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Updated: 06 जुलाई, 2022 01:04 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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चाहे भाजपा नेता नूपुर शर्मा द्वारा रसूल की शान में की गयी गुस्ताखी हो. या फिर फिल्म डायरेक्टर लीना मनिमेकलाई द्वारा काली को सिगरेट पीते हुए दिखाना. लोग विरोध कर रहे हैं. विरोध हो भी क्यों न? जब बात भावना की और उसके आहात होने की हो तो सब कुछ जायज है. मतलब भावना का तो अब ऐसा हो गया है कि, वो कब किस बात पर आहत हो जाए बेचारी खुद आहत होने के पंद्रह मिनट पहले तक नहीं जानती. बाकी इतिहास गवाह है. धार्मिक मुद्दे हमेशा ही विवाद का विषय रहे हैं. विवाद किसी चीज से भी हो सकता है. चिकन से भी, उसकी पैकिंग से भी और अख़बार से भी. हैरत में कोई पड़े, बेहतर है पहले मामले को समझ लिया जाए जिसके तार जुड़े हैं यूपी के संभल से. संभल में तालिब हुसैन नाम के व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तार किया है. तालिब पर आरोप है कि वो हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले अख़बार में लपेट कर चिकन बेचता था और जब पुलिस पहुंची तो उसने पुलिस की टीम पर कथित तौर पर चाकू से हमला किया. 

UP, Sambhal, Chicken, Non vegetarian, Arrest, Police, Goddess, Newspaper, Pictureसंभल के तालिब पर आरोप है कि उन्होंने लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया है

पुलिस ने ये एक्शन लोगों की शिकायत को ध्यान में रखकर लिया है. लोगों का मानना है कि तालिब ने अपने कृत्य से ( देवी देवताओं की फोटो वाले अख़बार में चिकन पैक कर) उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत किया है. 

मामला चूंकि एक धर्म से जुड़ा था इसलिए पुलिस भी हरकत में आई और उसने तालिब हुसैन पर आईपीसी की धारा 153-ए 295-ए, 307 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

मामले में दिलचस्प ये है कि तालिब के पास से देवी देवताओं के चित्र वाले अख़बार का पूरा बंडल प्राप्त किया गया है. तालिब का तर्क है कि उसने ये अख़बार कबाड़ी से रद्दी में ख़रीदे. यदि तालिब के तर्क सही हैं तो सवाल ये है कि क्या उन्हें देश के वर्तमान माहौल का बिलकुल भी अंदाजा नहीं था? 

अब ये तालिब का भोलापन था या ऐसा करने के पीछे कोई और वजह इसका सबसे माकूल जवाब आप और हम नहीं बल्कि तालिब ही दे पाएंगे. लेकिन चूंकि विवाद की सारी जड़ अख़बार है. तो हम इतना जरूर कहेंगे कि अगर एक मुस्लिम द्वारा देवी देवताओं वाले अख़बार के टुकड़े में चिकन पैक करने को बहुसंख्यकों या ये कहें कि हिंदुओं ने गुनाह से अजीम मानते हुए उसे ईशनिंदा करार दिया है. तो इस पूरे मामले में असली दोषी वो लोग हैं जिन्होंने अख़बार में ये चित्र छापे.

जैसा कि इंटरनेट पर वायरल तस्वीरों में साफ़ दिखाई दे रहा है कि ये एक सप्लीमेंट है तो क्या ऐसी तस्वीरें छापने के लिए प्रकाशक/ मुद्रक पर एक्शन नहीं लिया जाना चाहिए. देश में हम भारतीयों के बीच जैसा मोह अख़बार का है उसपर ज्यादा कुछ बताने की जरूरत नहीं है. हम वो लोग हैं जो पढ़े जाने के बाद अख़बार का हर संभव इस्तेमाल करते हैं.

सवाल होगा कैसे तो जान लीजिये कि चाहे वो अलमारी में बिछाना हो या फिर बची हुई रोटियां रखनी हो. गंदगी उठाने से लेकर जूते और सैंडल पोछ्ने तक हम भारतीयों के अख़बार के अपने अलग अलग इस्तेमाल हैं. वो तमाम लोग जो देवी देवताओं वाले अख़बार में चिकन पैक करते तालिब को देखकर आहत हुए हैं. बहुत ईमनदारी से इस बात का जवाब दें कि उनके जीवन में ऐसे कितने मौके आए जब उन्होंने पूर्व में देवी देवताओं के चित्र अख़बार में देखे और उनकी भावना आहत हुई?

सवाल ये है कि क्या ऐसे लोगों का विरोध सिलेक्टिव है और तालिब को बेवजह के मुद्दे के लिए फंसाया जा रहा है? बाकी जैसा कि तस्वीर में दिखाई दे रहा है कि तालिब की एक भरी पूरी दुकान है. वहां क्यूआर कोड लगा हुआ है. तो ऐसा भी नहीं है कि तालिब अपनी गतिविधि को छुपकर अंजाम दे रहा था. हम जरूर इस बात को जानना चाहेंगे कि तब कितने लोगों ने तालिब का विरोध किया और उसे ऐसा करने से रोका.

उपरोक्त सवाल का जवाब क्या है हमें पता है. बाकी तर्क कितने भी क्यों न दे दिए जाएं तालिब मियां से गलती तो हुई है और अब उन्हें सजा भी भरपूर मिलेगी और ये इसलिए क्योंकि आज का जैसा माहौल है उसका तकाजा भी कुछ ऐसा ही है.    

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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