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Updated: 06 जून, 2022 06:23 PM
सरिता निर्झरा
सरिता निर्झरा
  @sarita.shukla.37
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नित नयी बहस वाया लैप मिडिया (गोदी मिडिया- सबकी अपनी अपनी गोद है) गरमा गरम हम सबके ड्राइंग रूम की शोभा बढाती है. अब आप पर्यावरण की ऐसी तैसी करने के बाद हाय हाय गर्मी, उफ़ गर्मी का राग अलापे तो अलापे टीवी वाले अपने लक्ष्य और लक्ष्मी पर नज़र गड़ाए आप तक गरमा गरम मुद्दे लाये जा रहे है. जस्ट लाइक भजिया विथ तीखी चटनी. और आप भी भजिया को चटनी में डूबा डूबा कर मजे ले रहे हैं बिना ये जाने की इस भजिया में MCM मिलाया हुआ है. MCM मतलब माइंड चेंजिंग मसाला. इसकी तासीर थोड़ी कम कट्टर मतलब थोड़ी कड़वाहट वाली मीठी सी होती है. इसकी कुछ चुटकी का स्वाद अभी हाल में वाया ड्राइंग रूम हमारे दिमाग में आया हालांकि कईयों को मकसद समझ नहीं आया होगा.

MCM मतलब माइंड चेंजिंग मसाला - स्ट्रैटेजिक डायरेक्शन चेंज

हालिया आरएसएस प्रमुख का कहना कि खबरदार हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग की तलाश क्यों और ज्ञानवापी का इतिहास था जिसे बदला नहीं जा सकता. आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा की अब कोई और आंदोलन नहीं बल्कि व्यक्ति निर्माण पर तवज्जो दी जाये. साथ ही यह भी इशारा किया कि मुस्लमान भी आखिर थे तो हिन्दू ही! आतताइयों ने उन्हें परिवर्तित कर दिया तो इसमें उनका क्या कसूर ? हमे किसी से जीतना नहीं है बल्कि सबको जोड़ना है तो हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों ढूंढना?

अब उनका इतना कहना और बहस का मुद्दा बन गया. जलते तवे पर पानी की बून्द सरीखे सब छन छन करते हुए घूमे पर श्रद्धेय मोहन भगवत जी की बात को काटे कौन? मुद्दे में आप उलझे रहे और यहां चुटकी भर MCM - माइंड चेंजिंग मसाला को चाय के साथ परोस दिया गया. एसी वाले ठंडे कमरे में बैठ कर MSM के प्लान को क्या ही खा कर समझेंगे हम और आप. MSM यानि मोहन शाह मोदी -गोल्डन ट्रायंगल है जी!

अभी ये बहस रुकी नहीं थी कि नूपुर शर्मा जी और नवीन जिंदल (पैसे वाले नहीं वरना निकालना ज़रा कठिन होता! बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया !) ने अल्ला जी की शान में गुस्ताखी कर दी. अज़ान की आवाज़ और घंटी की ध्वनि तक तो ठीक था लेकिन सीधे अल्लाह जी को उँगली दिखा दी?

न न न गल्त समझ रिये हो और अब तक गल्त ही समझते आये हो. बीजेपी जानती है कि, 'भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और एक पार्टी के तौर पर किसी भी धर्म के बेज्जती बर्दाश्त नहीं की जाएगी!' तो ये दो अति उत्साही हिन्दू धर्म के संरक्षकों के कारनामे पर जश्न मनाने और उनकी तारीफ करने की बजाय उनको पार्टी से कर दिया बेदखल! बताओं जरा दिल में हौल उठ रहे!

कानपुर पत्थरबाजों की शिनाख्त हो या बुलडोज़र चलाना हो या फिर ये दूसरे धर्मो की बेइज्जती करने वाले मोड़ी-मोड़ा पर फैसला,हमाये भाजपा में तुरत फुरत फैसला होवे है. अब तुमको बल्लियन उछलना है तो उछलो की ईरान अरब तुर्की अलान फलान मोदी जी को धमकाए. दिस इस स्ट्रैटेजी. थोड़ा सॉफ्ट होना तो मांगता है न और बाकि तो बुलडोज़र, एंटी नेशनल एक्ट है ही और ये भी तो सोचो की अल्ला जी की शान में गुस्ताखी पर, दो को बाहर का रास्ता दिखाया तो महादेव जी की शान में गुस्ताखी होने पर सेम रूल विल बी फ़ॉलोड? या तो बाहर या सीधे अंदर!

अब सवाल उठता है की मुद्दों के नीचे आखिर हो क्या रिया है? जेठ महीना गर्मी सर चढ़ गयी या फिर मिशन 2024 का शुभारम्भ कर दिया गया है?

इन दोनों ही मुद्दों पर गर्मागर्म बहस घर घर छिड़ी है. कोई कहता की आरएसएस ने सत्ता तक लाने के लिए इतने आंदोलन किये अब वो चाहता है कि कुछ दिन तो सत्ता की रोटी खाय के ठंडा पानी पीवें तो कोई कहता है भइये ये सब स्ट्रैटेजी हैं. इस स्ट्रेटेजी के फोकस में है मिशन 2024! तेल की दरकार रहेगी ही और विश्व स्तर पर समस्याओं में अपने को स्पोर्ट मांगता तो इस के लिए अज़ान भजन टाइप्स इंटरनल इशू को इतनी इम्पोर्टेंस न मिले की शेख वेख का फोन वोन आ जाये ! तो ले लिया गया क़ुरबानी का फैसला.

बी प्रैक्टिकल इतने सेंटी हो कर डायलॉग न मारो की मोदी जी झुक गए और भारत काहे मांगे माफ़ी बीजेपी की गलती पर. अल्लाह जी की इज्जत इज्जत और हमरे महादेव? सुनो पत्थर वत्थर भी मार ही लिए हो तो इत्ता समझ ल्यो की रहोगे यहीं! अरबी वरबी बच्चियों को ब्याह के भले ले जाये तुमको रोटी न पूछेंगे और अल्लाह जी के अलावा और कहीं न देंगे साथ. तो समझो की की मख्खन की नरमी आयी क्यों है.

स्ट्रैटेजी के तहत - हे पार्थ करो बेदखल और साध लो एक तीर से कई निशाने

1- बाहरी ताकतों को बे वजह किसी छोटे मोटे मोहरे की बलि दे कर तुष्ट - तुष्ट नहीं स्ट्रेटेजिक सैटिस्फायिंग स्टेप

2- अंदर वाले कुछ लेफ्ट, कुछ मिडल (ढुलमुल ) वाले हिन्दुओं को बताना "ब्रो वी आर नॉट दैट कट्टर "

3- राइट विंग वाले हिन्दू को बताना की " भाई देश है तो हम है- सत्ता नहीं केवल राम और राज्य कायम रहे मतलब रामराज्य इन फोकस.'

हैं जी, सही है न अब बमुश्किल डेढ़ साल रह गए है 2024 आने में. ऐसे में छोटे मोटे बलिदान तो देते रहेंगे. पर्दे के पीछे क्या हो रहा न तुमको खबर न हमे हैं पता. तो बढ़ते दामों और घटते रोज़गार के बीच तुम गरमा गरम बहस करों.

भजिया खाओ विद माइंड चेंजिंग मसाला

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लेखक

सरिता निर्झरा सरिता निर्झरा @sarita.shukla.37

लेखिका महिला / सामाजिक मुद्दों पर लिखती हैं.

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