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Updated: 10 जून, 2021 09:10 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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जितिन प्रसाद (Jitin Prasad) भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की ही तरह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के आस पास ही देखे जाते रहे - ये 2019 के आम चुनावों की बात है. आने वाले चुनावों में राहुल और प्रियंका तो साथ होंगे, लेकिन दोनों में से कोई आस पास नहीं होगा.

जितिन प्रसाद भी अब ज्योतिरादित्य सिंधिया की ही तरह बीजेपी के हो चुके हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनके घर पर मुलाकात करने के बाद जितिन प्रसाद बीजेपी मुख्यालय पहुंचे और बीजेपी नेता पीयूष गोयल की मौजूदगी में भगवा चोला धारण कर लिया.

जितिन प्रसाद और सिंधिया के साथ साथ सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा भी कभी राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा हुआ करते थे. दरअसल, सभी के पिता अपने जमाने में कांग्रेस में साथी नेता हुआ करते थे. राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी, जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद, सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट और मिलिंद देवड़ा के पिता मुरली देवड़ा.

गुजरते वक्त के साथ राहुल गांधी की टीम में जैसे जैसे लोगों का दबदबा बढ़ा पुराने साथी दूर होते गये - पहले पार्टी में, फिर पार्टी से. सचिन पायलट तो पहले से ही अशोक गहलोत के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के चलते और मिलिंद देवड़ा उपेक्षा की वजह से ऐसा लगता है जैसे वक्त गुजार रहे हों. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी सरकार की ऐसी तारीफ कर कि बाकियों को भी सबक लेना चाहिये, मिलिंद देवड़ा ने भी एक तरीके से जल्द ही रुखसत का इशारा कर ही दिया है.

मार्च, 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश के 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन किया और एक झटके में कमलनाथ सरकार गिरा दी. कांग्रेस नेतृत्व चाहता तो ये दोनों चीजें टाली जा सकती थीं. तब सचिन पायलट की तरफ से ऐसा ही बयान आया था. सिंधिया फिलहाल बीजेपी के राज्य सभा सांसद हैं और मोदी कैबिनेट का हिस्सा बनने का इंतजार कर रहे हैं. जहां तक मध्य प्रदेश का सवाल है, शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री जरूर हैं, लेकिन मंत्रिमंडल में नंबर के हिसाब ज्यादा असरदार सिंधिया ही हैं.

सिंधिया की तरह जितिन प्रसाद के बीजेपी में आने से यूपी कैबिनेट में योगी आदित्यनाथ (Yogi Aditynath) का शिवराज जैसा हाल तो नहीं होने वाला है - लेकिन बीजेपी एमएलसी अरविंद शर्मा के बाद कांग्रेस के ब्राह्मण फेस रहे जितिन प्रसाद नयी मुसीबत जरूर हैं.

योगी के लिए जितिन प्रसाद नयी टेंशन हैं

2022 में उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने कांग्रेस से जितिन प्रसाद को झटक कर पूरा फायदा उठाने की कोशिश की है - एक नये ब्राह्मण चेहरे को लाकर योगी आदित्यनाथ पर लगने वाले ठाकुरवाद के आरोपों को बेदम या कम करने की कोशिश हो सकती है.

योगी आदित्यनाथ के लिए मुसीबत ये होगी कि पहले से एक भूमिहार चेहरे अरविंद शर्मा (Arvind Sharma) के साथ साथ अब एक ब्राह्मण फेस जितिन प्रसाद को भी कदम कदम पर फेस करना पड़ेगा.

jitin prasad, piyush goyalकांग्रेस ने तो निजात पा ली, जितिन प्रसाद अब योगी आदित्यनाथ की मुसीबत बनने वाले हैं

जैसे मध्य प्रदेश के होकर भी शिवराज सिंह चौहान के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया दिल्ली वाला ही फील देते हैं, दिल्ली से ही वीआरएस लेकर लखनऊ पहुमचे अरविंद शर्मा के बाद जितिन प्रसाद को लेकर भी योगी आदित्यनाथ को बिलकुल वैसा ही महसूस होने वाला है - यूपी की जातीय राजनीति में बीजेपी नेतृत्व योगी आदित्यनाथ की पोजीशन में कोई बदलाव तो नहीं कर रहा, लेकिन हर रोज ऐसे ही नये नये खेल खेल रहा है. आरोप ही सही, लेकिन बीजेपी नेतृत्व एक तरफ जातीय समीकरण बैठाने की कोशिश कर रहा है और साइड इफेक्ट ये हो रहा है कि योगी आदित्यनाथ के प्रभाव पर सीधा असर हो रहा है.

जितिन प्रसाद के कांग्रेस छोड़ने पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की टिप्पणी रही, 'मुझे बड़ी खुशी है... मेरे छोटे भाई हैं उनका स्वागत है बीजेपी में... अपनी तरफ से तहेदिल स्वागत करता हूं.'

जितिन प्रसाद ने भी बीजेपी ज्वाइन करने पर वैसी ही फीलिंग शेयर की है जैसे विचार सिंधिया के रहे, 'मैं कांग्रेस पार्टी में रहकर अपनी जनता के हितों के लिए काम नहीं कर पा रहा था.'

बीजेपी की तारीफ में कसीदे पढ़ना तो बनता ही है, 'देश में कोई संस्थागत दल है तो वो भारतीय जनता पार्टी है... बाकी व्यक्ति विशेष की या क्षेत्रीय दल हैं... जिन चुनौतियों और हालात से हमारा देश जूझ रहा है तो उसके लिए अगर कोई दल और नेता खड़ा है तो वो बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी हैं.'

पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए जितिन प्रसाद को प्रभारी बनाया गया था, लेकिन उससे पहले वो कांग्रेस के लिए ब्राह्मणों का सम्मेलन करा रहे थे. सब ठीक ठाक ही चल रहा था लेकिन चिट्ठी लिखने के बाद से जितिन प्रसाद के प्रति कांग्रेस नेतृत्व की धारणा अचानक ही बदल गयी.

उत्तर प्रदेश से दो बार लोक सभा सांसद रहे जितिन प्रसाद, मनमोहन सिंह सरकार में राहुल गांधी के करीबी नेताओं की तरह मंत्री भी रह चुके हैं और पश्चिम बंगाल चुनाव में राहुल गांधी की गैरमौजूदगी में दिल्ली की ओर से प्रभारी के तौर पर प्रतिनिधित्व कर रहे थे.

जितिन प्रसाद ने बीजेपी में शामिल होने के अपने राजनीतिक जीवन का नया अध्याय बताया है. कहते हैं, 'कांग्रेस से तीन पीढ़ियों का साथ रहा है, ये निर्णय मैंने बहुत विचार, मंथन और सोचने के बाद लिया है. सवाल ये नहीं है कि मैं किस दल को छोड़कर आ रहा हूं, सवाल ये है कि मैं किस दल में जा रहा हूं और क्यों जा रहा हूं?'

चूंकि यूपी कैबिनेट में कोई फेरबदल की संभावना नहीं लग रही या मध्य प्रदेश जैसी सिंधिया वाली परिस्थिति भी नहीं है, लेकिन योगी आदित्यनाथ को ये तनाव तो हो ही रहा होगा कि अपनों के लिए टिकटों की सूची देने वाला यूपी का रहने वाला एक और नेता दिल्ली से अरविंद शर्मा की ही तरह आ टपका है. जितिन प्रसाद जहां शाहजहांपुर से आते हैं, अरविंद शर्मा मऊ के रहन वाले हैं. योगी के लिए तो जैसे अरविंद शर्मा दिल्ली की गाइडलाइन फॉलो करते हैं, जितिन प्रसाद भी बिलकुल वैसा ही करेंगे, मान कर चलना चाहिये.

बीजेपी ने कांग्रेस के G 23 का पहला विकेट झटका

जितिन प्रसाद भी कांग्रेस में G 23 ग्रुप का हिस्सा थे यानी जिन नेताओं ने स्थायी कांग्रेस अध्यक्ष की डिमांड के साथ गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल के नेतृत्व में सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी, जितिन प्रसाद भी उनमें से एक थे.

सिंधिया और जितिन प्रसाद के मामले में कांग्रेस से बगावत की बात करें तो ये दोनों को ही विरासत में मिला हुआ है. सिंधिया के पिता माधव राव सिंधिया ने जहां कांग्रेस छोड़ कर अपनी पार्टी ही बना ली थी, वहीं जितिन के पिता जितेंद्र प्रसाद ने तो कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान सोनिया गांधी को ही चैलेंज कर दिया था.

जी 23 के पत्र के बाद से सोनिया एक एक कर सारे नेताओं को ठिकाने लगाने में जुटी हुई हैं - और यूपी से उठा कर जितिन प्रसाद को पश्चिम बंगाल भेजे जाने के पीछे भी उनका चिट्ठी पर हस्ताक्षर ही रहा.

पश्चिम बंगाल चुनाव में भेजे जाने से पहले जितिन प्रसाद यूपी में ब्राह्मणों को राजनीतिक तौर पर कांग्रेस के पक्ष में एकजुट करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन चिट्ठी के कारण कांग्रेस नेतृत्व की नजर में चढ़ गये. सोनिया गांधी ने एक तरीके से बगावत पर उतर आये कांग्रेसियों को जहां तहां डम्प करने की कोशिश की है - शशि थरूर और कपिल सिब्बल को तो महत्व देना ही खत्म कर दिया है. गुलाम नबी आजाद की ताकत को देखते हुए किसी न किसी कमेटी में सोनिया गांधी ने उलझाये रखा है. ऐसा करके सोनिया गांधी ने राहुल गांधी के प्रति पैदा हुए विरोध को खत्म करने की कोशिश कर रही हैं.

लेकिन किस्मत को कौन टाल सकता है भला. राहुल गांधी के दोबारा अध्यक्ष बनने में विरोध की नौबत न आ जाये ये सोच कर सोनिया गांधी चुन चुन कर बागी कांग्रेस नेताओं को न्यूट्रलाइनल करने की कोशिश में हैं. जितिन प्रसाद को भी पश्चिम बंगाल भेजे जाने के पीछे यही मकसद रहा होगा, लेकिन वो लौट कर अब बीजेपी की तरफ से यूपी चुनावों की तैयारी कर रहीं प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए नये सिरे से मुसीबत बनने जा रहे हैं.

2019 के आम चुनाव के दौरान नहीं जितिन प्रसाद के बीजेपी में जाने के काफी चर्चे थे, लेकिन फिर मालूम हुआ कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने जैसे तैसे मना लिया था. तब के कांग्रेस के कैंपेन पर ध्यान दें तो गूगल पर तस्वीरें भरी पड़ी हैं जिनमें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के अगल बगल ज्योतिरादित्यना सिंधिया ही नजर आते हैं, लेकिन आने वाले चुनाव में ये दोनों ही अब हर मोड़ पर आमने सामने मिलेंगे.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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