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Updated: 04 मई, 2019 03:41 PM
हिमांशु सिंह
हिमांशु सिंह
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जब से जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ग्लोबल आतंकी घोषित किया है, पाकिस्तान समेत दुनियाभर के तमाम आतंकियों को अचानक उससे जलन होने लगी है. सही भी है. आतंकवादी दोस्त का एनकाउंटर हो तो दुख होता है, लेकिन आतंकवादी दोस्त को यूएन अंतर्राष्ट्रीय आतंकी की मान्यता दे दे तो जलन होती है. तो मसूद अज़हर रातोंरात दुनियाभर के तमाम आतंकवादियों के लिए 'शर्मा जी का लौंडा' बन गया है और उन्हें कॉम्प्लेक्स दे रहा है.

कल तक जो मसूद अज़हर भारत-पाकिस्तान और दक्षिण एशिया का लोकल आतंकी था, आज वो यूएन से मान्यताप्राप्त आतंकवादी है. तमाम बड़े आतंकी ग्रुप उसे अपने यहां ग्रुप सीईओ जॉइन करवाना चाहते हैं. अब ये उसके मूड पर है कि ऑफर एक्सेप्ट करे या दुनियाभर में अपने जैश-ए-मोहम्मद के आउटलेट खोले. जहां भी जाएगा, खूब झंडे गाड़ेगा.

मसूद अजहर, जैश ए मोहम्मद, आतंकवाद, पाकिस्तानऐसे तमाम कारण हैं जो बता रहे हैं कि मसूद अजहर ने दुनिया भर के आतंकियों को गहरी चिंता में डाल दिया है

खबर ये भी है कि नाइज़ीरिया के बोको हराम वालों ने इसे पर्सनल बेइज्जती मानी है कि इतने खून-खराबे और कत्लेआम के बावजूद उनके एक भी आतंकी को यूएन ने अब तक ग्लोबल आतंकी नहीं कहा. इस बाबत बोको हराम ने अपनी औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है. उनके प्रवक्ता ने कहा है कि. 'ये दुनिया में नस्लभेद का सबसे ताजा उदाहरण है.पूरी दुनिया में अश्वेतों के खिलाफ होने वाला पक्षपात यहां भी मौजूद है.'

खैर, मसूद अजहर को ये मुक़ाम कोई रातोंरात नहीं मिला है. 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड में बतौर फिरौती छूटने के बाद से ही वो एड़ियां घिस रहा था. सच ही कहा गया है कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती. मसूद अज़हर आतंकवाद की दुनिया का कोई 'खान' या 'कपूर' नहीं था कि बैठे-बिठाए सब कुछ हासिल हो गया. अरे वो अपनी फील्ड का मनोज वाजपेयी और नवाज़ुद्दीन है जिसने सालों-साल मेहनत करके ये शोहरत कमाई है. हज़ारों विकेट गिराकर वो आतंकवाद का शेन वॉर्न बना है. कोई बड़ी बात नहीं है कि उसकी शोहरत पाकिस्तान के वज़ीरे आला इमरान खान को भी कॉम्प्लेक्स दे रही हो.

आज वो चरमपंथियों का पोस्टर बॉय और पाकिस्तान आर्मी का लाडला है. हमारे बॉलीवुड को फॉलो करने वाला उनका लॉलीवुड अगर 'मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ' की तर्ज़ पर 'मैं मसूद अज़हर बनना चाहता हूँ' टाइप कोई फ़िल्म बना दे तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी.

खैर, इन तमाम ह्यूमरस बातों के बाद जो सबसे अहम बात है, वो ये है कि अंदर ही अंदर मसूद अज़हर को ये जरूर समझ आ गया होगा कि विश्व राजनीति में वो महज एक प्यादा है, जिसकी जरूरत सही समय पर कुर्बानी के एक बकरे से ज्यादा कुछ नहीं है. 'वास्तव' फ़िल्म के संजय दत्त की तरह उसको भी ये समझ आ गया होगा कि अब उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है. किसी लोकतंत्र में सरकार से बड़ा माफ़िया या आतंकवादी होना किसी एक व्यक्ति की क्षमता से बाहर है. ये तमाम आतंकवादी और सरगना दरअसल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मामूली मोहरे हैं जिन्हें सही समय पर इस्तेमाल करने के लिए पाला जाता है.

बाकी चीन ने मौके पर धोखा देकर इस बार यू एन में अड़ंगा क्यों नहीं लगाया, ये तो खुद पाकिस्तान की समझ से बाहर की बात होगी. ऐसे में हमारी दुआ है कि दहशतगर्दी का नॉबेल, ब्रेनवॉश का ऑस्कर और अशान्ति के निर्वाण की शोहरत पा लेने के बाद मसूद अज़हर को भी जल्द से जल्द उस जन्नत की मौज नसीब हो, इसका लालच दिखाकर वो हज़ारों लोगों को आतंकवाद की राह दिखा चुका है.

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हिमांशु सिंह हिमांशु सिंह @100000682426551

लेखक समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं

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