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Updated: 05 जुलाई, 2022 05:12 PM
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
  @siddhartarora2812
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कल राजू बता रहे थे कि मेरा बेटा सीधा है (उम्र कोई 6-7 साल), वो उसको सिखाते हैं कि अगर कोई बच्चा तुम्हें तंग करे, लड़ाई करे, तुम्हारे खिलौने उठाए तो उसकी मम्मी को जाकर बोलो. स्कूल है तो टीचर से शिकायत करो. उन्हें दिखेगा कि दूसरा बच्चा बुली कर रहा है. वो उसको सज़ा देंगे. ये समाज का बेसिक कांसेप्ट है. राजू कुछ ग़लत नहीं सिखा रहे. कानून कहता है कि अगर आपको कोई ताकतवर तंग कर रहा है तब आप ताकत जुटाने की बजाए, हायर अथॉरिटीज़, प्रशासन आदि से मदद मांगे. आपकी तरफ से वो उसे सबक सिखायेंगे. आपको खुद हमला नहीं करना है. जिसकी लाठी उसकी भैंस नहीं होगी. लेकिन ये कांसेप्ट आइडियल सोसाइटी तक ही काम आता है. भारत आइडियल सोसाइटी नहीं है. यहां अभी भी कुछ जगह, कुछ लोगों के लिए जंगल राज कान्सेप्ट चलता है. जंगल राज का एक ही नियम है - सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट. आपको ज़िंदा रहना है तो अपने से ताकतवर से बचना सीखना होगा और मौका लगने पर उसे मार देना होगा. ये कान्सेप्ट भी बुरा नहीं है जब तक बात सर्वाइवल तक सीमित है. लेकिन सेम कान्सेप्ट को, अर्बन सोसाइटी में लाने वाले अपनी जान ही नहीं, अपनी सोच पर हमले को भी खुद पर हमला मानते हैं तो फिर दिक्कत होती है. होनी ही है.

Udaipur, Kanhaiya Lal, Murder, Prophet Mohammad, Nupur Sharma, Hindu, Muslim, Facebookपैगंबर मोहम्मद विवाद में अपनी जान गंवाने वाला दरजी कन्हैयालाल

आपकी सोच आपका पर्सनल माल है, इससे क्या बनना है क्या बिगड़ना है ये आप जानों. इसपर कोई हमला तबतक मुमकिन नहीं जबतक आप इसे किसी पर थोपने न लगो. लेकिन कोई आपके कान्सेप्ट को फॉलो नहीं करेगा तो आप उसे मारने की धमकी दोगे, कोई उस कान्सेप्ट को न मानने वाले से सहमत होगा तो आप उसे मार दोगे, फिर बेशर्मी से उसकी ज़िम्मेदारी भी लोगे तो सिर्फ इसलिए कि आपको सिखाया ही यही गया है, सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट एण्ड यू आर द मोस्ट इम्पॉर्टन्ट पार्ट ऑफ दिस चपटा यूनवर्स.

कुछ बच्चों को उनकी मम्मियाँ सिखाती हैं – बेटा पिट कर मत आइयो. तू मार दियो, जो होगा देखा जायेगा! हम संभाल लेंगे. एक समाज के हिसाब से आप अपने बच्चे को गलत शिक्षा दे रहे हो. पर सही गलत से परे, यहाँ ज़रूरी और गैर-ज़रूरी का सवाल आ जाता है. जाबर का जोर न चले इसके लिए खुद को मजबूत करना पड़ेगा, ये सिखाने में कोई हर्ज़ कहां नज़र आता है?

मैं 13-14 साल की उम्र तक बहुत भोंदू था. कोई तंग करे तो मन ही मन घुटकर रह जाता था पर शिकायत भी नहीं करता था. जबकि पापा मेरे बड़े भाई को सिखाते थे कि जो भी हो, तुम्हें छोटे का ध्यान रखना है. फैमिली से ऊपर कुछ नहीं, फैमिली को प्रोटेक्ट करने के लिए किसी हायर पर्मिशन की ज़रूरत नहीं.

भाई इस चीज़ को समझते थे, मैं नहीं! मैं 11 साल का होऊंगा, मोहल्ले के लड़के से मेरा किसी बात का झगड़ा हो गया. वो शरीफ सा दिखता था, लेकिन हमारी हाथापाई हो गई. उसके पापा आ गए! मुझे लगा कि अब तो अपने पापा के सामने हैं, हायर एथॉरिटीज़, अब इनसे शिकायत कर सकते हैं! मैंने टोका 'अंकल ये मुझसे बेवजह झगड़ा कर रहा है. आप इसे समझाइए वर्ना बात बढ़ जायेगी.'

इतने में उसने अपने बाप के सामने ही मेरी पीठ पर एक जोरदार मुक्का जड़ दिया. उसका बाप इधर-उधर ऐसे देखने लगा जैसे हम पैरेलल यूनवर्स में लड़ रहे हों और उसे आभास ही न हो. मैं न पलटकर मार सका, न ही मैंने फिर कोई शिकायत की! पर इतना ज़रूर सीखा कि किसी के भरोसे रहने की बजाए, खुद को सक्षम करना होगा! ये जंगल राज है, जहां जानवर कपड़े पहने घूम रहे हैं! जहां वो कैमरा से एक बारगी बच भी लें, कानून से तो बिल्कुल नहीं डरते.

मेरा बाप एक लाइन अक्सर कहता था – पहले मारे सो मीर.

जंगलराज इसी नियम से चला है. हालांकि मैं पूरी तरह अभी भी इससे सहमत नहीं, मैं चाहता हूं कि मैं सक्षम रहूं पर हमला करने के लिए नहीं, उससे बचने के लिए. एक माधुरी फिदा करके पेंटर था. उसने दुर्गा माँ की आपत्तिजनक पेंटिंग बनाई थी. उसपर हिन्दू परिषद और मिलते जुलते संगठनों ने कई केस फाइल किये थे. उसके नाम के खिलाफ़ नारे लगे थे. कुछ समय उसे देश से भी बाहर रहना पड़ा था. ये शिकायत वाला सिस्टम था. पर इससे उसको पर्सनली कुछ फ़र्क पड़ा हो, उसकी ठरक में गिरावट आई हो? ऐसा कम से कम उसकी जीवनी में तो नहीं मिलता है.

वहीं दूसरी ओर फ्रांस में किसी ने कार्टून बनाकर मज़ाक बनाया था तो उसकी ऑन स्पॉट गर्दन काट दी गई थी. काटने वाले के अरबी पापा भी ऐसे इधर-उधर देखने लगे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं.अभी फिर उदयपुर में पसंद की बात न करने पर गर्दन कटी है. बेशर्मी से ज़िम्मेदारी भी ली गई है. अब फिर कुछ पापा लोग इधर-उधर मुंह कर रहे हैं. पैरेलल यूनिवर्स फिर एक्टिव हो गया है.

अपन इसकी भी शिकायत करेंगे, हर संभावित कटखने को शक की निगाह से देखेंगे, उसे जताएंगे कि देख बे ये हो तुम. वो बिचारा खुद को ‘प्रताड़ित’ महसूस करेगा. उसे ये सोफ़ेस्टिकेटेड जंगल सेफ नहीं लगेगा, अंत में कट्टर लोग उसे भी कटार उठाने पर ‘मजबूर’ कर देंगे और पापा लोगों को नई फौज तैयार करने में मदद मिलेगी.

लेकिन, ऐसी खबरों से घबराया एक बाप, अपने बच्चे को फिर ये समझाते हुए शायद खुद पर डाउट करने लगेगा कि – बेटा, कोई परेशान करे तो खुद मत लड़ना, उसके बाप को बताना (जो सुनेगा नहीं), अपनी टीचर को बताना (जिनके पास फुरसत नहीं), पुलिस को बताना (जहाँ सुनने को मिलता है कि आपस में केस रफा -दफा कर लो) या सुप्रीम कोर्ट के उस जज को बताना जो खुद कहता है कि 3 करोड़ केस तो पेंडिंग पड़े हैं.

लेखक

सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' @siddhartarora2812

लेखक पुस्तकों और फिल्मों की समीक्षा करते हैं और इन्हें समसामयिक विषयों पर लिखना भी पसंद है.

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