...

अब अखिलेश यादव कह रहे हैं कि वक्त आने पर वो खुले दिल से मायावती के अनुभव का फायदा जरूर उठाएंगे. यानी अखिलेश ने मायावती की बात पूरी तरह मान ली है कि तजुर्बे के मामले में मायावती उनसे काफी आगे हैं.

मायावती के अनुभव का जिक्र अखिलेश यादव ने विधान परिषद में बजट पर चर्चा में हिस्सा लेते वक्त भी किया. बीजेपी को टारगेट करते हुए अखिलेश ने कहा, "आप हम पर जातिवादी होने का आरोप लगाते हैं. जो आपने किया, वही हमने सीखा. जो फॉर्मूला आपने तैयार किया, वही हम आपके खिलाफ लगाने जा रहे हैं... मुझे खुशी है कि जो जवाब मुझे देना चाहिये था, वो बसपा की नेता ने दे दिया है. अब ये हर लड़ाई में हार जाएंगे."

अखिलेश यादव की ये मुराद भी तो तभी पूरी होगी जब मायावती अपने तजुर्बे का फायदा उन्हें उठाने दें. अखिलेश यादव को मालूम होना चाहिये कि मायावती के मूल स्वभाव में कोई अंतर नहीं आया है - बस, एक एक करके वो सारे नुस्खे आजमाती जा रही हैं.

2019 में फंसेगा पेंच

मायावती की चालों पर गौर कीजिये. फूलपुर और गोरखपुर चुनाव में उन्होंने एक्सपेरिमेंट किया था और नतीजा देख लिया. फिर राज्य सभा चुनाव के प्रयोग का रिजल्ट भी देख लिया. 2019 आने दीजिए और देखते रहिये अभी ऐसे कितने एक्सपेरिमेंट होते हैं. अभी तक ऐसा नहीं लगा है कि मायावती के स्टैंड में कोई तब्दीली आई है.

गोरखपुर और फूलपुर चुनाव के जरिये मायावती जानना चाहती थीं कि समाजवादी पार्टी और बीएसपी के साथ मिल कर चुनाव लड़ने पर क्या वही नतीजे आते हैं जिसके कयास लगाये जाते रहे हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव के वक्त लालू प्रसाद जैसे नेता यूपी के वोट शेयर की बात करते रहे. उनकी दलील थी कि 2014 में बीजेपी को जितने वोट मिले उससे ज्यादा समाजवादी पार्टी और बीएसपी को अलग अलग मिले थे. यानी दोनों को जोड़ दें तो गठबंधन बीजेपी पर भारी पड़ता. तब गठबंधन की कोशिशें भी हुईं लेकिन बात नहीं बन सकी. नतीजा सामने आ ही गया. प्रस्तावित फेडरल फ्रंट के पीछे अब भी यही तर्क पेश किये जा रहे हैं.

mayawatiबात तभी बनेगी जब ताली दोनों हाथों से बजे...

गोरखपुर और फूलपुर के नतीजों से मायावती को ये तो पता चल गया कि दोनों साथ मिल कर लड़ें तो बीजेपी को रोका जा सकता है. राज्य सभा चुनाव से एक और बात भी मालूम हो गयी. बीएसपी से जितना फायदा समाजवादी पार्टी को मिला, जरूरी नहीं बीएसपी को भी वैसा फायदा मिले.

अब देखिये, आने वाले उपचुनावों में बीएसपी उम्मीदवार को समाजवादी पार्टी के समर्थन की बातें हो रही थीं. मायावती ने साफ कर दिया बीएसपी उपचुनाव नहीं लड़ेगी. इतना ही नहीं, मायावती ने ये भी कह दिया कि बीएसपी काडर समाजवादी पार्टी के लिए वैसे वोट मांगने नहीं जाएंगे जैसे गोरखपुर और फूलपुर में काम किये थे. मतलब ये कि उपचुनावों को लेकर मायावती के स्टैंड में कोई बदलाव नहीं आया है.

अब तक के दोनों प्रयोगों में अखिलेश यादव ही फायदे में रहे हैं. सिवा बीजेपी को शिकस्त देने की खुशी के मायावती को और कुछ भी हासिल नही हुआ है. भला मायावती ऐसा सौदा क्यों करें जिसमें उनका सीधा फायदा न हो. अब परोक्ष फायदे के लिए ही तो राजनीति होती नहीं.

सीटों का बंटवारा कैसे होगा

2014 में यूपी की 80 लोक सभा सीटों में से समाजवादी पांच पर जीत हासिल की थी. मायावती की पार्टी का खाता भी नहीं खुल पाया था. वैसे समाजवादी पार्टी भी वही सीटें जीत पायी जिन पर परिवार के लोग ही उम्मीदवार थे. दो उपचुनाव जीतने के बाद समाजवादी पार्टी की सात सीटें हो गयी हैं. मायावती की राज्य सभा में समाजवादी पार्टी के मुकाबले सीटें कम ही हैं.

फिर 2019 में सीटों के बंटवारे का आधार क्या होगा? तब क्या होगा जब फेडरल फ्रंट वास्तव में बन ही गया? फिर तो सीट बंटवारे में कांग्रेस भी साझीदार होगी. चाहे यूपी हो चाहे बिहार कांग्रेस सीटों के बंटवारे के मामले में बीते चुनावों में घाटे में ही रही है.

सवाल ये है कि आखिर वोटों के बंटवारे का आधार क्या होगा? जैसे 2017 में समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के बाद कांग्रेस को सीटें दी थीं वैसे मायावती तो मानेंगी नहीं. अखिलेश यादव ने कांग्रेस को अमेठी तक के लिए तड़पाया और वो मन मसोस कर रह गयी.

अगर समाजवादी पार्टी की जीती हुई सीटें छोड़ दें तो चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने के मामले में बीएसपी आगे रही. बीएसपी 33 सीटों पर आगे रही जबकि समाजवादी पार्टी सिर्फ 31 सीटों पर. इसी तरह कांग्रेस अमेठी और रायबरेली की दो सीटें जीतने के अलावा सात जगह दूसरे नंबर पर रही. अगर टिकटों का बंटवारा इस आधार पर हुआ तो समाजवादी पार्टी की दावेदारी 38 सीटों पर, बीएसपी की 33 सीटों पर और कांग्रेस की नौ सीटों पर बनती है.

वोट ट्रांसफर के मामले में कांशीराम की जो थ्योरी थी, मायावती ने एक बार फिर आजमा लिया है. बीएसपी के वोट दूसरों को तो ट्रांसफर हो जाएंगे, लेकिन दूसरों के वोट भी क्या बीएसपी को वैसे ही मिलेंगे? 2019 में भी सवाल यही होगा - साझीदारों के सामने भी और मायावती के आगे भी. जब तक इन सवालों के जवाब संबंधित पक्ष ढूंढ नहीं लेते, गठबंधन हाथी के दिखाने के दांत जैसा ही नजर आएगा.

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