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Updated: 14 अप्रिल, 2017 03:33 PM
प्रियंका ओम
प्रियंका ओम
  @priyanka.om
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ओल्ड एज होम का ज़िक्र आते ही नई पीढ़ी के प्रति हमारा मन घृणा से भर जाता है. हम उन्हें कोसने लगते हैं कि 'ईश्वर ऐसा बेटा किसी को ना दे! इससे तो अच्छा है बेटा हो ही ना!' और यही सोच बेटा चाहने के पीछे की मानसिकता "बुढ़ापे का सहारा" को दर्शाता है. सृष्टि के निर्माण से आजतक बुढ़ापे का डर हमारे चेतन अवचेतन मन में कहीं न कहीं बना रहता है इसलिये आज भी बेटा पाने की इक्षा उतनी ही व्यावहारिक है जितनी सदियों पहले थी.

लेकिन क्या ओल्ड एज होम वाकई हमारे बेटे भेजते हैं या किसी और की बेटी ? सच तो ये है कि कहीं न कहीं वजह हम खुद हैं, क्योंकि हम नई पीढ़ी के साथ एडजस्ट नहीं कर पाते.

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भेजता कोई भी हो लेकिन वक्त आ गया है बदलते हुए समय में ओल्ड एज होम के प्रति नजरिया बदलने का. ठीक वैसे ही जैसे हमने क्रेच को अपनाया था. तेजी से भागते हुए वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिये जब हम अपने छोटे से बच्चे को किसी और के हवाले क्रेच में छोड़ सकते हैं तो बुजुर्ग मां-बाप को ओल्ड एज होम में क्यों नहीं ?

अगर मेरे नजरिये से देखें तो हमें भारत में ओल्ड एज होम की परम्परा का स्वागत खुले दिल से करना चाहिये और बढ़ावा देना चाहिये, इसलिये नहीं कि अपने पति के मां बाप को वहां भेज सकें बल्कि इसलिये कि हमारा बुढ़ापा आनन्दमय हो.

विदेशों की नकल में हमारी आम जिंदगी का लगभग 60% विदेशीकरण हो चुका है, लेकिन ओल्ड एज होम का ज़िक्र आते ही हम ऐसे बर्ताव करने लगते हैं जैसे वेश्यालय की बात हो. हमारा मन कसैला हो जाता है. कई बार हम घृणा से भर जाते हैं, तो कई बार करुणा से.

शहर छोटा हो या महानगर, नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी एक दूसरे के साथ एडजस्ट नहीं कर पाती है. घर में कलह का माहौल रहता है. वे साथ रहते हुए भी एक दूसरे के साथ नहीं होते. बुज़ुर्ग अपने आप को थोड़ा भी नहीं बदलना चाहते, लेकिन नई पीढ़ी से चाहते हैं कि वो उनके तरीके से चले. लेकिन आज की नई पीढ़ी समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है. इनके पास पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं है क्योंकि सामने अनगिनत जरूरतें मुंह बाये खड़ी होती हैं.

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कुछ साल पहले जब मैं भारत आई थी तो एक जून की दोपहर मेरे दरवाजे पर खट-खट हुई. मैंने दरवाजा खोला तो सामने पड़ोस वाली आंटी बदहवास खड़ी थीं. बेटा देखो न अंकल को क्या हो गया. मैं उनके घर गई तो अंकल बुरी तरह से तड़प रहे थे. मैंने उन्हें तुरंत किसी तरह ग्लूकोज पिलाया और उन्होंने अंतिम सांस ली. अंकल रिटायर्ड थे और वो दोनो अपने फ्लैट में अकेले रह रहे थे. उनके दोनों बच्चे अलग-अलग शहर में रहते थे.

वो वाकया कई दिनों तक मेरे दिमाग में बबंडर की तरह घूमता रहा. बुजुर्ग अकेले क्यों रहते हैं ? हम क्यों इनके साथ एडजस्ट नहीं कर पाते ? क्या मैं भी नहीं कर पाउंगी ? जैसे सवाल मेरे दिमाग में चक्कर काटते रहे.

वो अंकल रोज शाम सोसायटी में होने वाली बुजुर्गों की बैठक का अहम हिस्सा थे. हां, आंटी कभी किसी से बात नहीं करती थीं. इनका मन अपने बच्चों के साथ नहीं लगता था इसलिये अकेले रहते थे.

आंटी ने कहा उनके बच्चों की जिंदगी बहुत व्यस्त है. उनके पास हमारे लिये टाइम नहीं है. बहुएं भी जॉब करती हैं. बच्चे स्कूल से आकर ट्यूशन चले जाते हैं. वो कभी-कभी उधर से खाकर आते हैं और कभी कभी पिज़्ज़ा का टुकड़ा खा कर सो जाते हैं. हमारा उतने से कुछ नहीं होता. बहु को कुछ भी कहो तो सुनती नहीं.

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ये शिकायतों का एक तरफा पुलिंदा था. सच तो ये है कि बुजुर्ग नई पीढ़ी के साथ जरा भी एडजस्ट नहीं करते. तब शुरू होती है समस्याएं और नई पीढ़ी को बुजुर्ग बोझ लगने लगते हैं. बुजुर्ग नई पीढ़ी पर अपनी उम्मीदों और समझ का इतना बोझ डाल देते हैं कि वो दर्द से तिलमिला उठते हैं. वो जब तक जीवित रहते हैं बच्चों को स्वतंत्रत नहीं होने देना चाहते क्योंकि उन्हें खुद से ज़्यादा समझदार नहीं समझते.

मेरे पड़ोस में एक बुज़ुर्ग दम्पत्ति रहते हैं. कई महीने अकेले रहते राहते जब थक जाते हैं तब पास के ही एक शहर में अपने बेटे के पास चले जाते हैं. लेकिन हमेशा ही समय से पहले लौट आते हैं. पूछने पर आंटी कहती हैं 'बहू बात नहीं मानती है. अपने मन की करती है. मुझे शाम की चाय चार बजे चाहिये वो कहती है चार बजे तो दोपहर होती है इसलिये वो 6 बजे पीती है'. मैंने पूछा- तो आप खुद क्यों नहीं बना लेती हैं? 'मुझे उसके किचन में कुछ नहीं मिलता है,  पाता नहीं क्या कहां रखती है.' एक बार उनकी बहू से बात हुई. 'अम्मा को शाम की चाय दोपहर में चाहिये. उस वक्त मैं बच्चों को लेकर सोती हूं. वो खुद से नहीं बनातीं, मुझे उठा देती हैं. कहती हैं तुम्हारे यहां भी आकर खुद से चाय बनाकर पियूंगी तो वहीं ठीक थी. एक दो दिन चलता है लेकिन हमेशा बहुत मुश्किल है.'

इस तरह की पचास प्रॉब्लम दोनों के बीच थीं जिसका कोई स्थाई निदान नहीं था. लेकिन आंटी और अंकल को आये दिन कुछ न कुछ शारीरिक समस्याएं होती रहती हैं.

मुझे लगता है ऐसे में ओल्ड एज होम से बेहतर कोई उपाय नहीं है. अपनी संतुष्टि के लिए एक दिन मैं ओल्ड एज होम गई. वहां कई बुजुर्गों से मिली. ज्यादातर का यही कहना था कि बेटे के साथ या अकेले रहने से बेहतर यहां रहना है. यहां आने के बाद मुझे मेरे बच्चों से कोई शिकायत नहीं. लगता है जिंदगी लौट आई है. बच्चे मिलने आते रहते हैं.

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एक अंकल ने कहा जितना वक़्त वो पूरे एक साल में साथ रहते हुए नहीं दे पाए उससे ज़्यादा वक्त यहां आकर दे जाते हैं. यहां आजादी है अपने मन की कहने की, वहां सुनने वाला कोई नहीं था. असल में किसी को हमारी जरूरत नहीं थी. वो अपनी जिंदगी में मस्त हैं, मैं अपनी जिंदगी में. यहां पुरानी बातें याद करते हुए सब साथ में चाय पीते हैं, वहां बात करने के लिए भी तरस जाते थे. उनके पास वक्त नहीं था. वहां अकेलेपन था, यहां अकेले कभी नहीं होते.

मैंने अपने पति से कहा 'सुनो, जब हम बूढ़े हो जायेंगे तब हम भी ओल्ड एज होम में ही रहेंगे!'

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लेखक

प्रियंका ओम प्रियंका ओम @priyanka.om

लेखक कहानी संग्रह 'वो अजीब लड़की' की ऑथर हैं

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