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Updated: 17 जनवरी, 2022 06:12 PM
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
  @siddhartarora2812
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पड़ोस में एक बालक का मुंह उतरा हुआ था, कारण साधारण था, परिवार के हर मेम्बर से बिचारा गाली खाकर आया था. किसी ने दुत्कार दिया था तो किसी ने मुंह न लगाया था. उदास होना लाज़मी था. मेरे पास आया तो मैंने सोचा लाओ खाली बैठे इसे कहानी ही सुना दें. अच्छा जब कोई नाराज़ होता है न, तब वो मुंह से बहुत कम बोलता और हाथ पैर से ज़्यादा उचरता है. किसी भी उदास शख्स को देखिए, उसके हाथ पांव ऐवें कुछ न कुछ टटोलते दिखेंगे. वो बालक भी मेरे नोटपैड पर स्केच-पेन से कुछ कर रहा था. तो उसका ध्यान वहां से हटाने हेतु, अपना नोटपैड बचाने हेतु, मैंने एक कहानी शुरू की.

'सुन छोटे, ऐसा मेरे साथ भी हुआ था एक बार, मुझे बहुत डांट पड़ी थी. कोई मुझसे बात ही नहीं कर रहा था.'

'फिर आपने क्या किया?' उसकी निगाह मेरी ओर उठी.

'फिर मैंने एक कहानी पढ़ी.'

'फिर वो कहानी पढ़कर सब आपसे बात करने लगे?'

'न न, कहानी तो मैंने पढ़ी थी न, फिर सब मुझसे क्यों बात करते?'

तो फिर आपका मूड ठीक हो गया? अच्छा पहले बताओ कौन सी कहानी पढ़ी?

Hindu, Religion, Sanatan Dharma, Krishna, Story, Kid, Mother, Fatherश्री कृष्ण से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग जो आपकी उदासी को हंसी में बदल देगा

 

'कहानी में एक बहुत शैतान लड़का था, जिसने पड़ोसी की मटकी फोड़ दी थी, नदी में नहाने गईं लड़कियों के कपड़े नदी में डाल दिए थे. अपने से बड़े एक बालक को बहुत धोया था. पड़ोसी के घर से वह मक्खन चुराकर भागा था. यूं समझ छोटे कि पूरे मथुरा की नाक में दम कर दिया था.'

'फिर तो उसकी मम्मी ने उसे बहुत मारा होगा?'

'उसकी मम्मी उसकी शरारतों पर कई बार उसे डांट-पीट चुकी थीं. लेकिन जब भी वो ज़्यादा चिल्लातीं, बालक की सखिया उसे बचा लेतीं. सखियां ज़्यादा शिकायत करतीं तो उसके दोस्त ग्वाले उसका पक्ष ले लेते, आस पड़ोस सब उसपर चढ़ने लगते तो उसके पिता नन्द बाबा उसे कवर कर लेते. मगर इस बार नन्द बाबा घर पर थे ही नहीं और उसकी मां ने मार-कुटाई करने की जगह पहली बार सोशल बाइकॉट कर दिया था.

'ओह, मतलब न डांटा न मारा? फिर तो मजे आ गए होंगे उसके?'

'अरे ऐसे कैसे, आज तेरी मां, तेरे पापा, हम क्रिकेट खेलने वाले तेरे सारे दोस्त, तेरे स्कूल के सब साथी तुझसे बात करनी बंद कर दें तो तेरे मजे आयेंगे?'

'ओह नहीं, तो क्या उसके दोस्त भी नहीं बोल रहे थे?'

'न, कोई भी नहीं. यशोदा आंटी ने सबको वार्निंग दी थी कि कोई भी इस नटखट से जब तक मैं न कहूं बात नहीं करेगा.'

'फिर तो वो लड़का बहुत उदास हो गया होगा, सॉरी सॉरी कहने लगा होगा सबसे?

'न, यही ट्विस्ट है कहानी का, उस बालक की एक ड्यूटी थी कि वो घर की गाय-बकरियों को रोज चराने ले जाता था. वहां जाकर मस्त ऊंचे पेड़ पर चढ़कर सुर में बांसुरी बजाता था.'

'यही वाली, जो आपके पास है?'

'न न, इससे तो बड़ी बांसुरी होती थी उसके पास, मेरे पास तो छोटी सी है.'

'फिर क्या हुआ?'

'फिर ये हुआ छोटे कि कुछ नहीं हुआ. एक दिन बीता, दो दिन बीते, तीन दिन बीते, हफ्ता बीतने वाला हुआ पर उस बालक के चेहरे पर कोई उदासी कोई परेशानी कोई चिंता किसी को नज़र ही न आई'.

'अरे वो कैसे?'

'कैसे छोड़, ये पूछ फिर क्या हुआ?'

'फिर क्या हुआ?'

'फिर ये हुआ कि जो उस बालक को चिंतित देखना चाह रहे थे, वो अब खुद चिंता करने लगे. उसकी मम्मी जिन्हें लग रहा था कि बालक उदास हो जायेगा, वो खुद उदास हो गईं. किसी को समझ ही न आया कि उससे पूछें कैसे कि वो उदास क्यों नहीं है? क्योंकि पूछते तो बात करनी पड़ जाती और बात न करने का तो वचन दिया हुआ था, इन शॉर्ट, जो लोग बालक को सबक सिखाने निकले थे, वो खुद सकते में थे.'

इतना कहके मैं चुप हुआ तो देखा उस छुटकू की बड़ी बड़ी आंखें मेरी तरफ सवाल लिए खड़ी हैं. आंखों से उतरता सवाल मुंह तक आ गया और वो पूछ बैठा

'फिर उन्होंने क्या किया?'

'फिर उस बालक की एक परम सहेली थी, राधा! उससे रहा न गया. वो दोपहर में बांसुरी की धुन का पीछा करते-करते वहीं पहुंच गई जहां वो पेड़ पर बैठा था. उसने देखा गैया मस्त अपना घास चरने में लगी हैं और उसका दोस्त आंख मूंदे बांसुरी बजाने में गुम था. राधा ने डायरेक्ट पूछ लिया, 'ए बंसी वाले, सब तुझसे रूठे हुए हैं, तोहरी अम्मा तोसे बात नहीं कर रही, और तू यहां मस्त मुदित बांसुरी फूंक रहा है? तुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्या हमारे होने न होने से?'

वो बालक मुस्कुराया, बांसुरी साइड रखी और पेड़ से उतरता बोला 'राधे! कैसी बात करती हो? मुझे तो उनका भी ध्यान रहता है जो मेरे अपने नहीं, ये मां, मित्र या सखियां तो मेरे अपने हैं.'

'तो फिर तुझे कुछ बुरा क्यों नहीं लगता रे? तू तो बिल्कुल भी उदास नहीं है.' राधा मुंह बना के बोली.

बालक ने जवाब दिया 'वो सब भले ही मुझसे उदास हों, मैं तो खुद से उदास नहीं. मैंने तो अपनी हर शरारत बहुत आनंदित हो हर शरारत की थी. फिर भला मैं खुद से उदास क्यों होऊं? राधे, किसी का मित्र, किसी का पुत्र, किसी का सखा या किसी का भांजा होने के अलावा मैं खुद का भी तो हूं. अगर मैं खुद का न रहा तो तुम सबका कैसे रहूंगा?

राधा को कोई जवाब न सूझा तो बाल की खाल निकालती पूछने लगी 'अच्छा-अच्छा, फिर भी ऐसा क्या उल्लास रे कि तू बांसुरी बजाता पूरा दिन बिता देता है?'

'ये तो मेरा धर्म है राधे, ये गैया, ये बछड़े अपना आहार पूरा नहीं लेते अगर मैं बांसुरी न बजाऊं, अब भला अपने मन की उथल-पुथल के लिए मैं इनको इनके आहार से क्यों वंचित करूं?'

अब राधा भी मुस्कुरा दी. बोलीं 'चल-चल, इतनी बड़ी-बड़ी बातें करता है, चल यशोदा मां तुझे पुकार रही है, तू तो खुद से उदास नहीं है पर वो तेरे न होने से गुमसुम बैठी है एक सप्ताह से, चल, उसकी मुस्कान तो तेरे सामने होने से ही है.'

'और..' बालक एक पल आंख दबाता बोला '...राधे तेरी मुस्कान?'

राधा बिना कोई जवाब दिए मुस्कुराती हुई जल्दी से वापस दौड़ गई.

मेरे साथ बैठा बालक भी खिलखिला के हंस पड़ा और.... मेरा भी काम हो गया.

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लेखक

सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' @siddhartarora2812

लेखक पुस्तकों और फिल्मों की समीक्षा करते हैं और इन्हें समसामयिक विषयों पर लिखना भी पसंद है.

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