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Updated: 16 जून, 2022 03:13 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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पैगंबर टिप्पणी विवाद में नूपुर शर्मा के खिलाफ जुमे की नमाज के बाद किए गए हिंसक प्रदर्शनों में पुलिस पर पथराव से लेकर आगजनी तक की घटनाओं को मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग ने अंजाम दिया था. जिस पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने उपद्रवियों को गिरफ्तार किया. और, प्रयागराज हिंसा के मास्टरमाइंड रहे जावेद पंप के घर पर बुलडोजर तक चला दिया. लेकिन, ऐसा लग रहा है कि पैगंबर टिप्पणी विवाद पर अब भारत की इस्लामिक जमीयतें भी बंटी हुई नजर आ रही हैं. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने जहां मुस्लिम उपद्रवियों को कानूनी सहायता देने का फैसला किया है. वहीं, जमात उलेमा-ए-हिंद ने हिंसक प्रदर्शनों का पुरजोर शब्दों में निंदा की है. जिस पैगंबर टिप्पणी विवाद को लेकर दावा किया जा रहा है कि पूरी दुनिया का मुसलमान इससे खफा है. तो, भारत की ही दो इस्लामिक जमीयतों के विचारों में ऐसी असमानता चौंकाती है. और, सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर मुस्लिमों के लिए इन जमीयतों में से आदर्श कौन है?

Jamiat ulema e hind and Jamaate ulema e hind two diffrent Islamic orgnisation Who is the ideal of Muslimsपैगंबर टिप्पणी विवाद के बाद मुस्लिम जमीयतें भी अब बंटी हुई नजर आ रही हैं.

पहले बात जमीयत उलेमा-ए-हिंद की. पैगंबर टिप्पणी विवाद में मुस्लिम उपद्रवियों को बचाने के लिए ये इस्लामिक संगठन उन्हें कानूनी सहायता देगा. इतना ही नहीं जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी ने 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में हुए सीरियल बम विस्फोट में फांसी की सजा पाने वाले आतंकी वलीउल्लाह को भी कानूनी सहायता देने की बात कही है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद प्रयागराज हिंसा के मास्टरमाइंड जावेद पंप के घर को बुलडोजर से ध्वस्त करने की कार्रवाई के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है.

अब बात करते हैं जमात उलमा-ए-हिंद. देश के कई हिस्सों में हुए मुस्लिमों के हिंसक प्रदर्शनों को जमात उलमा-ए-हिंद ने एक खुफिया साजिश करार दिया है. जमात उलमा-ए-हिंद ने उपद्रवियों की गिरफ्तारी और हिंसा के मास्टमाइंड पर बुलडोजर की कार्रवाई को मुस्लिम नहीं बल्कि अपराधियों पर हुई कार्रवाई कहा है. जमात उलमा-ए-हिंद का मानना है कि नूपुर शर्मा ने गलतबयानी की है. लेकिन, उसके लिए हिंसक प्रदर्शनों और 'सिर तन से जुदा' वाली सोच को जायज करार नहीं दिया जा सकता है. यहां तक कि जमात उलमा-ए-हिंद ने हिंसा के खिलाफ फतवा तक निकालने की बात कही है. AIMIM के चीफ असदुद्दीन ओवैसी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना महमूद मदनी और कई मौलानाओं के भड़काऊ बयानों के खिलाफ भी इस इस्लामिक संगठन ने 1000 उलेमाओं के समर्थन से फतवा जारी करने की बात कही है.

दोनों ही मुस्लिमों के संगठन, तो विचारों में अंतर क्यों?

बीते महीने यूएई में वर्ल्ड मुस्लिम कम्युनिटीज काउंसिल की कॉन्फ्रेंस हुई थी. जिसमें कई देशों के मुस्लिम धार्मिक नेता जुटे थे. इस कॉन्फ्रेंस का हिस्सा रहे मिस्र के मंत्री डॉ. मोहम्मद मोख्तार गोमा ने कहा था कि 'एक अलग देश बनाकर इस्लामिक एकता लाने की बजाय मुस्लिमों को अपने देश, अपने झंडे और अपनी मिट्टी का सम्मान करना चाहिए. क्योंकि, तर्कसंगत आधार पर यह संभव नही है.' एक तरफ मिस्त्र के मंत्री डॉ. मोहम्मद मोख्तार गोमा हैं. तो, दूसरी तरफ दुनियाभर के इस्लामिक चरमपंथी और आतंकी संगठन हैं. जो किसी भी तरीके से पूरी दुनिया पर इस्लाम की हुकूमत स्थापित करने की कोशिशों में लगे हैं. हालांकि, तार्किक आधार पर यह संभव नहीं है. लेकिन, इस्लाम के भीतर एक सोच का यही चेहरा है.

मिस्त्र के मंत्री के इस बयान को यहां बताने की अहम वजह यही है कि जमात उलमा-ए-हिंद एक ऐसा इस्लामिक संगठन है. जो भारत को अपना देश मानकर उसके संविधान और कानून का ईमानदारी से पालन करता है. वहीं, खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा संगठन कहने वाला जमीयत उलेमा-ए-हिंद भारत में मुसलमानों के लिए इस्लामिक कानूनों की ही वकालत करता है. कॉमन सिविल कोड, तीन तलाक, ज्ञानवापी और मथुरा ईदगाह जैसे कई मामलों पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद संविधान की आड़ लेकर इस्लामी कानूनों को अपना बुनियादी हक बताता है. एक जलसे में जमीयत से जुड़े मौलाना मेहमूद मदनी कहते हैं कि सबको समझना होगा कि हमारा (मुसलमानों का) खाना अलग है, भाषा अलग है, पहनावा अलग है. हालांकि, वे यह नहीं बताते कि यूपी के मुसलमान और केरल के मुसलमानों की भाषा कैसे एक है? पहनावा कैसे एक है? खान-पान कैसे एक है?

मजहब से ऊपर देश क्यों नहीं?

जमात उलमा-ए-हिंद के मौलाना सुहैब कासमी का कहना है कि 'इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पैगंबर मोहम्मद के लिए ऐसे शब्दों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. लेकिन, जब सरकार और कानून अपना काम कर रहे हैं. तो, हिंसक प्रदर्शनों की क्या जरूरत थी? नूपुर शर्मा के बयान देने के 15 दिनों बाद अचानक नबी के लिए मोहब्बत का जाग जाना किसी खुफिया एजेंडे की ओर इशारा करता है. क्योंकि, पैगंबर से मोहब्बत का तो तकाजा ये था कि पहले दिन ही रिएक्शन करते. मगर उन आकाओं ने जो दुनिया में भारत की बढ़ती हुई छवि और हमारी सरकार के अरब देशों के ताल्लुकात को अपने एजेंडे के तहत सही नहीं मानते हैं. उन्होंने मुस्लिमों को भड़काया.' इसके साथ ही जमात उलमा-ए-हिंद ने पैगंबर मोहम्मद पर कूड़ा फेंकने वाली बूढ़ी औरत का उदाहरण देकर कहा कि इस्लाम का तकाजा तो ये था कि नूपुर शर्मा को माफ कर दिया जाता.

वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के इस मामले में बिलकुल अलग विचार हैं. यह संगठन सीएए, राम मंदिर, तीन तलाक जैसे मुद्दों पर इस्लामिक कानून को तवज्जो देने की बात करता है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना महमूद मदनी का मानना है कि मजहबी मामलों में दुनियावी दखलंदाजी नहीं की जा सकती है. आसान शब्दों में कहा जाए, तो भारत के करीब 20 करोड़ मुसलमानों के लिए ये इस्लामिक संगठन शरिया कानून को लागू करने का पक्षधर माना जा सकता है. क्या भारत जैसे एक लोकतांत्रिक देश में मुस्लिमों को इस तरह की छूट दी जा सकती है? दरअसल, जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश के मुसलमानों को वो सपने बेचता है. जो कभी पूरे नहीं हो सकते हैं. और, इसके लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी मजहबी तंजीमों का इस्तेमाल किया जाता है.

जमात उलमा-ए-हिंद ने मुस्लिम तंजीमों की बात करते हुए कहा कि 'वतनपरस्ती को अपना आधा ईमान बताने वाली इस देश की कौन सी तंजीम पूरे 135 करोड़ लोगों की बात करती है? सिर्फ 20 करोड़ लोगों की बात करने को ही अपना फर्ज मानने वाली तंजीमों को कैसे जायज माना जाएगा?' देखा जाए, तो खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा संगठन कहने वाले जमीयत उलेमा-ए-हिंद को पैगंबर टिप्पणी विवाद पर आगे आकर लोगों से शांति और कानून पर भरोसा बनाए रखने की बात करनी चाहिए थी. लेकिन, हिंसक प्रदर्शनों के बाद मुस्लिम उपद्रवियों को कानूनी सहायता देने तक ही खुद को सीमित कर लिया.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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