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Updated: 03 सितम्बर, 2019 08:01 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
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स्कूल ड्रेस पहने उन दो बच्चों ने जब हवा में कलाबाजियां खाना शुरू किया तो लोगों की आंखे फटी की फटी रह गईं. देखने में सामान्य लग रहे ये बच्चे बड़ा ही असासाधरण काम कर रहे थे. वीडियो वायरल हुआ और ये दोनों सोशल मीडिया के स्टार बन गए.

इस वीडियो को देखकर मन खुश हो गया था. अपने अंदर क्षमताओं का भंडार लिए ये बच्चे लोगों में भी ऊर्जा का संचार कर रहे थे. दुनिया की सबसे बेहतरीन जिमनास्ट में से एक Nadia Comaneci भी इस वीडियो को शेयर करने से खुद को रोक नहीं सकी थीं. नादिया के बाद खेल मंत्री किरेन रिजीजू भी इन बच्चों से मिलने के लिए उत्साहित दिखाई दिए. हर किसी की तरह मैं भी दिल से चाहती थी कि ये बच्चे सोशल मीडिया से निकलकर लोगों के सामने आएं. लोग इन्हें जानें. इनके हुनर को मंजिल मिले. वीडियो तो इधर से उधर दौड़ रहा था लेकिन कोई इन बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा था. आखिरकार इंडिया टुडे ने उन्हें ढूंढ ही निकाला.

gymnast kidsये बच्चे अब गुमनाम नहीं

ये बच्चे कोलकाता के रहने वाले हैं. मोहम्मद अजाजुद्दीन जो 12 साल के हैं और जशिका खान 11 साल की हैं. इन दोनों को प्यार से अली और लवली बुलाते हैं. दोनों कोलकाता के एक गरीब मजदूर परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

एक हुनर नहीं बल्कि हुनर की खान हैं ये बच्चे

बच्चों को जब नहीं जाना था तब ही इन बच्चों ने मुझे अपना फैन बना लिया था और अब जब इन्हें जान लिया है तो मन और भी गर्व से भर गया है. मुस्लिम परिवार से आने वाले ये बच्चे दुनिया के सामने मिसाल बनकर आए हैं. अली और लवली जिमनास्टिक सीख रहे हैं. ये वीडियो उनके कोच ने ही बनाकर सोशल मीडिया पर डाला था. और सिर्फ जिम्नास्टिक नहीं बच्चों को हिप-हॉप डांस करना भी बहुत पसंद है. ये दोनों हिप-हॉप डांस भी सीख रहे हैं. जिसे देककर आप उतने ही चौंक जाएंगे जितना इनकी जिमनास्टिक स्किल्स को देखकर हुए थे.

तारीफ के काबिल सिर्फ बच्चे नहीं है

इस कहानी को सिर्फ इन बच्चों की वजह से नहीं लिखा जा रहा, बल्कि कोई और भी हो जो तारीफ के काबिल है. सिर्फ ये बच्चे नहीं बल्कि इनके माता-पिता पर भी गर्व हो रहा है. वजह कई हैं. इन्होंने सिर्फ अपने मन की सुनी, जमाने की नहीं. इन्होंने मुस्लिम समाज से जुड़े कई मिथ को एक साथ तोड़ा है. वो मिथ कि मुस्लिम बेटियों की इच्छा का सम्मान नहीं करते, बेटियों को आगे बढ़ने के मौके नहीं देते. गरीब होने पर बच्चों को पढ़ने नहीं बल्कि काम करके पैसा कमाने पर जोर देते हैं. डांस और खेलों में रुचि लेना इस्लाम में हराम होता है. इन माता-पिता का तो जैसे धर्म ही अपने बच्चों की खुशी और तरक्की देखना है. और इसी धर्म का पालन करते हुए वो खुद को गर्वित महसूस कर रहे हैं.

बच्ची की मां ये मानती तो हैं कि वो गरीब हैं, वो दुनिया की बातें सुनती तो हैं कि बच्ची को किस तरह के कपड़े पहनाए हैं, लेकिन वो जानती हैं कि वो क्या कर रही हैं. वो जानती है कि उनके बच्चे न सिर्फ उनका, बल्कि देश का सिर ऊंचा करने का माद्दा रखते हैं. लेकिन समाज ने उन्हें डरा भी रखा है क्योंकि बेटी के दहेज की फिक्र उन्हें अभी से सता रही है. पर पिता का मानना है कि बेटी नहीं वो 'बेटा' ही है.

आज भारत में कितने ही बच्चे हुनरमंद और होशियार होने के बावजूद आभावों में जीवन काट रहे हैं. साथ ही अगर माता-पिता भी समाज और रूढ़ीवादियों की सुनने वाले हुए तो फिर उन बच्चों के सुंदर सपने बहुत ही कम उम्र में टूट जाते हैं. मुस्लिम बच्चियों के लिए तो संघर्ष और भी ज्यादा होते हैं. लेकिन ये परिवार भारत के लोगों के सामने मिसाल बनकर उभरा है. जिन्होंने बच्चों के भविष्य को ही सबसे ऊपर रखा. उनके हुनर के आगे माता-पिता किसी भी तरह का रोड़ा नहीं बनना चाहते. माता-पिता गुड़ हों, तो बच्चे तो शक्कर होंगे ही. ऐसे माता-पिता को सलाम.

अब इन बच्चों से उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं कि ये बेहतर से बेहतर ट्रेनिंग लें और आगे चलकर देश का नाम रौशन करें. काश मेंरे देश के बाकी माता-पिता भी धर्म और रूढ़ियों को किनारे कर सिर्फ बच्चों की खुशियों को देख पाते !

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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