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Updated: 14 जुलाई, 2022 01:32 PM
सुशोभित सक्तावत
सुशोभित सक्तावत
  @sushobhit.saktawat
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कल से मुझे बारम्बार एक फ़िल्म का शीर्षक याद आ रहा है, जो अपने समय में बहुत चर्चित हुआ था- बेंड इट लाइक बैकहेम. यह फ़िल्म तब आई थी, जब इंग्लैंड के डेविड बैकहेम दुनिया के बड़े लोकप्रिय फ़ुटबॉलर थे. वे अपनी घुमावदार फ्री-किक के लिए चर्चित थे. तब सबकी यह ख़्वाहिश रहती थी कि वैसी ही ख़ूबसूरत फ्री-किक मारें, जो लहराती हुई गोलचौकी में समा जाए. लेकिन कल सुबह जब नासा ने जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की पहली सनसनीख़ेज़ तस्वीर जारी की तो मेरे ज़ेहन में एक वाक्य गूंजने लगा- बेंड इट लाइक आइंश्टाइन. लेकिन आइंश्टाइन तो फ़ुटबॉलर नहीं थे, तब फ्री-किक लगाने का प्रश्न ही नहीं उठता? फिर भी उस अनुगूंज की एक वजह है. कल जब जेम्स वेब की डीप फ़ील्ड इमेज जारी की गई तो तमाम साइंटिस्टों- नील डीग्रास टायसन से लेकर मिचियो काक्यू और ख़ुद नासा के प्रेस-रिलीज़ जारी करने वाले अकादमिशियनों की ज़ुबां पर एक ही शब्द था- ग्रैविटेशनल लेंसिंग. यह कल के टॉप ट्रेंडिंग शब्दों में से एक था. कल यह इंटरनेट पर सर्वाधिक खोजे गए शब्दों में भी शुमार रहा.

Space, Nasa, Viral Photo, Earth, Science, technology, Earth, America, Sunवेब टेलीस्कोप  द्वारा ली गयी आकाशगंगा समूह की इमेज

जब आप डीप फ़ील्ड इमेज को ध्यान से देखते हैं तो वहां आपको असंख्य मंदाकिनियां (गैलेक्सी) और नीहारिकाएं (नेब्युला) तो दिखती ही हैं, हमारी अपनी आकाशगंगा के सितारे भी टिमटिमाते दिखते हैं, लेकिन साथ ही कुछ ऑब्जेक्ट्स ऐसे भी नज़र आते हैं, जो स्ट्रेच्ड-आउट हैं, जो खिंच गए से मालूम होते हैं. ऐसा लगता है जैसे वो बेंड हो गए हों, मुड़ गए हों.

वास्तव में ऑब्जेक्ट्स बेंड नहीं हुए हैं, उनकी लाइट बेंड हुई है, जिससे ग्रैविटेशनल लेंसिंग का इफ़ेक्ट पैदा होता है. क्योंकि लाइट जब बेंड होती है तो उसे बेंड करने वाले ऑब्जेक्ट के पीछे के दृश्य को मैग्नीफ़ाय भी कर देती है. और इस बात को सबसे पहले किसने पहचाना था- जब जेम्स वेब तो क्या हबल स्पेस टेलीस्कोप भी अपने अवतरण से बीसियों वर्षों के फ़ासले पर थी और अंतरिक्ष में दूर तक झांकने वाली वैसी किसी दूरबीन की कल्पना भी नहीं की गई थी?

जी हां, हमारे अपने अल्बर्ट आइंश्टाइन साहब ने, जिनके लिए इस लेख के आरम्भ में बेंड इट लाइक आइंश्टाइन की संस्तुति की गई है. सौ से भी ज़्यादा साल पहले, 1915 में अल्बर्ट आइंश्टाइन ने जनरल रेलेटिविटी का प्रतिपादन किया था, जिसमें यह चकित कर देने वाला दु:साहसपूर्ण पूर्वानुमान था कि विशालकाय ऑब्जेक्ट्स की ग्रैविटी स्पेसटाइम के फैब्रिक को डिस्टॉर्ट (विरूप) करती है और लाइट को बेंड होने को मजबूर कर देती है.

वो न्यूटोनियन ज़माना था, जब चीज़ें एब्सोल्यूट की भाषा में सोची जाती थीं. आइंश्टाइन ने उसमें रेलेटिव का सूत्रपात कर दिया था. परम अब सापेक्ष हो जाना चाहता था. इसे स्वीकारना कठिन था. क्योंकि भला लाइट कैसे बेंड हो सकती है? तब साल 1919 में इंग्लैंड के वैज्ञानिक आर्थर एडिन्गटन ने एक प्रयोग किया और आइंश्टाइन को सही साबित कर दिया. 29 मई 1919 को घटित हुए पूर्ण सौर ग्रहण की उन्होंने तस्वीरें खींचीं और सूर्य के आसपास के क्षेत्रों में स्थित सितारों की पोज़िशनिंग का अध्ययन करके यह प्रमाणित किया कि लाइट बेंड होती है.

अगले साल 1920 में उन्होंने अपना यह रिसर्च-पेपर छपवाया, जिसने आइंश्टाइन को यूरोप में सुपर-सितारा बना दिया. न्यूटोनियन यूनिवर्स ध्वस्त हो चुका था और अब हम आइंश्टाइन के संसार में प्रवेश कर चुके थे. ब्रिटेन में तब अनेक लोगों ने एडिन्गटन को देशद्रोही से कम नहीं समझा था, क्योंकि पहली लड़ाई अभी-अभी ख़त्म हुई थी, जिसमें जर्मनी इंग्लैंड का शत्रु था. और एडिन्गटन ने एक जर्मन वैज्ञानिक (आइंश्टाइन) को एक ब्रिटिश महानायक (न्यूटन) के ऊपर बिठालने की गुस्ताख़ी कर दी थी.

लेकिन तब से अब तक हम आइंश्टाइन के ही यूनिवर्स में जी रहे हैं- फिर चाहे ग्रैविटेशनल वेव्ज़ हों, वर्महोल्स की परिकल्पनाएं हों, टाइम डाइलैशन हो या ग्रैविटेशनल लेंसिंग. यह जो ग्रैविटेशनल लेंसिंग है, यह आइंश्टाइन रिंग भी कहलाई है. देखें तो आइंश्टाइन के बाद वाला यूनिवर्स किसी अजायबघर से कम नहीं है, जिसमें अजीबो-ग़रीब चीज़ें घटित हो सकती हैं. पोस्ट-आइंश्टाइन यूनिवर्स का जो एस्ट्रोफ़िज़िसिस्ट है, वो भी अब किसी मिस्टीक या रहस्यदर्शी से कम नहीं है.

कल जब डीप फ़ील्ड इमेज जारी की गई तो वह मनुष्यता के इतिहास में अब तक की सबसे सुदूर और सबसे स्पष्ट तस्वीर थी. देखें तो जैसे एक गॉड्स आई नेब्युला है, उसी तरह से मनुष्यों ने अपनी एक दूरदर्शी आंख अंतरिक्ष में स्थापित कर दी थी, जो समय के परे देख सकती है. जब हम स्पेस में दूर तक देखते हैं तो ठीक उसी दौरान हम समय में बहुत पीछे तक भी झांकते हैं, क्योंकि स्पेस और टाइम दो अलग चीज़ें नहीं, वे गुंथी हुई हैं- इंटरट्वाइन्ड हैं- यह भी आइंश्टाइन की ही स्थापना थी.

डीप फ़ील्ड इमेज के माध्यम से कल हमने 13 अरब साल पीछे तक झांककर देखा- सृष्टि की उत्पत्ति की लगभग दहलीज़ तक. इससे पहले भी हबल स्पेस टेलीस्कोप से तस्वीरें आती रहती थीं, लेकिन जेम्स वेब से आई तस्वीरें हायर-रिज़ोल्यूशन की हैं. कह लीजिये कि ये अल्ट्रा एचडी इमेजरी है. गोया कि अभी तक साइंस की नज़रें कमज़ोर थीं, कल उसने बढ़िया लेंस वाली ऐनक पहन ली और अब वो बहुत दूर तक देख सकता है.

डीप फ़ील्ड इमेज में जो चीज़ स्पेसटाइम के कर्वेचर को वार्प कर रही है, वह गैलेक्सी क्लस्टर SMACS 0723 है- वोलन्स के तारामण्डल में स्थित कोई 5.12 अरब प्रकाश-वर्ष दूर मंदाकिनियों का एक गुच्छा. इसे हबल ने पहले देख लिया था, जेम्स वेब ने इसको और साफ़ दिखलाया है.

इसके बाद जेम्स वेब ने चार और दर्शनीय तस्वीरें जारी कीं, जिनमें कारिना नेब्युला की कॉस्मिक क्लिफ्स थीं, स्टीफ़ेन्स क्विन्टेट कहलाने वाली पांच गैलेक्सीज़ की अंत:क्रियाएं थीं और सदर्न रिंग प्लैनेटरी नेब्युला के विविधवर्णी रंग थे... लेकिन अभी तो ये शुरुआत भर है. सत्रहवीं सदी में गैलीलियो और न्यूटन ने आरम्भिक टेलीस्कोप बनाई थीं, वह यात्रा हबल से होते हुए अब जेम्स वेब तक चली आई है- जो हमें और सुदूर, और गहरे देखने को पुकार रही है.देखने की तृष्णा कदाचित् इसी को कहते होंगे!

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लेखक

सुशोभित सक्तावत सुशोभित सक्तावत @sushobhit.saktawat

लेखक इंदौर में पत्रकार एवं अनुवादक हैं.

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