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Updated: 24 फरवरी, 2017 06:22 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
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किसी भी फिल्म को लेकर सेंसर बोर्ड की अपनी राय हो सकती है, अपनी समझ हो सकती है, सही बात है, लेकिन उस राय को आधार बनाकर फिल्म को बैन कर देना कितना सही है?

ताजा मामला है फिल्म 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' का, जो छोटे शहर की चार महिलाओं की यौन इच्‍छाओं पर आधारित है. इस फिल्म के निर्माता हैं प्रकाश झा और निर्देशक हैं अलंकृता श्रीवास्तव, जिन्होंने फिल्म में महिलाओं के इस अनछुए लेकिन वास्तविक पहलू को दर्शाने की कोशिश की है. लेकिन सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को सर्टिफिकेट देने के बजाए बैन ही कर दिया.

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यहां ये बताना भी जरूरी है कि फिल्म को मुंबई फिल्म फेस्टिवल में काफी सराहना मिल चुकी है, (मुंबई फिल्म फेस्टिवल में फिल्मों को दिखाने के लिए किसी सेंसर सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती). यहां तक कि मामी फिल्म फेस्टिवल में तो इस फिल्म को जेंडर इक्वैलिटी पर आधारित बेस्ट फिल्म के अवार्ड से भी नवाजा गया और टोक्यो इंटरनेश्ल फिल्म फेस्टिवल में भी इस फिल्म को 'स्प्रिट ऑफ एशिया' अवार्ड दिया गया.

महिलाओं और उनकी यौन कल्पनाओं पर आधारित इस फिल्‍म को बैन करने की जो वजह सेंसरबोर्ड ने दीं, वो इस प्रकार हैं-

- इसमें सेक्सुअल सीन्स हैं.

- फिल्म में गालियां हैं.

- ऑडियो पोर्नोग्राफी है.

- समाज के एक खास वर्ग का कुछ संवेदनशील हिस्सा है.

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तो इन्हीं वजहों को एक-एक करके समझना और समझाना भी जरूरी है.

- क्या महिला प्रधान फिल्में सिर्फ महिलाओं पर अत्याचार, रेप, अनके संघर्ष और प्रतिशोध पर ही आधारित होनी चाहिए. फिल्म अगर महिलाओं की यौन कल्पनाओं पर आधारित है तो उसमें क्या गलत है? महिलाओं को जब फिल्मों में सेक्स ऑब्जेक्ट बनाया जाता है, तब सेंसरबोर्ड को सब स्वीकार्य होता है, लेकिन जब महिलाओं की सेक्स इच्छाओं की बात आती है तो... तो बर्दाश्त नहीं होता.

- फिल्म में सेक्सुअल सीन्स हैं तो? क्या इससे पहले हमने कोई ऐसी फिल्म नहीं देखी जो सेंसर बोर्ड से पास हुई हो और जिसमें सेक्सुअल सीन्स या बेडरूम सीन्स न हों? हम 1984 में आई उत्सव देख चुके हैं, 2004 में मर्डर, 2014 में जिस्म 2, 2012 में हेट स्टोरी, क्या था इनमें ?

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- फिल्म में गालियां हैं तो... सेंसर बोर्ड वो हमें कई बार कई फिल्मों में सुनवा चुका है. बैंडिट क्वीन, सत्या, डेल्ही बैली, इश्किया, गैंग्स ऑफ वसेपुर जैसी फिल्मों ने गालियों का अच्छा ज्ञान परोसा था, पर तब कैंची चलाना क्यों भूल गया था सेंसर बोर्ड ?

- ऑडियो पोर्नोग्राफी वो आवाजें जिनसे कामुकता प्रदर्शित होती है, तो मुझे याद आती है फिल्म डर्टी पिक्चर, जिसकी शुरुआत ही ऑडियो पोर्नोग्राफी से थी. उसे तो नहीं काटा गया.

- समाज के एक खास वर्ग के बारे में सोचकर सेंसरबोर्ड ने अपनी संवेदनशीलता तो दर्ज की, जिसे बोर्ड की अच्छी बात कहा जा सकती है, लेकिन उन जगहों पर आपत्ति दर्ज की जा सकती थी (कैंची चलाने का अधिकार तो अब नहीं है, सेंसरबोर्ड को). लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे पहले इस खास वर्ग को लेकर कोई संवेदनशील फिल्म रिलीज नहीं की गई हो. पिछले साल मुजफ्फरनजर दंगों पर बनी फिल्म 'शोरगुल' एक उदाहरण है.

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'उड़ता पंजाब' के बाद लगता है सेंसरबोर्ड खुद पर कोई भी इल्जाम लेना नहीं चाहता, लिहाजा उन्होंने सीधे फिल्म को सर्टिफिकेट देने से ही मना कर दिया. आज के निर्देशक कुछ अच्छे सब्जेक्ट पर फिल्में दिखाना चाहते हैं, फ्रीडम ऑफ एक्प्रेशन के तहत उन्हें पूरी आजादी भी है. बोर्ड का काम सिर्फ ये बताना कि ये एडल्ट कंटेंट है, इसके अलावा आपको किसी भी चीज को रोकने का कोई अधिकार नहीं है. ये लोगों को ही सोचने दें कि क्या सही है, क्या गलत है. उन्हें सही लगेगा तो देखें, नहीं लगे तो न देखें. और वैसे भी बॉलीवुड के गंभीर फिल्मकारों को इतनी तो समझ है ही कि वो समाज के सामने क्या पेश कर रहे हैं. जाहिर है ये कोई पोर्न फिल्म नहीं होगी. कितने ही फिल्म फेस्टिवल में चल चुकी है पर अभी तक इससे जुड़ी कोई भी कंट्रोवर्सी सुनने में नहीं आई. 

सेंसर बोर्ड के इस फैसले के बाद जाहिर है कि फिल्म को लेकर कोर्ट में अर्जी लगाई जाएगी, हो सकता है कि उड़ता पंजाब की तरह ये फिल्म भी रिलीज हो जाए, लेकिन जरा तो सोचिए कि आज छिपा क्या है? यू-ट्यूब पर रिलीज़ कर देंगे तो कौन किसे रोक पाएगा ये फिल्म देखने से. तो बेहतर है कि अपने अच्छे और बुरे का निर्णय दर्शकों को ही लेने दिया जाए, सेंसर बोर्ड सिर्फ वही करे जो उसका काम है. रही बात नैतिकता की तो..

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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