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Updated: 24 जनवरी, 2018 01:23 PM
प्रभुनाथ शुक्ल
प्रभुनाथ शुक्ल
 
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हमारे समाज की नैतिकता और सामाजिक मापदंडों का पतन हो चला है. तकनीकी और शैक्षिक रुप से हम जितने मजबूत और सभ्य हो रहे हैं, सामाजिक नैतिकता उतनी ही नीचे गिर रही है. बदलते दौर में सामाजिक सम्बन्ध की कोई परिभाषा नहीं बची है जो लांछित न हुई हो. 21वीं सदी में इसरो जैसा संगठन दुनिया का सबसे बड़ा अंतरिक्ष केंद्र बन गया है. लेकिन हमारी बेटियों की आबरू सरेआम सड़क पर लूट रही है. जबकि हम आधुनिक सोच का डंका पीट प्रगतिवादी होने का खोखला दंभ भर रहे हैं.

सामाजिक मनोवृति में ऋणात्मक गिरावट दर्ज़ की जा रही है. समाज में असुरक्षा की भावना घर कर गई है. बेटियों की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. महिलाएं और बेटियां घर से लेकर कार्यस्थल और सड़क पर असुरक्षित हैं. हर मां-बाप की सबसे बड़ी चिंता उसकी बेटी है. बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाओ का नारा शर्मिंदा हो रहा है. जिस राज्य से इसकी शुरुआत की गई थी वही हरियाणा सबसे असुरक्षित हो चला है. यौन हिंसा का हब बन गया है. शहर से लेकर गांव तक असुरक्षा का माहौल बन गया है.

woman, society, rapeदेश में लड़कियों की हालत बद से बदतर हो गई है

बलात्कार, कन्या भ्रूण हत्या और एसिड अटैक भारत की सामाजिक त्रासदी बन गया है. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि राज्यों को फांसी जैसे कानूनों पर विचार करना पड़ रहा है. हरियाणा इस तरह की घटनाओं को लेकर सुर्ख़ियों में है. बलात्कार रोकने के लिए अब तक के सारे कानून बौने साबित हो रहे हैं. हरियाणा सरकार रेप के लिए खिलाफ फांसी की सजा पर विचार कर रही है. मध्यप्रदेश ने बलात्कार के लिए फांसी का कायदा पहले से बना रखा है.

रेप के मेरिट वाले राज्यों में यूपी भी शुमार है. बलात्कार का मनोविज्ञान समझने में मनोचिकित्सक, सरकार और समाज सभी फेल हो चुके हैं. देश में कानून के बाद भी इस त्रासदी का हल होता नहीं दिख रहा. आधुनिक भारतीय समाज की सबसे बड़ी विकृति 16 दिसम्बर 2012 की निर्भया बलात्कार कांड थी. इस हादसे ने देश की छवि को पूरी दुनिया में धूमिल कर दिया. संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी चिंता जताई. उस समय की यूपीए सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक हज़ार करोड़ रुपए का निर्भया फंड भी शुरू किया.

फंड के सही इस्तेमाल की ज़िम्मेदारी अलग-अलग मंत्रालयों को सौंपी गई. इस फंड का इस्तेमाल राज्यों की सरकारें बेटियों के हितों को ध्यान में रखते हुए कर सकती हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि निर्भया फंड में दो हज़ार करोड़ रूपये की वृद्धि होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा पर कोई ठोस नीति नहीं बन पाई. 2014 में एक अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए जिसमें पता चला कि देश भर में 52 फीसदी लड़कियों के साथ घर से स्कूल जाते या वापस आते वक्त छेड़छाड़ होती है. जबकि स्कूल या कॉलेज जाते हुए 32 फीसदी लड़कियों का पीछा किया जाता है.

हरियाणा बलात्कार को लेकर सुर्खियों में है. बेटियों के लिए वह सबसे असुरक्षित राज्य साबित हो रहा है. हरियाणा पुलिस ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2017 में 30 नवंबर तक बलात्कार के कुल 1238 मामले दर्ज किए गए. यानी हर दिन 3.69 बलात्कार के मामले दर्ज हुए. इस दौरान प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 9523 मामले दर्ज हुए थे. जबकि 44 फीसदी नाबालिग लड़कियां शिकार हुई. हरियाणा के पड़ोसी राज्य पंजाब और हिमाचल प्रदेश के अलावा राजस्थान में बच्चियों के साथ दरिंदगी के मामले कम हुए.

नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले में मध्यप्रदेश अव्वल है. मध्यप्रदेश में इस तरह के 2,479 मामले दर्ज किए गए. जबकि इस मामले में महाराष्ट्र 2,310 और उत्तर प्रदेश 2,115 के आंकड़े के साथ क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर है. पूरे भारत में 16,863 नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं. 2016 में बलात्कार के कुल मामले 39,068 हुए. इसमें 18 साल से कम आयु की लड़कियों की संख्या 16,863 थी. जबकि 6 साल से कम आयु की लड़कियों के साथ बलात्कार के 520 मामले हुए. 6 से 12 साल के बीच की 1,596 मासूम ऐसी घटना की शिकार हुईं. 12 से 16 साल की उम्र में यह आंकड़ा चार अंको यानी 6,091 पहुंच गया. 16 से 18 साल की लड़कियों से जुड़ी 8,656 घटनाएं हुईं.

woman, society, rapeकब रुकेगी ये हैवानियत?

भारत में चार साल पहले के तेज़ाबी हमले की ज़रा तस्वीर देखिए. आंकड़ों के मुताबिक साल 2012 में जहां 85 महिलाएं एसिड अटैक का शिकार हुईं थीं. वर्ष 2013 में आंकड़ा बढ़कर 128 और 2014 में 137 तक पहुंच गया. कम से कम 10 साल जेल की सज़ा का प्रावधान है, जिसे उम्र क़ैद में भी तब्दील किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में एसिड की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने की बात भी कही थी. लेकिन कड़वी सच्चाई ये है कि आज भी पूरे देश में बिना किसी रोक-टोक के एसिड की बिक्री हो रही है. अदालत ने यह भी कहा था कि एसिड अटैक की पीड़ित को ना केवल मुफ्त इलाज मिले बल्कि उसे कम से कम 3 लाख रुपए का मुआवज़ा भी दिया जाए.

महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रगति हुई है. लेकिन बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां और प्रयासों की और अधिक ज़रूरत है. लिंगानुपात के मोर्चे पर देश ज्यादा प्रगति नहीं कर पाया है. 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत का लिंग अनुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 943 महिलाओं का है. प्रति 1000 पुरुषों पर 879 महिलाओं के आंकड़ों के साथ, 28 राज्यों में हरियाणा का प्रदर्शन सबसे खराब है. इसके बाद जम्मू-कश्मीर 889, सिक्किम 890, पंजाब 895 और उत्तर प्रदेश 898 का स्थान रहा है.

भारतीय लिंग अनुपात प्रति 1000 पुरुषों पर कम से कम 950 महिलाओं का होना चाहिए. अप्रैल 2016 को संसद में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 2010-12 में, भारत में जन्म के समय लिंगानुपात 908 था जो 2011-13 में सुधरकर 909 हुआ है. भारत में 2011 से 13 में 21 बड़े राज्यों में, प्रति 1,000 पुरुषों पर 864 महिलाओं के आंकड़ों के साथ, हरियाणा की स्थिति बेहद खराब है. पंजाब 867, उत्तर प्रदेश 878, दिल्ली 887, राजस्थान 893 और महाराष्ट्र 902, अन्य राज्यों में से हैं जिनका प्रदर्शन भी खराब है.

वहीं प्रति 1,000 पुरुषों पर 970 महिलाओं के आंकड़ों के साथ छत्तीसगढ़ का जन्म के समय भारत में सबसे अनुकूल लिंग अनुपात है. इसके बाद केरल 966 और कर्नाटक 958 का स्थान है. 2015-16 के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में, बाल लिंग अनुपात में जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और हरियाणा में सबसे निम्नतर गिरावट हुई है. देश में कन्या भ्रूण हत्या रोकने वाले कानून भी बेअसर साबित दिखते हैं. बलात्कार और एसिड अटैक की बात ही छोड़िए.

यह प्रमाणित हो गया है कि कानून के भय से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. समाज में जब तक हर व्यक्ति का नैतिक विकास नहीं होगा, इस तरह की घटानाओं को रोकना सम्भव नहीं दिखता. सरकारों को स्कूलों में नैतिक शिक्षा और सामाजिक विषयों पर अधिक जोर देना चाहिए. तभी हम देश की युवा पीढ़ी को सहेज पाएंगे.

अगर वक्त रहते हम नहीं चेते तो यह समस्या नासूर बन जाएगी. बेटियों को हर हाल में बचाना होगा. उन्हें सुरक्षित महौल देना होगा. तभी समाज सुरक्षित रह पाएगा. इस पर समाज, संसद और परिवार को सोचना होगा.

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