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Updated: 22 जुलाई, 2020 09:33 PM
प्रीति 'अज्ञात'
प्रीति 'अज्ञात'
  @pjahd
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भारतीय एप डेवलपर्स के सामने मौजूदा समय किसी चैलेंज से कम नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान करते हैं, तो इसी बीच चीन से तनाव के चलते टिकटॉक जैसे कई एप बैन कर दिए जाते हैं. अब इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि टिकटॉक एक बेहद लोकप्रियता एप है. तो सवाल यह उठता है कि भारतीय एप डेवलपर्स दुनिया को ऐसे किसी एप की सौगात क्योें नहीं दे पाए हैं. देश के जाने-माने वेब डेवलॅपर एवं एप गुरु इमरान खान (App Guru Imran Khan) बता रहे हैं, एप से जुड़ी वे सारी बातें, जिनसे जुड़े सवाल हर यूज़र के मन में है.

इंस्टाग्राम, टिकटॉक और व्हाट्सएप की सफ़लता का राज़ क्या है?

यूज़र्स को आकर्षित करने के लिए जरुरी है कि नए apps बनाने वाली कम्पनीज़ ग्राहकों की आवश्यकताओं को समझें. उन्हें कुछ ऐसा दें जिसकी वे ज़रूरत महसूस कर रहे हों. आख़िर लोगों का दिमाग़ कैसे पढ़ा जाता है? कैसे आकर्षित होता है यूज़र? जब किसी एप के पॉपुलर होने की बात की जाती है तो इसमें तीन बातें प्रमुख होती हैं.

एप डेवलॅपमेंट- एप, यूज़र्स की आवश्यकताओं को तो पूरा कर ही रहा हो, साथ ही यूज़र फ़्रेंडली भी हो. उसका स्मूथ एक्सपीरिएंस हो. जैसे व्हाट्सएप चलता है पर उसके जैसे अन्य मैसेजिंग एप उतना नहीं चलते. एप्स को लगातार अपडेट भी करते रहना चाहिए. इससे खामियां दूर होती हैं. कोई भी बड़ी कम्पनी इसे आसानी से कर लेती है.

थीम - यदि किसी एक विषय को केंद्र में रखकर एप बनाया जाए तो वह अधिक सफ़ल होता है. जैसे टिकटॉक वीडियो क्रिएशन और इंस्टाग्राम मुख्यतः फोटो के लिए बनाए गए हैं. पॉपुलर एप प्रायः किसी एक विशेष थीम को लेकर ही सफ़लता की पायदान चढ़ते हैं.

प्रॉपर मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग- एप बनाना तो फ़िर भी आसान है लेकिन इसे हरेक तक पहुंचाना बहुत कठिन है. बड़ी कम्पनी यहां जीत जाती हैं. वे एक छोटे से प्रोडक्ट को भी अच्छे से प्रमोट करती हैं. पॉपुलर भारतीय ऐप्स की संख्या बहुत कम है. जैसे शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो BYJU's का बहुत नाम है. इसका विज्ञापन आपको हर जगह सोशल मीडिया, टीवी, अख़बार में देखने को मिल जाएगा. आप किसी बच्चे से भी एजुकेशन एप का नाम पूछें तो वह तुरंत शाहरुख़ ख़ान को याद करते हुए BYJU's का नाम ले लेगा. सारा खेल मार्केटिंग का है. इसकी फंडिंग फेसबुक भी करता है.

App, Tiktok, Imran Khan, Alwar, technology, App Guruपीएम मोदी के साथ एप गुरु नाम से लोकप्रिय अलवर के इमरान खान

 

क्यों मात खा जाते हैं भारतीय एप?

एप बनाना और प्रमोट करना दो अलग बातें हैं. आम आदमी इसे बना सकता है लेकिन प्रमोशन का पैसा कहां से आएगा? अधिकांश भारतीय ऐप्स यहीं मात खा जाते हैं. बड़ी कम्पनी के पास अच्छा खासा बजट होता है. यदि स्टार्टअप या किसी डेवलपर ने उसको बनाया है तो उसे कोई फंडिंग तो मिले. कुल मिलाकर बात यह है कि जितने बड़े स्पांसर्स हों, उतनी ही अच्छी टीम बन जाती है. ख़र्चा बढ़ा दिया जाता है. कंटेंट राइटर भी बिठा दिए जाते हैं. अच्छा विज्ञापन तैयार किया जाता है.

इमरान कहते हैं, 'इंडियन सक्षम नहीं हैं, यह बात मैं नहीं मानता. दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियों में भारतीय ही ये सब बना रहे हैं. दुखद है कि हमारे देश में हमारे ही लोगों की प्रतिभा की उतनी क़द्र नहीं होती. मैं तो फिर भी भाग्यशाली हूं कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने वेम्बली स्टेडियम में मेरा जिक्र किया. यूं उसके बाद भी सब कुछ अपने स्तर पर ही करना होता है. जब सरकार को किसी एप की जरुरत होती है तो अधिकारी मुझसे संपर्क करते हैं.

मैं बिना सरकारी सपोर्ट के, अपने रिसोर्सेज से उन्हें बनाकर दे देता हूं. मुझे ये कार्य करना ख़ुशी देता है. अच्छा लगता है. इसे देश सेवा ही समझिये'.

हम भारतीयों को साइबर सुरक्षा (security) के बारे में जानना और समझना भी आवश्यक है.

कॉन्टेक्ट, गैलरी, लोकेशन और अन्य कई व्यक्तिगत जानकारियां एप के माध्यम से ले ली जाती हैं. ये विवरण टिकटॉक या केवल चाइनीज़ एप ही नहीं, बल्कि सभी लेते हैं. चूंकि हमारे देश के 95 % यूज़र्स को साइबर सिक्योरिटी की जानकारी नहीं है. अतः वे सब ओके करते चले जाते हैं और उन्हें अपनी व्यक्तिगत जानकारी तक पहुंचने की अनुमति दे देते हैं. परिणामस्वरूप वे हैकिंग का शिकार हो जाते हैं.

ऐप्स के मामले में सरकारी हस्तक्षेप कितना होता है?

नियम और दिशा-निर्देश तो सभी कम्पनीज़ फॉलो करती हैं. उसके बाद ही कोई एप बाज़ार में उतारा जाता है. यदि कहीं कोई गड़बड़ी है, तब भी सरकार तभी ही एक्शन ले सकती है जब शिक़ायत होती है. जैसे ज़ूम को लेकर कुछ लोगों ने प्राइवेसी इशू उठाया था, हैकिंग की रिस्क भी कही गई थी. भले ही वो पूरा सच नहीं था. लेकिन ऐसी किसी भी शिक़ायत की पूरी जांच होती है और आवश्यकतानुसार कार्यवाही की जाती है.

टिकटॉक तो पहले भी था लेकिन जब भारत-चीन के बीच तनाव हुआ तो इसका विरोध जोर पकड़ने लगा. सामान्य तौर पर सरकार अगर प्रमोट नहीं करती तो डिमोट भी नहीं करती। जिसका जैसा चल रहा है, चलता है.

प्रतिस्पर्द्धा का खेल

हर क्षेत्र की तरह यहां भी प्रतिस्पर्द्धा एक महत्वपूर्ण मुद्दा हैं. जैसे ज़ूम में इतनी परेशानी थी नहीं, जितना दिखाया गया. बड़ी बड़ी कम्पनीज़ आज भी इसे इस्तेमाल कर रही हैं. हुआ यह कि जैसे ही कोरोना महामारी आई और लोगों के पास परस्पर संपर्क का कोई साधन न रहा तो ज़ूम बहुत तेजी से पॉपुलर हुआ. देखते ही देखते इसके यूज़र्स की संख्या बढ़ती चली गई.

ऐसे में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट को तो बुरा लगना ही था क्योंकि अब तक तो वे ही हीरो थे. जब प्रतिस्पर्द्धा की भावना होती है तो अपनी-अपनी लॉबी द्वारा दबाव भी बनाया जाता है. यही हुआ भी. इधर ज़ूम की बुराई शुरू हुई उधर गूगल मीट प्रयोग में आने लगा. आज की तारीख़ में ज़ूम इन सबसे बेहतर है. जो आईटी कम्पनीज़ हैं, वे भी ज़ूम का ही प्रयोग कर रही हैं.

जहां तक 'JIO' की बात है तो फ़िलहाल यह कॉपी के अलावा और कुछ भी नहीं, उस क्वालिटी का भी नहीं. हां, इस बात पर खुश हुआ जा सकता है कि कोई भारतीय एप बाज़ार में उतरा तो सही. लगातार अपडेट से इसमें भी सुधार आएगा, इसकी उम्मीद रखी जा सकती है.

टिकटॉक बंद करने के लिए भारत-चीन तनाव की जरुरत नहीं थी.

यह सच है कि टिकटॉक स्टार लाखों कमाते थे. इससे यदि किसी की प्रतिभा उभर कर आई तो वो हैं हमारे गांव के कलाकार. लेकिन इसके अतिरिक्त इस एप का कोई भी प्लस पॉइंट नहीं था. इमरान स्पष्ट रूप से कहते हैं कि टिकटॉक बंद करने के लिए भारत-चीन तनाव की जरुरत नहीं थी. इसे तो बहुत पहले ही बंद कर देना चाहिए था. इसने युवाओं का फ़ायदे से अधिक नुकसान ही किया है. दसवीं और बारहवीं के बच्चों का समय बहुत क़ीमती होता है. टिकटॉक ने उसे बर्बाद कर दिया.

अफ़सोसजनक भाव के साथ वे आगे कहते हैं कि भारत की बर्बादी की अगर कभी कोई कहानी लिखी जाएगी तो उसके तीन कारण होंगे - क्रिकेट, सोशल मीडिया और थर्ड क्लास पॉलिटिक्स. गांव, गली में हर जगह पचासों बच्चे क्रिकेट खेलते मिल जाएंगे पर ये कबड्डी नहीं खेल सकते हैं. इनके शरीर ही इतने मज़बूत नहीं. सब ग्लैमर की तरफ़ भागते हैं. इधर सोशल मीडिया ने भी सभी सीमाओं को लांघ दिया है. सेंसरशिप कहीं है ही नहीं. वेबसीरीज़ की हालत तो इससे भी बदतर है. गंदी राजनीति तो हम सब देख ही रहे हैं.

अपने यहां भाई भतीजावाद में प्रतिभा (talent) दब जाती है. उस पर रचनात्मकता (creativity) से ज्यादा जोर अंकों (marks) पर है. अमेरिका में भी ड्रॉपआउट होते हैं लेकिन देखिये जो ग्रेजुएट भी नहीं, वे गूगल में जॉब कर रहे हैं. कारण यही कि वहां डिग्री से अधिक कार्य-कौशल (skill) की महत्ता है.

(अलवर निवासी इमरान ख़ान, वेब डेवलॅपर एवं एप गुरु हैं. उन्होंने 80 शैक्षिक मोबाइल अनुप्रयोग (Mobile Apps) और सौ से अधिक वेबसाइट विकसित की हैं जिनका प्रयोग निःशुल्क है. वे नवंबर 2015 से तब चर्चा में आए, जब वेम्बली स्टेडियम, लंदन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने भाषण में उनका उल्लेख किया. उन्होंने कहा था कि 'मेरा भारत, अलवर के इमरान खान में बसता है'. हाल ही में उन्होंने मॉरीशस सरकार के अनुरोध पर वहां के बच्चों के लिए एजुकेशनल एप बनाया है, जिसे वहां के प्रधानमंत्री लॉन्च करेंगे.)

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लेखक

प्रीति 'अज्ञात' प्रीति 'अज्ञात' @pjahd

लेखक ब्लॉगर और 'मध्यांतर' की ऑथर हैं

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